Wednesday, March 18, 2026

आज 14 जनवरी 2026 को षटतिला एकादशी का पर्व मनाया जा रहा है.

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षटतिला एकादशी का व्रत कथा के बिना अधूरा माना जाता है. इस पावन कथा के श्रवण से व्रत का पूर्ण फल मिलता है, पापों का नाश होता है और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है.

आज 14 जनवरी 2026 को षटतिला एकादशी का पर्व मनाया जा रहा है. माघ चूंकि पावन मास कहलाता है इसलिये इस मास की एकादशियों का भी खास महत्व है. पंचांग के अनुसार माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी षटतिला एकादशी कहलाती है. यहां से जानें षटतिला एकादशी की व्रत कथा

षटतिला एकादशी की व्रत कथा

प्राचीन समय की बात है. एक नगर में एक साध्वी स्वभाव की ब्राह्मणी रहती थी. वह श्रीहरि भगवान विष्णु की अनन्य भक्त थी और अपने जीवन का प्रत्येक दिन प्रभु की भक्ति और व्रतों में व्यतीत करती थी. भगवान विष्णु के किसी भी व्रत को वह बिना चूके, पूरे नियम और श्रद्धा से करती थी. एक बार ब्राह्मणी ने अत्यंत श्रद्धा और संयम के साथ लगातार एक माह तक कठिन व्रत किया. इस व्रत के कारण उसका शरीर दुर्बल हो गया, लेकिन उसका मन पूरी तरह निर्मल और पवित्र हो गया. उसकी तपस्या देखकर भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए.

लेकिन भगवान विष्णु ने एक बात महसूस की. उन्होंने सोचा कि— “इस भक्त ने अपने शरीर को तो तपस्या से शुद्ध कर लिया है, इससे इसे वैकुंठ की प्राप्ति तो होगी, लेकिन मन की पूर्ण तृप्ति नहीं होगी.” दरअसल, ब्राह्मणी से एक भूल हो गई थी. उसने अपने व्रतों के दौरान कभी अन्न, धन या वस्त्र का दान नहीं किया था. इसी कारण उसे विष्णुलोक में पूर्ण संतोष नहीं मिलने वाला था.

ब्राह्मणी को उसकी भूल का अहसास कराने के लिए भगवान विष्णु स्वयं भिक्षुक का रूप धारण कर उसके द्वार पर पहुंचे. श्रद्धा से भरी ब्राह्मणी ने दान देना चाहा, लेकिन उसके पास देने के लिए कुछ भी नहीं था. अंततः उसने मिट्टी का एक पिंड भिक्षा के रूप में दे दिया. भगवान विष्णु उसे स्वीकार कर वहां से चले गए. कुछ समय बाद ब्राह्मणी ने इस लोक के सभी सुख भोगे और मृत्यु के पश्चात वह विष्णुलोक पहुंच गई. वहां उसे रहने के लिए केवल एक साधारण-सी कुटिया मिली, जिसमें किसी प्रकार का वैभव नहीं था, बस पास में एक आम का पेड़ था.

यह देखकर ब्राह्मणी ने भगवान विष्णु से विनम्रता से पूछा

“प्रभु, मैंने जीवन भर व्रत और पूजा की, फिर मुझे यह फल क्यों मिला?” तब भगवान विष्णु ने कहा— “तुमने व्रत तो किए, लेकिन कभी दान नहीं किया. यही कारण है कि तुम्हें यह फल प्राप्त हुआ है.” यह सुनकर ब्राह्मणी को गहरा पश्चाताप हुआ और उसने प्रभु से इसका उपाय पूछा.

तब भगवान विष्णु ने उसे बताया

“जब देवकन्याएं तुमसे मिलने आएं, तब उनसे षटतिला एकादशी व्रत की विधि और कथा पूछना. जब तक वे पूरी विधि न बता दें, तब तक कुटिया का द्वार मत खोलना.” भगवान की आज्ञा का पालन करते हुए ब्राह्मणी ने देवकन्याओं को भीतर प्रवेश नहीं दिया. अंततः देवकन्याओं ने उसे षटतिला एकादशी व्रत की संपूर्ण विधि और महत्व समझाया.

विधि जानकर ब्राह्मणी ने श्रद्धा भाव से षटतिला एकादशी व्रत किया. इस व्रत के प्रभाव से उसकी कुटिया धन-धान्य, सुख और समृद्धि से भर गई. साथ ही वह पहले से अधिक रूपवती और तेजस्वी हो गई. इस प्रकार षटतिला EKADASHI  के प्रभाव से ब्राह्मणी को पूर्ण सुख, संतोष और वैकुंठ की प्राप्ति हुई.

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