आम आदमी पार्टी (AAP) के लोकसभा सांसद मालविंदर सिंह कंग ने शुक्रवार को एक कानून बनाने की मांग की, जिसके तहत शादी से पहले दूल्हों के लिए डोपिंग और मेडिकल टेस्ट अनिवार्य हों. उन्होंने इसके पीछे तलाक और घरेलू हिंसा के बढ़ते मामलों का हवाला दिया. संसद में ‘जीरो आवर’ के दौरान बोलते हुए, आनंदपुर साहिब का प्रतिनिधित्व करने वाले कंग ने कहा कि पूरे देश में घरेलु हिंसा और पारिवारिक विघटन के मामले बढ़ रहे हैं.
उन्होंने कहा कि जहां परिवार शादी से पहले लड़की की शिक्षा, चरित्र और पृष्ठभूमि की पूरी जांच-पड़ताल करते हैं, वहीं पुरुषों के मामले में वे अक्सर ऐसी ही जांच को नजरअंदाज कर देते हैं. उन्होंने आगे कहा कि पुरुषों में नशे की लत, गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं और आपराधिक प्रवृत्तियां जैसी बातें अक्सर शादी के बाद ही सामने आती हैं, जिसका महिलाओं पर बुरा असर पड़ता है. कांग ने केंद्र और राज्य, दोनों सरकारों से इस संबंध में कड़े कदम उठाने का आग्रह किया और दूल्हों के लिए अनिवार्य डोपिंग टेस्ट और मेडिकल फिटनेस सर्टिफिकेट लागू करने का प्रस्ताव रखा
ऐसे में चलिए आज इस खबर के माध्यम से जानते हैं कि क्या होता है डोपिंग टेस्ट और इसका इस्तेमाल किस लिए किया जाता है…
डोप टेस्ट क्या है?
डोपिंग टेस्ट (जिसे “डोप टेस्ट” भी कहा जाता है) एक फिशियल प्रोसेस है, जिसका उपयोग शरीर में नशीले या साइकोएक्टिव पदार्थों की मौजूदगी का पता लगाने के लिए किया जाता है. साइकोएक्टिव पदार्थ ऐसे केमिकल्स या दवाएं होती हैं, जो सीधे तौर पर सेंट्रल नर्वस सिस्टम को प्रभावित करती हैं और मस्तिष्क के कामकाज पर असर डालती हैं. ये पदार्थ किसी व्यक्ति के मूड, चेतना, बोध, सोच, व्यवहार और संवेदनाओं में बदलाव ला सकते हैं खेलों में, इस तरह की टेस्टिंग मुख्य रूप से यह सुनिश्चित करने के लिए की जाती है कि प्रतियोगी निष्पक्ष और ईमानदारी से प्रतिस्पर्धा करें, और इसे वर्ल्ड एंटी-डोपिंग एजेंसी (WADA) जैसे संगठनों द्वारा विनियमित किया जाता है. विश्व एंटी-डोपिंग एजेंसी (WADA) द्वारा विश्व स्तर पर विनियमित, इन परीक्षणों को निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने, एथलीटों के स्वास्थ्य की रक्षा करने और खेलों की गरिमा को बनाए रखने के लिए डिजाइन किया गया है.
डोप टेस्ट कैसे किया जाता है?
डोप टेस्ट कई तरीकों से किया जाता है। इसके लिए शरीर से फ्लूड लिया जाता है, जैसे कि पेशाब, लार, पसीना, बाल या नाखूनों के सैंपल लिए जाते हैं. इस टेस्ट के लिए सबसे ज्यादा पेशाब के सैंपल इस्तेमाल किए जाते हैं. सबसे पहले, तुरंत संकेत पाने के लिए एक शुरुआती टेस्ट (इम्यूनोएसे) किया जाता है, इसके बाद, पुष्टि के लिए ज्यादा सख्त और महंगे टेस्ट (जिन्हें गैस क्रोमैटोग्राफी और मास स्पेक्ट्रोमेट्री कहा जाता है) किए जाते हैं.


