रांचीः झारखंड के बोकारो में हुए बहुचर्चित जंगल जमीन घोटाले मामले में कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं. इस घोटाले में न सिर्फ सरकारी कर्मचारी शामिल थे. बल्कि कई बिल्डरों ने जमीन की लालच में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जमकर करोड़ों रुपये लगाए. सीआईडी की जांच में वन भूमि घोटाले को लेकर कई खुलासे हुए हैं.
बिल्डर के पैसे का हुआ इस्तेमाल
सीआईडी की जांच में यह बातें सामने आई हैं कि बोकारो वन भूमि को कब्जाने के लिए बिल्डरों के पैसे का इस्तेमाल किया गया था. घोटाले के किंगपिन इजहार और अख्तर हुसैन ने एक बिल्डर के पैसे का इस्तेमाल कर हलका (राजस्व विभाग) कर्मचारियों के सहयोग से वन जमीन का फर्जी कागजात तैयार किया था.
सीआईडी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि साल 2011 में जमीन कारोबारी शैलेश से इजहार और अख्तर की मुलाकात हुई. इसके बाद शैलेश ने सारा खर्च वहन कर हलका कर्मचारी के सहयोग से जमीन का पेपर तैयार करवाया था. पेपर तैयार करवाने के बाद शैलेश ने ही 74 करोड़ में उमयुष मल्टीकॉम को जमीन बेच डाली.
सीआईडी जांच में यह खुलासा हुआ कि उमयुष मल्टीकॉम कंपनी शैलेश के बेटे के नाम पर ही थी. जमीन की खरीदारी के समय कंपनी की वैल्यू मात्र एक लाख की थी. बता दें कि इसी कंपनी से जमीन लेने के लिए राजबीर कंस्ट्रक्शन के निदेशक बिल्डर विमल अग्रवाल ने 3.40 करोड़ का भुगतान किया था.
कोर्ट में दिए हलफनामे में विमल अग्रवाल की भूमिका
बोकारो वन भूमि घोटाले मामले की जांच बहुत तेज गति से चल रही है. मामले को लेकर यह बताया जा रहा है कि घोटाले में मुख्य आरोपी राजवीर कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक विमल कुमार अग्रवाल हैं. कुछ दिन पहले ही सीआईडी में कोर्ट में जो हालकनामा दायर किया है उसमें विमल अग्रवाल को ही जमीन घोटाले का मास्टरमाइंड बताया गया है. वन भूमि घोटाले मामले में सीआईडी ने राजवीर कंस्ट्रक्शन के निदेशक विमल अग्रवाल और पुनीत अग्रवाल के बाद उनके तीसरे निदेशक वीर अग्रवाल को भी आरोपी बनाया है.
क्या है बोकारो वन जमीन घोटाला
झारखंड के बोकारो जिला के तेतुलिया में 117 एकड़ से ज्यादा वन भूमि को फर्जी दस्तावेज बनाकर भू माफिया और अंचल कर्मियों मिलीभगत से बेच दिया गया. यह सभी वह जमीन है जिन्हें बोकारो स्टील प्लांट के द्वारा वन विभाग को वापस लौटाया गया था. जमीन माफिया को लेकर बोकारो वन प्रमंडल के प्रभारी वनपाल सह वनरक्षक रुद्र प्रताप सिंह ने शिकायत दर्ज करवाई थी.
जांच के बाद सामने आई की बोकारो में अधिकारी और भूमाफियाओं ने मिलकर 117 एकड़ जमीन फर्जी दस्तावेज के आधार पर बेच दिए. घोटाले में बोकारो के आधा दर्जन भूमाफिया, कई अंचलकर्मी और छह से ज्यादा बोकारो स्टील प्लांट के अफसरों की मिलीभगत की बात सामने आई थी.
बोकारो में हुए वन भूमि घोटाले मामले की जांच को लेकर आईजी सीआईडी ने पश्चिम बंगाल के डिप्टी कमिश्नर को भी पत्र लिखा था और ओरिजनल कागजात की मांग की थी ताकि जमीन की सही-सही जानकारी सीआईडी को मिल सके. सीआईडी की शुरुआती जांच में ये बाते स्पष्ट रूप से सामने आई थी कि जमीन माफिया और कुछ बिल्डरों के द्वारा मिलकर जमीन की हेरा-फेरी की गई है और इसकी सबसे बड़ी वजह बीएसएल के द्वारा वनविभाग को जिस तरह से जमीन का हैंडओवर किया गया है. वहीं पर गड़बड़ी की गई है क्योंकि हैंडओवर की प्रक्रिया कागजी तौर पर की ही नहीं गई है जिसका फायदा जमीन माफिया सहित कई लोगों ने उठाया है.
बोकारो वन भूमि घोटाले मामले की जांच जैसे आगे बढ़ेगी वैसे ही कई बड़े अधिकारी और सरकारी कर्मी के साथ-साथ जमीन माफिया सीआईडी के जद में आते जा रहे हैं, सभी लोगों पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही थी. इस मामले को लेकर झारखंड के तत्कालीन डीजीपी अनुराग गुप्ता के निर्देश पर जमीन घोटाले मामले की जांच सीआईडी के सपुर्द कर दी गई थी. सीआईडी ने बोकारो के सेक्टर 12 थाना में दर्ज कांड संख्या 32/2024 को टेकओवर कर अपनी जांच शुरू की थी.


