ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव और युद्ध जैसी स्थितियों ने पूरी दुनिया, विशेषकर एशिया के ऊर्जा बाजार को हिलाकर रख दिया है. वर्तमान में एशिया के कई देश एक बड़ी मुसीबत का सामना कर रहे हैं. युद्ध के कारण प्राकृतिक गैस (LNG) की सप्लाई रुक गई है, जिसके चलते भारत, दक्षिण कोरिया और वियतनाम जैसे देश अपनी बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए फिर से ‘कोयले’ की ओर लौट रहे हैं.
होर्मुज जलडमरूमध्य: एक बड़ी रुकावट
एशिया की ऊर्जा निर्भरता का सबसे बड़ा कारण भौगोलिक है. एशिया की जरूरत का लगभग 20% तेल और गैस ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ से होकर गुजरता है. युद्ध के कारण यह समुद्री रास्ता असुरक्षित हो गया है, जिससे जहाजों की आवाजाही ठप है. जो गैस (LNG) कोयले के मुकाबले कम प्रदूषण फैलाती थी, अब उसकी कमी ने देशों को फिर से पुराने और प्रदूषित ईंधन ‘कोयले’ का उपयोग बढ़ाने पर मजबूर कर दिया है.

भारत और अन्य एशियाई देशों की स्थिति
भारत: भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कोयला उपभोक्ता है. भीषण गर्मी और बढ़ती मांग को देखते हुए भारत ने कोयले का उत्पादन और उपयोग बढ़ा दिया है. विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के पास लगभग तीन महीने का कोयला स्टॉक है, लेकिन गैस की कमी के कारण छोटे उद्योगों और बिजली घरों पर दबाव बढ़ गया है.
दक्षिण कोरिया: यहाँ की सरकार ने पहले कोयले से चलने वाले बिजली घरों पर पाबंदी लगाई थी, लेकिन अब गैस की कमी को देखते हुए उन पाबंदियों को हटा लिया गया है.
इंडोनेशिया: दुनिया का सबसे बड़ा कोयला निर्यातक होने के बावजूद, इंडोनेशिया अब अपना कोयला दूसरे देशों को बेचने के बजाय अपने घरेलू उपयोग के लिए बचाकर रख रहा है. इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोयले की कीमतें बढ़ गई हैं
वियतनाम और थाईलैंड: ये देश भी बिजली संकट से बचने के लिए कोयले का आयात बढ़ा रहे हैं और पुराने बिजली घरों को पूरी क्षमता से चला रहे हैं.
पर्यावरण और स्वास्थ्य पर खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि कोयले की ओर यह वापसी एक ‘अस्थायी समाधान’ तो हो सकती है, लेकिन इसके परिणाम भयानक होंगे.
- बढ़ता प्रदूषण: कोयला जलाने से निकलने वाले सूक्ष्म कण (PM2.5) फेफड़ों और दिल की बीमारियों का कारण बनते हैं. भारत और वियतनाम जैसे देशों में हवा पहले ही खराब है, अब नियमों में ढील देने से ‘स्मॉग’ की समस्या और गंभीर हो जाएगी.
- जलवायु परिवर्तन: कोयला सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जन करने वाला ईंधन है. इससे ग्लोबल वार्मिंग बढ़ेगी और एशिया के उन लक्ष्यों को झटका लगेगा जो उन्होंने प्रदूषण कम करने के लिए तय किए थे.
- महंगाई: युद्ध शुरू होने के बाद से एशियाई बाजार में कोयले की कीमतों में 13% तक का उछाल आया है. ईंधन महंगा होने से बिजली की दरें और आम जरूरत की चीजों के दाम बढ़ सकते हैं.
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट एक चेतावनी है. ‘पावरिंग पास्ट कोल एलायंस’ की जूलिया स्कोरुप्सका कहती हैं कि यह संकट हमें याद दिलाता है कि जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) पर निर्भरता कितनी खतरनाक है. लंबे समय के लिए ‘अक्षय ऊर्जा’ (सौर और पवन ऊर्जा) ही एकमात्र सुरक्षित विकल्प है.

जूलिया स्कोरुप्सका का कहना है कि, फिलहाल एशिया के सामने अपनी अर्थव्यवस्था को चालू रखने की चुनौती है. लेकिन कोयले का बढ़ता उपयोग न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रहा है, बल्कि यह भविष्य में आने वाले बड़े संकटों की नींव भी रख रहा है. देशों को अब अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए केवल आयातित गैस या कोयले पर निर्भर रहने के बजाय, सौर और पवन ऊर्जा जैसे स्वदेशी संसाधनों पर तेजी से काम करना होगा.


