Tuesday, January 27, 2026

बसंत पंचमी से पहले देवघर में बाबा बैद्यनाथ धाम जलाभिषेक के लिए मिथिला से श्रद्धालु पहुंच रहे हैं.

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बसंत पंचमी से पहले देवघर में बाबा बैद्यनाथ धाम जलाभिषेक के लिए मिथिला से श्रद्धालु पहुंच रहे हैं.

देवघर: बाबा बैद्यनाथ धाम देश के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में गिना जाता है. यहां हर महीने कोई न कोई धार्मिक पर्व और परंपरा देखने को मिलती है. जिसे मनाने के लिए कई जिलों सहित राज्यों से श्रद्धालु पहुंचते हैं. फिलहाल आगामी बसंत पंचमी को लेकर बाबा धाम में श्रद्धालुओं की भीड़ लगातार बढ़ती जा रही है.

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मिथिला क्षेत्र से आने वाले श्रद्धालु बाबा बैद्यनाथ धाम पहुंचकर भगवान भोलेनाथ को तिलक चढ़ाते हैं और महाशिवरात्रि में होने वाले पूजा-पाठ को लेकर उन्हें अपने यहां आने का आमंत्रण देते हैं. मान्यता है कि भगवान भोलेनाथ का ससुराल मिथिला में है. क्योंकि माता पार्वती को जनकपुर, सीतामढ़ी की पुत्री माना जाता है. इसी विश्वास और परंपरा को दशकों से निभाया जा रहा है.

भक्त अपने कंधों पर 25 से 30 किलो तक का भार लेकर सैकड़ों किलोमीटर की कठिन यात्रा तय कर बाबा धाम पहुंचते हैं. जहां जलाभिषेक कर तिलकोत्सव मनाते हैं. बिहार के सीतामढ़ी जिले से आए श्रद्धालु बताते हैं कि वे लोग तीन-चार दिनों तक देवघर में रुककर भगवान भोलेनाथ का तिलक महोत्सव मनाते हैं और उन्हें अपने क्षेत्र में पधारने का निमंत्रण देते हैं. भगवान भोलेनाथ पर जलाभिषेक करने के बाद आपस में मिठाइयां बांटकर खुशियां भी मनाते हैं. यह परंपरा वर्षों पुरानी है, जिसे हर साल निभाया जाता है. श्रद्धालु खुले आसमान के नीचे रहते हैं और वहीं भोजन बनाकर ग्रहण करते हैं.

मंदिर के वरिष्ठ पंडा लंबोदर परिहस्त बताते हैं कि मिथिला से आने वाले सभी भक्त घी अर्पित कर जलाभिषेक करते हैं. वहीं मंदिर से जुड़े बाबा अंकित का कहना है कि मिथिलांचल के लोग स्वयं को भगवान भोलेनाथ का साला मानते हैं और इसी रिश्ते को निभाते हुए बाबा धाम में तिलकोत्सव मनाते हैं. श्रद्धालुओं के कांवर में उनके रोजमर्रा के सभी जरूरी सामान होते हैं. खाने-पीने से लेकर ठंड से बचाव के कपड़े तक सबकुछ कांवर में ही रहता है और जहां भी पड़ाव होता है, वहीं उसी सामान का उपयोग किया जाता है.

गौरतलब है कि 23 जनवरी को बसंत पंचमी और इसके बाद 15 फरवरी को महाशिवरात्रि का महापर्व मनाया जाएगा. इन पर्वों को लेकर मिथिला से आए तिलकहरू इन दिनों देवघर के मंदिर परिसर से लेकर सड़कों तक नजर आ रहे हैं. साथ ही बाबा धाम की धार्मिक परंपराओं को जीवंत बनाए हुए हैं.

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