रांची में एंटीबायोटिक्स की ओटीसी बिक्री पर नियमों के बावजूद प्रभावी रोक नहीं लग पा रही है, जिससे एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) का खतरा बढ़ रहा है। निगरानी तंत्र कमजोर है और औषधि निरीक्षकों की कमी है। इस समस्या से निपटने के लिए डिजिटल व्यवस्था, खासकर ब्लॉकचेन तकनीक और डिजिटल पर्ची को अनिवार्य करने पर जोर दिया जा रहा है। जन जागरूकता और ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण भी एंटीबायोटिक के दुरुपयोग को रोकने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
रांची। जिले में एंटीबायोटिक्स की ओटीसी (बिना चिकित्सकीय पर्ची) बिक्री रोकने को लेकर स्वास्थ्य विभाग के नियम तो कड़े हैं, लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल उलट है। दवाखानों में आज भी बिना डाक्टर की पर्ची के एंटीबायोटिक्स खुलेआम बिक रही हैं।
इससे एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) का खतरा तेजी से बढ़ रहा है, जो भविष्य में साधारण संक्रमणों को भी जानलेवा बना सकता है।
स्वास्थ्य विभाग और औषधि नियंत्रण तंत्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती निगरानी और प्रमाणन की है। नियमों के बावजूद ओटीसी बिक्री पर प्रभावी रोक नहीं लग पा रही है।
जिला स्तर पर औषधि निरीक्षकों की संख्या सीमित है, जबकि दवाखानों की संख्या लगातार बढ़ रही है। ऐसे में हर दुकान की नियमित जांच व्यावहारिक रूप से संभव नहीं हो पा रही।
लेकिन अब ओटीसी बिक्री पर प्रभावी रोक के लिए डिजिटल व्यवस्था यानी कि ब्लॉकचेन टेक्नोलाजी पर जोर दिया जा रहा है।
नियम हैं, लेकिन निगरानी कमजोर
औषधि निदेशालय के संयुक्त निदेशक सुमंत कुमार तिवारी ने स्पष्ट किया कि एंटीबायोटिक्स की ओटीसी बिक्री रोकने के लिए कानून में सख्त प्रावधान हैं। बिना डाक्टर की पर्ची के एंटीबायोटिक बेचना प्रतिबंधित है।
इसके बावजूद दवाओं की बिक्री जारी है। उन्होंने बताया कि समस्या यह है कि बिना पर्ची दवा देने को प्रमाणित करना कठिन होता है। स्थिति यह है कि ड्रग डिपार्टमेंट को यह पता नहीं कितना एंटीबायोटिक्स आ रहा है और कितना जा रहा है।
कई बार दवा विक्रेता अपने रिकार्ड में किसी भी डाक्टर का नाम दर्ज कर दवा बेच देता है। ऐसे मामलों में मौके पर ठोस सबूत मिलना मुश्किल हो जाता है। लेकिन भी जब कहीं से शिकायत आती है तो उसकी जांच कर कार्रवाई की जाती है।
पिछले एक वर्ष में जिले में औषधि निरीक्षण के दौरान कुछ दवाखानों पर कार्रवाई जरूर हुई है, लेकिन यह संख्या समस्या की गंभीरता के अनुपात में काफी कम मानी जा रही है।
विभागीय स्तर पर चेतावनी, नोटिस और सीमित मामलों में लाइसेंस निलंबन जैसी कार्रवाई की गई है, पर इससे व्यापक असर नहीं दिखा।
एएमआर का बढ़ता खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि बार-बार और बिना जरूरत एंटीबायोटिक्स लेने से शरीर में दवाओं के प्रति प्रतिरोध विकसित हो जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि गंभीर स्थिति में वही एंटीबायोटिक काम नहीं करती, जिससे इलाज जटिल और महंगा हो जाता है।
सुमंत कुमार तिवारी ने कहा, “लोगों को यह समझना होगा कि हर बुखार, खांसी या दर्द में एंटीबायोटिक लेना खतरनाक है। जरूरत पड़ने पर वही दवा बेअसर हो जाती है। ड्रग रेजिस्टेंस के कई मामले सामने आ रहे हैं।”
डिजिटलाइजेशन ही समाधान
ओटीसी बिक्री पर प्रभावी रोक के लिए स्वास्थ्य विभाग डिजिटल व्यवस्था को सबसे कारगर उपाय मान रहा है। औषधि निदेशालय के अनुसार केंद्र सरकार की ओर से एक ऐसी योजना प्रस्तावित है, जिसमें डाक्टर की डिजिटल पर्ची के आधार पर ही केमिस्ट दवा दे सकेगा।
इस व्यवस्था में डाक्टर द्वारा जारी डिजिटल पर्ची की पीडीएफ को दवा बिक्री के बिल के साथ अनिवार्य रूप से जोड़ा जाएगा। इससे हर एंटीबायोटिक की बिक्री का डिजिटल रिकॉर्ड बनेगा और फर्जी पर्ची या मनमानी बिक्री पर अंकुश लगेगा।
डॉक्टरों और अन्य क्षेत्रों पर भी सवाल
एंटीबायोटिक्स के दुरुपयोग का दायरा केवल दवाखानों तक सीमित नहीं है। चिकित्सकों द्वारा एंटीबायोटिक के अनियंत्रित उपयोग पर भी ठोस निगरानी तंत्र का अभाव है।
न तो डॉक्टरों के लिए सख्त प्रिस्क्रिप्शन आडिट की व्यवस्था है और न ही मौजूदा दिशा निर्देशों की प्रभावी निगरानी होती है। इसी तरह कृषि और पशुपालन क्षेत्र में एंटीबायोटिक्स के इस्तेमाल को नियंत्रित करने के लिए भी स्पष्ट और कठोर नियमों की कमी है।
पशुओं में एंटीबायोटिक्स के अत्यधिक उपयोग का असर अंतत मानव स्वास्थ्य पर पड़ता है। एएमआर से लड़ाई केवल स्वास्थ्य विभाग की नहीं, बल्कि वन हेल्थ दृष्टिकोण की मांग करती है। मानव, पशु और पर्यावरण तीनों क्षेत्रों में समन्वित नीति और निगरानी की जरूरत है।
फिलहाल इन विभागों के बीच तालमेल की कमी भी एएमआर को नियंत्रित करने में बड़ी बाधा बन रही है। साथ ही कानून और तकनीक के साथ-साथ जन जागरूकता सबसे अहम है।
जब तक लोग खुद यह नहीं समझेंगे कि बिना डाक्टर की सलाह एंटीबायोटिक लेना खतरनाक है, तब तक ओटीसी बिक्री पर पूरी तरह रोक लगाना मुश्किल होगा।
ब्लॉकचेन टेक्नोलाजी क्या है
ब्लॉकचेन टेक्नोलाजी एक नई तकनीक है, जिसे डिस्ट्रीब्यूटेड लेजर टेक्नोलाजी (डीएलटी) के नाम से जाना जाता है।
ब्लॉकचेन तकनीक की मदद से किसी भी डेटा या अन्य चीज को डिजिटल रूप में परिवर्तित और संग्रहीत किया जा सकता है। वास्तव में यह एक विनिमय प्रक्रिया है जो डेटा ब्लाकों पर काम करती है।


