रांचीः झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) एक बार फिर सवालों के घेरे में है. 26 अप्रैल को आयोजित झारखंड पात्रता परीक्षा (JET) में सामने आई गंभीर अव्यवस्थाओं ने आयोग की कार्यप्रणाली पर नई बहस छेड़ दी है.
यह परीक्षा विश्वविद्यालय स्तर पर शिक्षण के लिए पात्रता तय करती है, ऐसे में इसकी विश्वसनीयता बेहद अहम मानी जाती है. लेकिन इस बार रांची और बोकारो के कई केंद्रों पर जो हालात देखने को मिले, उन्होंने अभ्यर्थियों को निराश और आक्रोशित दोनों कर दिया.
सबसे बड़ी गड़बड़ी प्रश्नपत्रों की कमी और गुणवत्ता को लेकर सामने आई. बोकारो के सेक्टर-9 स्थित सरदार पटेल पब्लिक स्कूल में शिक्षा विषय के 32 प्रश्नपत्र कम पड़ गए. वहीं रांची के एएसटीबीएस जिला सीएम स्कूल ऑफ एक्सीलेंस में ओड़िया विषय के प्रश्नपत्र पढ़ने योग्य ही नहीं थे.
इन खामियों के चलते दोनों विषयों की परीक्षा रद्द करनी पड़ी. रांची के एचईसी स्थित केराली स्कूल में भी 600 अभ्यर्थियों के लिए बनाए गए केंद्र पर 120 प्रश्नपत्र कम निकले. जिससे परीक्षा शुरू होने में देरी हुई और अभ्यर्थियों को घंटों इंतजार करना पड़ा.
स्थिति इतनी खराब रही कि कुछ केंद्रों पर अभ्यर्थियों को बिना परीक्षा दिए ही लौटना पड़ा. बोकारो में कई परीक्षार्थी धूप में इंतजार करते रहे लेकिन अंत तक प्रश्नपत्र नहीं पहुंचे. वहीं रांची में भूगोल की परीक्षा निर्धारित समय से करीब एक घंटे देर से शुरू हुई. बायोमीट्रिक व्यवस्था का अभाव और पहचान सत्यापन में ढिलाई भी सामने आई, जिससे परीक्षा की पारदर्शिता पर सवाल उठे. केवल प्रबंधन ही नहीं, प्रश्नपत्रों की गुणवत्ता भी विवादों में रही.
नागपुरी विषय के पेपर में कुडुख, संताली, मुंडारी और पंचपरगनिया भाषाओं से जुड़े प्रश्न शामिल कर दिए गए, जबकि व्याकरण और वाक्य संरचना में भी कई त्रुटियां पाई गईं. अंग्रेजी प्रश्नपत्र में दो प्रश्न एक जैसे थे और एक प्रश्न में विकल्प अधूरा था. ओड़िया विषय के प्रश्नपत्र इतने अस्पष्ट थे कि अभ्यर्थी सवाल ही समझ नहीं पाए.
इन गड़बड़ियों का सीधा असर अभ्यर्थियों पर पड़ा है. परीक्षा रद्द होने के कारण उन्हें दोबारा परीक्षा देनी होगी, जिसके लिए अतिरिक्त समय, संसाधन और मानसिक दबाव झेलना पड़ेगा. अभ्यर्थियों का कहना है कि 17 साल बाद आयोजित इस महत्वपूर्ण परीक्षा में भी ऐसी लापरवाही अस्वीकार्य है.
राज्य के छह जिलों में 430 केंद्रों पर लगभग डेढ़ लाख अभ्यर्थी इस परीक्षा में शामिल हुए थे. लेकिन कई केंद्रों पर अव्यवस्था ने पूरे सिस्टम की साख पर सवाल खड़े कर दिए.
विवादों से रहा है पुराना नाता!
जेपीएससी के विवादों से हमेशा मुखर रहे अधिवक्ता सुमन अग्रवाल ने कहा कि यह पहली बार नहीं है जब जेपीएससी विवादों में घिरा है. आयोग का इतिहास लगातार आरोपों और जांचों से जुड़ा रहा है। वर्ष 2003 और 2006 की पहली दो सिविल सेवा परीक्षाओं में धांधली के आरोप लगे, जिनकी जांच सीबीआई तक पहुंची. ओएमआर शीट में ओवरराइटिंग और संदिग्ध चयन जैसे मामले सामने आए, जिसमें कई लोगों को जेल भी जाना पड़ा.
साल 2007-09 की तीसरी परीक्षा में संशोधित मेरिट सूची को लेकर विवाद हुआ, जबकि 2010 की चौथी परीक्षा में पीटी रिजल्ट और स्केलिंग सिस्टम पर सवाल उठे. 2013 की पांचवीं परीक्षा में आरक्षण नियमों के उल्लंघन के आरोप लगे. 2015 से 2020 तक चली छठी जेपीएससी परीक्षा लंबी अवधि और कानूनी विवादों के कारण चर्चा में रही. वहीं 2021 में आयोजित 7वीं से 10वीं संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा में एक ही कतार में बैठे 49 अभ्यर्थियों के चयन और ओएमआर शीट गायब होने का मामला सुर्खियों में आया.
हाल के वर्षों में उत्तर कुंजी में गड़बड़ी और परीक्षाओं में लगातार देरी भी आलोचना का कारण बनी है. ऐसे में जेट 2026 की अव्यवस्थाओं ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर कब तक जेपीएससी अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करेगा. फिलहाल अभ्यर्थी जवाब और समाधान की उम्मीद में हैं, लेकिन आयोग के सामने भरोसा बहाल करना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है.


