नई दिल्ली: अमेरिकी सेना द्वारा ईरान के बंदरगाहों की सैन्य नाकेबंदी शुरू करने के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा संकट खड़ा हो गया है. ताजा रिपोर्टों के अनुसार, इस कार्रवाई से प्रतिदिन लगभग 20 लाख बैरल ईरानी तेल की आपूर्ति वैश्विक बाजार से बाहर हो सकती है. इस कदम से न केवल दुनिया भर में कच्चे तेल की कमी होने की आशंका है, बल्कि पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में भी भारी उछाल आने का खतरा मंडरा रहा है.
भारत पर मंडराता एलपीजी संकट
नोमुरा के विश्लेषक बिनीत बांका के अनुसार, हॉर्मुज जलडमरूमध्य की पूर्ण नाकेबंदी से भारत के लिए रसोई गैस (LPG) की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है. हालांकि पिछले एक महीने में भारत के कम से कम आठ एलपीजी टैंकर इस मार्ग से सुरक्षित निकलने में सफल रहे हैं, लेकिन भविष्य में तनाव बढ़ने पर स्थिति बिगड़ सकती है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वे किसी भी जहाज को इस मार्ग से गुजरने के लिए ईरान को टोल (Toll) देने की अनुमति नहीं देंगे.
बाजार में अस्थिरता और कीमतों का गणित
इस्लामाबाद में अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस के नेतृत्व में हुई शांति वार्ता के बेनतीजा रहने के बाद कच्चे तेल की कीमतें सोमवार को 107 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं. हालांकि, मंगलवार को बातचीत की नई उम्मीदों के कारण दाम 100 डॉलर से नीचे आए, लेकिन अनिश्चितता बरकरार है. पिछले एक सप्ताह में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में 6.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. नोमुरा का कहना है कि यदि संघर्ष लंबा खिंचता है, तो रणनीतिक तेल भंडार भी आपूर्ति और कीमतों को संतुलित करने में विफल हो सकते हैं.
सऊदी अरब की वैकल्पिक रणनीति
इस संकट के बीच सऊदी अरब ने अपनी ‘ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन’ की क्षमता बढ़ाकर 70 लाख बैरल प्रतिदिन कर दी है. यह पाइपलाइन हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बाईपास कर लाल सागर के जरिए तेल निर्यात की सुविधा देती है, जो वैश्विक आपूर्ति के लिए एक बड़ी राहत है.
ईरान को आर्थिक लाभ?
हैरानी की बात यह है कि युद्ध के बढ़ते खतरों और कीमतों में उछाल के कारण मार्च 2026 में ईरान का तेल राजस्व पिछले साल की तुलना में 36 प्रतिशत बढ़कर 5.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया. विशेषज्ञों का मानना है कि ‘वॉर रिस्क प्रीमियम’ के कारण तेल की कीमतें ऊंची बनी रहेंगी, जिससे आने वाले समय में आम जनता पर महंगाई की मार पड़ सकती है.


