Monday, March 16, 2026

लातेहार में सवर्ण समाज ने प्रस्तावित यूजीसी कानून के खिलाफ सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया।

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लातेहार में सवर्ण समाज ने प्रस्तावित यूजीसी कानून के खिलाफ सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया। माता-पिता और युवाओं ने शिक्षा में योग्यता व समान अवसर छिनने की आशंका जताई। उन्होंने इस कानून को बच्चों के भविष्य पर कुठाराघात बताया। समाज ने राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपकर कानून वापस लेने या न्यायपूर्ण संशोधन की मांग की, चेतावनी दी कि शिक्षा से न्याय छिना तो भविष्य अंधकारमय होगा।

 चंदवा की सड़कों पर सोमवार को सिर्फ एक रैली नहीं निकली थी, बल्कि वह माता–पिता की बेचैनी, युवाओं की टूटती उम्मीदों और समाज के गहरे दर्द की आवाज थी।

केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित यूजीसी कानून के खिलाफ सवर्ण समाज का आक्रोश शब्दों से आगे निकलकर सड़कों पर साफ दिखा।

लोगों ने कहा कि यह कानून शिक्षा सुधार नहीं, बल्कि उनके बच्चों के सपनों पर कुठाराघात है। विगत एक सप्ताह से समाज में बेचैनी लगातार बढ़ती दिख रही है।

28 जनवरी को राजेश सिंह के आवास परिसर में हुई बैठक में ही यह स्पष्ट हो गया था कि लोगों के दिलों में डर बैठ चुका है डर इस बात का कि कहीं उनके बच्चों से मेहनत, योग्यता और समान अवसर का अधिकार न छिन जाए।

सोमवार को वही डर आक्रोश बनकर रैली और सभा के रूप में फूट पड़ा। रैली में शामिल हर चेहरे पर एक ही सवाल था अगर शिक्षा भी निष्पक्ष नहीं रही, तो उनके बच्चों का भविष्य कहां जाएगा।

लोगों ने कहा कि पहले से ही सवर्ण समाज अनेक सामाजिक और कानूनी दबावों से गुजर रहा है, और अब यूजीसी बिल के जरिए उनके बच्चों को शिक्षा की दौड़ में और पीछे धकेलने की तैयारी की जा रही है।

सभा को संबोधित करते हुए जिला परिषद उपाध्यक्ष अनिता देवी भावुक हो उठीं। उन्होंने कहा कि देश की राजनीति अब सेवा नहीं, बल्कि समाज को तोड़ने का माध्यम बनती जा रही है।

जाति और वर्ग के नाम पर लोगों को बांटना देश के लिए घातक है। उन्होंने कहा कि बच्चों का भविष्य राजनीति का अखाड़ा नहीं बनना चाहिए। अगर शिक्षा में निष्पक्षता नहीं रही, तो भारत का उज्ज्वल भविष्य सिर्फ सपना बनकर रह जाएगा।

उपप्रमुख आश्विनी मिश्र ने भारी मन से कहा कि यूजीसी कानून शिक्षा की आत्मा को चोट पहुंचाने वाला काला कानून है। उन्होंने कहा कि जब एक मां-बाप अपने बच्चे को बेहतर भविष्य देने के लिए दिन-रात मेहनत करता है, तब ऐसे कानून उनकी उम्मीदों को तोड़ देते हैं।

सभा की अध्यक्षता कर रहे सुरेंद्र वैद्य सहित अन्य वक्ताओं ने कहा कि यह आंदोलन किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने हक, अपने बच्चों और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए है। वक्ताओं ने कहा कि पहले एससी-एसटी कानून और आरक्षण ने समाज को मानसिक रूप से तोड़ा, और अब यूजीसी बिल उस घाव पर नमक छिड़कने जैसा है।

वक्ताओं की आवाज़ में गुस्सा कम, पीड़ा ज्यादा थी। उन्होंने कहा कि सवर्ण समाज किसी से विशेष अधिकार नहीं मांग रहा, केवल इतना चाहता है कि शिक्षा में योग्यता, समानता और न्याय बना रहे। अगर यही छिन गया, तो देश का भविष्य अंधकार में चला जाएगा।

सभा और रैली के बाद सवर्ण समाज के प्रतिनिधिमंडल ने भारी मन से महामहिम राष्ट्रपति के नाम एक ज्ञापन चंदवा बीडीओ और सीओ को सौंपा।

ज्ञापन में सिर्फ मांग नहीं, बल्कि एक भावनात्मक अपील थी कि देश की शिक्षा व्यवस्था को राजनीति से बचाया जाए, और यूजीसी कानून को या तो तुरंत वापस लिया जाए या उसमें न्यायपूर्ण संशोधन किया जाए।

कार्यक्रम में मौजूद लोगों की आंखों में अपने बच्चों के सपनों को टूटने का डर साफ झलक रहा था, लेकिन साथ ही यह संकल्प भी था कि वे चुप नहीं बैठेंगे। समाज ने एक स्वर में कहा कि यह लड़ाई सत्ता से नहीं, बल्कि अपने भविष्य को बचाने की आखिरी कोशिश है।

मौके पर इंद्रभूषण पाठक, विजय शाही गोखुल, रामकृष्ण मिश्र, प्रमोद दुबे, संजय तिवारी, संजीव आजाद पप्पू, लाल राघवेंद्र प्रताप शाहदेव, संतोष सिंह, निर्मल भारती, अंकित तिवारी, सुभाष दुबे, मृत्युंजय सिंह सोनू, डा. रोहित त्रिपाठी, बिहारी सिंह, अशोक मिश्रा, अनीश पाठक, सुनील गिरी, गौरव दुबे, विपिन तिवारी, सौरभ श्रीवास्तव, गौतम दुबे, बबलू गिरी, प्रशांत सिंह, हिमांशु सिंह, अनिकेत मिश्रा समेत बड़ी संख्या में सवर्ण समाज के लोग उपस्थित रहे।

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