रांचीः पूर्वी सिंहभूम जिला के घाटशिला विधानसभा सीट के लिए उपचुनाव होना है. लेकिन चुनाव की तारीख के दहलीज पर आने के बावजूद अबतक दोनों पार्टियों ने प्रत्याशियों के नाम की घोषणा नहीं की है. एसटी सीट की जंग पर सस्पेंस बनाने की क्या हो सकती है वजह. क्यों पुराने ट्रेंड को नहीं आजमा रहा है झामुमो. राजनीति के जानकार कैसे देख रहे हैं इस खेल को.
वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार के मुताबिक घाटशिला के सस्पेंस के पीछे सीएम हेमंत सोरेन की सोची समझी और नपी-तुली चाल हो सकती है. संभव है कि वे विपक्ष को मैसेज देना चाह रहे हों कि उनकी आदिवासी वोट बैंक में कितनी मजबूत पकड़ हो चुकी है. ऐसा नहीं होता तो अबतक दिवंगत रामदास सोरेन के पुत्र सोमेश सोरेन को मंत्री बना दिया गया होता.
पत्रकार आनंद कुमार के मुताबिक रामदास सोरेन के निधन पर जब सीएम शोक सांत्वना देने पहुंचे थे, तब पूरे परिवार के साथ अलग से राय मशविरा भी किया था. उसी मुलाकात के बाद तय हो गया था कि सोमेश को ही चुनाव लड़ना है. लेकिन मंत्री बनाने वाली चाल ऐन मौके पर बदल दी गई.
अब सवाल है कि मधुपुर में मंत्री हाजी हुसैन अंसारी के निधन पर उनके पुत्र हफीजुल हसन और डुमरी में मंत्री जगरनाथ महतो के निधन पर उनकी पत्नी बेबी देवी को मंत्री क्यों बनाया गया. इसकी वजह वोट समीकरण हो सकता है. क्योंकि तब झामुमो को अल्पसंख्यक और कुर्मी वोट बैंक को साधने का दबाव था. लेकिन घाटशिला में झामुमो के सामने कोई मजबूत दावेदार नहीं है. आदिवासी हार्टलैंड में झामुमो का जलवा बरकरार है. मंईयां सम्मान योजना ने भी हेमंत सोरेन को महिलाओं का विश्वास जीतने में मदद की है.
अगर बात भाजपा कि करें तो घाटशिला में बाबूलाल सोरेन के अलावा कोई विकल्प नहीं दिख रहा है. यहां चंपई सोरेन भी मेहनत कर रहे हैं. भाजपा के पास दूसरा कोई मजबूत चेहरा नहीं है. घाटशिला के चुनावी इतिहास में सिर्फ 2014 में भाजपा की जीत हुई थी तब मोदी फैक्टर चरम पर था. उसके बाद भाजपा कभी रेस में नहीं आई. अब चंपई सोरेन के पुत्र बाबूलाल सोरेन के अलावा भाजपा के पास कोई विकल्प नहीं दिख रहा है. इसलिए पत्ता खोलने की जल्दबाजी का कोई मतलब नहीं दिख रहा है.
झारखंड राज्य बनने के बाद साल 2005 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान इस सीट पर कांग्रेस के प्रदीप कुमार बलमुचू की जीत हुई थी. तब बतौर निर्दलीय रामदास सोरेन दूसरे नंबर पर रहे थे. भाजपा के रामदास हांसदा तीसरे नंबर पर थे. 2009 के चुनाव में झामुमो की टिकट पर रामदास सोरेन की जीत हुई. उन्होंने कांग्रेस के प्रदीप कुमार बलमुचू को महज 1,192 वोट के अंतर से हराया था. इस चुनाव में भाजपा प्रत्याशी रहे सूर्य सिंह बेसरा तीसरे स्थान पर थे. आजसू प्रत्याशी चौथे स्थान पर रही.
2014 के चुनाव में समीकरण बदल गया. भाजपा के लक्ष्मण टुडू ने झामुमो के रामदास सोरेन को 6,403 वोट के अंतर से हरा दिया. इस चुनाव में कांग्रेस की सिंड्रेला बलमुचू तीसरे स्थान पर रहीं. 2019 के चुनाव में झामुमो के रामदास सोरेन ने कमबैक करते हुए भाजपा प्रत्याशी लखन चंद्र मार्डी के हरा दिया. इस चुनाव में गठबंधन की वजह से कांग्रेस का पत्ता कटने पर प्रदीप बलमुचू ने आजसू की टिकट पर दांव खेला लेकिन तीसरे स्थान पर रहे.
2024 में मुकाबला एनडीए और इंडिया गठबंधन के बीच था. झामुमो के रामदास सोरेन के सामने पूर्व सीएम चंपई सोरेन के पुत्र बाबूलाल सोरेन भाजपा प्रत्याशी बनकर आए थे लेकिन उनकी नहीं चली. रामदास सोरेन ने 22 हजार से ज्यादा वोट के अंतर से बाबूलाल सोरेन को हरा दिया. घाटशिला में संगठनात्मक रुप से भी भाजपा कमजोर है.
घाटशिला उपचुनाव झामुमो और भाजपा के लिए इसलिए भी बेहद खास है. क्योंकि इसके नतीजे यह संदेश देने के लिए काफी होंगे कि एसटी के बीच झामुमो की पकड़ बरकरार है या भाजपा की स्वीकार्यता बढ़ी है. क्योंकि साल 2000 के चुनाव में जिस भाजपा के पास एसटी के लिए रिजर्व 28 सीटों में से 14 सीटें थीं, वो अब एक सीट पर सिमट गयी है.
झामुमो से चंपई सोरेन नहीं आए होते तो भाजपा का सूपड़ा साफ हो जाता. 2024 के चुनाव में झामुमो के 20 और कांग्रेस के 07 एसटी सीटें जीत ने भाजपा को हाशिए पर ला दिया है. लिहाजा, घाटशिला उपचुनाव से झामुमो अपनी प्रतिष्ठा बरकरार रखना चाहेगी तो भाजपा 2014 के रिजल्ट को दोहराकर सरकार पर मनोवैज्ञानिक दबाव डालना चाहेगी.


