पलामू: इमली का स्वाद बंदरों के आतंक से राहत देगा. वन विभाग ने एक योजना तैयार की है. इस योजना के तहत अगले कुछ महीनो में बंदरों की गतिविधि वाले इलाके में एक लाख इमली के पेड़ लगाए जाएंगे. इमली के पेड़ पर फल लगने के बाद बंदर लोगों को तंग नहीं करेंगे और उनके फसलों को बर्बाद नहीं करेंगे.
दरअसल, पलामू का इलाका पलामू टाइगर रिजर्व से सटा हुआ है. पलामू टाइगर रिजर्व के बेतला नेशनल पार्क के इलाके में अकेले 10 हजार से भी अधिक बंदर मौजूद हैं. जबकि पलामू के आंतरिक जंगलों में भी बड़ी संख्या में बंदर एवं लंगूर मौजूद हैं. हाल के दिनों में बड़ी संख्या में बंदर जंगल से निकलकर ग्रामीण एवं शहरी इलाकों में दाखिल हो रहे हैं. ग्रामीण इलाकों में बंदर फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, जबकि शहरी इलाके में भी लोग परेशान हैं. वन विभाग ने एक योजना तैयार की है और पूरे पलामू में एक लाख इमली के पेड़ लगाने की योजना तैयार की है.
बंदरों को इमली का स्वाद काफी पसंद है, बंदरों की गतिविधि को देखते हुए पूरे जिले में एक लाख इमली के पेड़ लगाए जाएंगे. पेड़ पर इमली का फल लगने के बाद बंदर को उनका पसंदीदा खाना मिल जाएगा. जिससे ग्रामीण एवं शहरी इलाकों में उनकी गतिविधि भी कम हो जाएगी. पलामू के इलाके में बंदर नीलगाय समेत कई अन्य वन्य जीव को ध्यान में रखकर कई योजना भी तैयार की गई है. इमली के अलावा कटहल के पौधे भी लगाए जाएंगे
– सत्यम कुमार, डीएफओ, पलामूकोविड-19 काल के बाद बढ़ी है बंदरों की गतिविधि, स्थानीय लोग भी दे रहे हैं लालच
कोविड-19 काल के बाद से पलामू समेत अन्य इलाकों में बंदर एवं लंगूर की गतिविधि बढ़ी है. जंगल से निकल कर वे मानव आबादी के बीच पहुंच रहे हैं. कई इलाकों में लोग सड़क के किनारे बंदरों को स्नैक्स एवं फल दे रहे हैं, जिस कारण बंदरों का व्यवहार भी बदला है और वह मानव के भोजन की तरफ आकर्षित भी हुए हैं. कई इलाकों में चेतावनी के बोर्ड लगाए गए हैं और कानूनी कार्रवाई की भी बात कही गई है.
बंदरों से होने वाले नुकसान का मिलता है मुआवजावन विभाग के द्वारा बंदरों से होने वाले फसलों के नुकसान का मुआवजा भी दिया जाता है. किसान या पीड़ित व्यक्ति को एक फॉर्म भरना पड़ता है. इस फॉर्म पर स्थानीय अंचल कार्यालय एवं स्थानीय जनप्रतिनिधि के द्वारा सत्यापन करवाया जाता है. बाद में वन विभाग के कर्मी दवा का आकलन करते हैं और मुआवजा की राशि तय की जाती है. हालांकि पलामू के इलाके में बेहद ही कम लोग हैं, जिन्होंने बंदरों से होने वाले नुकसान के लिए आवेदन दिया है या दावा किया है.


