Monday, April 6, 2026

सतुआइन पर्व 14 अप्रैल को वैशाख कृष्ण द्वादशी पर मनाया जाएगा, जिसमें सूर्य उपासना और पितरों की तृप्ति का विशेष महत्व है।

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सतुआइन पर्व 14 अप्रैल को वैशाख कृष्ण द्वादशी पर मनाया जाएगा, जिसमें सूर्य उपासना और पितरों की तृप्ति का विशेष महत्व है। इस दिन त्रिपुष्कर योग सहित कई शुभ संयोग बन रहे हैं। श्रद्धालु सत्तू, गुड़, चना आदि का दान करते हैं।

इस वर्ष सतुआइन का पर्व 14 अप्रैल को वैशाख कृष्ण द्वादशी के दिन मनाया जाएगा। यह पर्व विशेष रूप से सूर्य उपासना और पितरों की तृप्ति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। श्रद्धालु इस दिन पूजा-पाठ और दान-पुण्य कर पुण्य अर्जित करते हैं।

त्रिपुष्कर योग में बनेगा खास संयोग

अनुसार इस बार सत्तुआनी पर दुर्लभ संयोग बन रहा है। सूर्य के मेष राशि में प्रवेश के साथ शतभिषा नक्षत्र, शुक्ल योग, सिद्ध योग और त्रिपुष्कर योग का मेल इस दिन को और अधिक शुभ बना रहा है।

सूर्य उपासना और दान का महत्व

इस दिन श्रद्धालु भगवान सूर्य की पूजा करते हैं और सत्तू, गुड़, चना, पंखा, जल से भरा घट, आम व मौसमी फल का दान करते हैं। मान्यता है कि इससे सूर्यदेव की कृपा प्राप्त होती है और पितरों को संतोष मिलता है।

सत्तू और आम खाने की परंपरा

सूर्य के मीन राशि से मेष राशि में प्रवेश के साथ ही गर्मी की शुरुआत मानी जाती है। ऐसे में सत्तू और कच्चे आम से बनी चटनी का सेवन शरीर को ठंडक देता है। यही कारण है कि इस दिन सत्तू खाने की परंपरा विशेष महत्व रखती है।

15 अप्रैल को मनाया जाएगा जुड़शीतल

सतुआइन के अगले दिन 15 अप्रैल को जुड़शीतल पर्व मनाया जाएगा। यह पर्व पूर्वभाद्र नक्षत्र और ब्रह्म योग में पड़ रहा है, जिसे भी अत्यंत शुभ माना जाता है।

जल के छींटे से मिलती है शीतलता

जुड़शीतल में रातभर रखे जल को सुबह परिवार के सदस्यों पर छिड़का जाता है। मान्यता है कि इससे शरीर, मन और मस्तिष्क को शीतलता और स्वास्थ्य लाभ मिलता है।

आस्था और परंपरा का संगम

दोनों पर्व भारतीय परंपरा और आस्था के प्रतीक हैं। सत्तुआनी और जुड़शीतल के माध्यम से लोग न केवल धार्मिक कर्तव्यों का पालन करते हैं, बल्कि मौसम के अनुसार जीवनशैली अपनाने का संदेश भी मिलता है।

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