Friday, February 20, 2026

झारखंड में आदिवासी भाषाएं विलुप्ति के कगार पर हैं, जबकि राज्य गठन का उद्देश्य भाषा-संस्कृति बचाना था।

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झारखंड में आदिवासी भाषाएं विलुप्ति के कगार पर हैं, जबकि राज्य गठन का उद्देश्य भाषा-संस्कृति बचाना था। रांची विश्वविद्यालय में भी असुर, बिरहोर और पहाड़िया जैसी प्राचीन जनजातियों की भाषाओं (असुरी, बिरहोरी, मालतो) की पढ़ाई नहीं होती।

रांची। झारखंड में आदिवासी भाषाएं विलुप्ति के कगार पर पहुंच रही हैं। जिस उद्देश्य से झारखंड का गठन हुआ, भाषा-संस्कृति को बचाने का संकल्प लिया गया था, वह पूरा होता नहीं दिख रहा है। राज्य के सबसे पुराने और बड़े विश्वविद्यालय में केवल पांच आदिवासी भाषाएं एवं चार क्षेत्रीय भाषाओं की पढ़ाई ही हो रही है, 

जबकि सबसे जरूरी है विलुप्त हो रही भाषाओं को बचाने का प्रयास। झारखंड की सबसे प्राचीन जनजाति असुर, बिरहोर और पहाड़िया की मलतो भाषा की पढ़ाई नहीं होती। असुर नेतरहाट के पाट पर रहते हैं। 

पहाड़िया संताल परगना में पहाड़ पर ही निवास करते हैं और बिरहोर घुमंतू हैं। इनकी अपनी भाषाएं हैं। इनकी आबादी भी कम है। इन्हें आदिम जनजाति की श्रेणी में रखा गया है। इसके बावजूद इनकी भाषा को लेकर कोई काम नहीं हो रहा। 

झारखंड बने 25 साल हो गए

झारखंड बने 25 साल हो गए, लेकिन किसी भी सरकार ने सुध नहीं ली। विश्वविद्यालय भी आगे नहीं बढ़ सके। रांची विवि में दो साल पहले आसुरी व पहाड़िया भाषा की पढ़ाई की घोषणा की गई थी, लेकिन अब तक इसका पाठ्यक्रम ही नहीं बन पाया। 

विलुप्तप्राय जनजातियों की संख्या कितनी है, भाषा की क्या स्थिति है, इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है। राज्य सरकार को डा रामदयाल मुंडा जनजातीय शोध संस्थान ने भी इन जातियों के बारे में अद्यतन जानकारी नहीं रखता।

सन् 1980 में रांची विश्वविद्यालय में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग की स्थापना ऐतिहासिक पहल थी, जिससे कई प्रमुख भाषाओं को अकादमिक आधार मिला। परंतु असुरी, बिरहोरी, मालतो जैसी आदिम भाषाएं अब भी पाठ्यक्रम से बाहर हैं। शिक्षा से बाहर रहना किसी भी भाषा के लिए सबसे बड़ा खतरा है। यदि प्राथमिक स्तर से मातृभाषा आधारित शिक्षा लागू नहीं की गई, तो ये भाषाएं केवल स्मृति में बनकर रह जाएंगी।- डॉ, बीरेन्द्र कुमार महतो, सहायक प्राध्यापक, स्नातकोत्तर नागपुरी विभाग, रांची विवि।

भाषा संरक्षण केवल भावनात्मक मुद्दा नहीं, नीतिगत विषय है। सरकार को लुप्तप्राय भाषाओं के लिए विशेष पाठ्यक्रम, प्रशिक्षण और प्रकाशन योजनाएं शुरू करनी चाहिए। साथ ही समुदाय आधारित भाषा उत्सव, बाल साहित्य और लोकमंचन से सामाजिक प्रयोग बढ़ाना होगा। भाषा तभी बचेगी जब वह जीवन में जीवंत रहेगी, केवल समारोहों में नहीं।- डॉ बंदे खलखो, सहायक प्राध्यापक, स्नातकोत्तर कुडुख विभाग, रांची विवि

झारखंड की लुप्तप्राय भाषाओं में लोकज्ञान, प्रकृति-बोध और परंपरागत विज्ञान छिपा है। अभी सबसे जरूरी काम है-शब्दकोश, लोककथा, लोकगीत और व्याकरण का त्वरित दस्तावेजीकरण। आडियो-वीडियो रिकार्डिंग और डिजिटल आर्काइव बनाकर आने वाली पीढ़ियों के लिए भाषाई धरोहर सुरक्षित की जा सकती है।- डॉ दिनेश कुमार दिनमणि, सहायक प्राध्यापक

भाषा का जीवन उसके दैनिक प्रयोग में है। आदिम जनजातीय भाषाओं के बोलने वाले तेजी से घट रहे हैं, क्योंकि नई पीढ़ी आधुनिक संपर्क भाषाओं की ओर जा रही है। सामाजिक सम्मान और रोजगार से भाषा को जोड़ना होगा। जब तक लोग अपनी मातृभाषा बोलने में गर्व महसूस नहीं करेंगे, तब तक संरक्षण की योजनाएं कागज पर ही रहेंगी।- डॉ किशोर सुरिन, सहायक प्राध्यापक, स्नातकोत्तर मुंडारी विभाग, रांची विश्वविद्यालय, रांची।

1980 में की गई थी स्थापना

रांची विश्वविद्यालय में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग की स्थापना वर्ष 1980 में कुमार सुरेश सिंह की पहल पर की गई। विभाग के प्रथम प्रभारी विभागाध्यक्ष डॉ बिशेश्वर प्रसाद केशरी बनाए गए। 

इसकी स्थापना का मूल उद्देश्य झारखंड की जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं जैसे- संताली, मुंडारी, हो, कुड़ुख, खड़िया तथा खोरठा, नागपुरी, कुरमाली, पंचपरगनिया के संरक्षण, व्यवस्थित अध्ययन, अनुसंधान और अध्यापन को संस्थागत आधार देना था। 

प्रारंभ में सात भाषाओं से शिक्षण कार्य शुरू हुआ, जो आगे चलकर विस्तृत अकादमिक ढांचे में विकसित हुआ। वर्तमान में नौ प्रमुख भाषाओं में स्नातकोत्तर, शोध एवं उच्च अध्ययन कार्यक्रम संचालित हैं। 

वर्ष 2021 में इसे पुनर्गठित कर स्वतंत्र “फैकल्टी आफ ट्राइबल एंड रीजनल लैंग्वेज” का स्वरूप दिया गया, जिससे यह संस्थान भाषाई विरासत संरक्षण और अकादमिक अनुसंधान का प्रमुख केंद्र बन गया।

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