Tuesday, June 2, 2026

 बिहार विधान परिषद की 9 सीटों और एक उपचुनाव के लिए राजनीतिक सरगर्मी तेज है, जहाँ संख्या बल के आधार पर NDA 8 सीटें जीतने की स्थिति में है।

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पटना। बिहार विधान परिषद (एमएलसी) की 9 सीटों और एक उपचुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। पहली नजर में मुकाबला एकतरफा दिख रहा है, लेकिन असली खेल सीटों से ज्यादा वोटों के गणित और वरीयता आधारित मतदान में छिपा है।

विधानसभा में संख्या बल के आधार पर एनडीए मजबूत स्थिति में नजर आ रहा है।

संख्या बल से NDA आगे

243 सदस्यीय विधानसभा में एनडीए के पास करीब 202 विधायक हैं।

मौजूदा समीकरणों के अनुसार एक सीट जीतने के लिए लगभग 25 विधायकों का समर्थन पर्याप्त माना जा रहा है। ऐसे में एनडीए के लिए 8 सीटों का रास्ता लगभग साफ दिखाई देता है।

विपक्ष की उम्मीद एक सीट पर टिकी

राजद, कांग्रेस, वाम दलों और अन्य विपक्षी विधायकों की कुल संख्या एक सीट निकालने की स्थिति में है।

महागठबंधन की रणनीति इस बात पर केंद्रित रहेगी कि उसके सभी विधायक मतदान करें और वोटों का बिखराव न हो।

मतदान हुआ तो बढ़ेगी दिलचस्पी

यदि उम्मीदवारों की संख्या सीटों के बराबर या उससे कम रहती है तो कई प्रत्याशी निर्विरोध जीत सकते हैं।

लेकिन सीटों से अधिक उम्मीदवार मैदान में उतरते हैं तो मतदान और मतगणना की जटिल प्रक्रिया शुरू होगी, जिससे राजनीतिक समीकरणों में नई हलचल आ सकती है।

दूसरी वरीयता बदल सकती है तस्वीर

एमएलसी चुनाव में केवल पहली पसंद का वोट ही मायने नहीं रखता।

यदि पहले दौर में सभी सीटों का फैसला नहीं होता, तो दूसरी और आगे की वरीयताओं के वोट गिने जाते हैं। यही वजह है कि राजनीतिक दल अपने विधायकों को वोटिंग के दौरान विशेष निर्देश देते हैं।

क्रॉस वोटिंग और अनुपस्थित वोट बन सकते हैं फैक्टर

हाल के चुनावों में देखा गया है कि कुछ विधायकों के मतदान नहीं करने या वरीयता वोटों के अलग तरीके से इस्तेमाल होने से नतीजे प्रभावित हुए हैं।

इसलिए दलों की नजर सिर्फ अपने संख्या बल पर नहीं बल्कि विधायकों की एकजुटता पर भी रहेगी।

सियासी संदेश भी होगा अहम

एमएलसी चुनाव का परिणाम सिर्फ परिषद की सीटों तक सीमित नहीं रहेगा। यह सत्ता पक्ष की संगठनात्मक मजबूती और विपक्ष की एकजुटता की भी परीक्षा माना जा रहा है।

यदि अनुमानित 8-1 का आंकड़ा कायम रहता है तो यह एनडीए के लिए राजनीतिक बढ़त का संकेत होगा, जबकि विपक्ष किसी भी अतिरिक्त सफलता को मनोवैज्ञानिक जीत के रूप में पेश करेगा।

नजर 18 जून पर

18 जून को होने वाले चुनाव और उसके बाद की मतगणना यह तय करेगी कि विधानसभा की ताकत सीधे सीटों में बदलती है या फिर वरीयता वोटों का गणित कोई नया राजनीतिक संदेश देता है।

फिलहाल बिहार की राजनीति में चर्चा सीटों से ज्यादा चुनावी गणित की है।

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