Sunday, March 29, 2026

सिनेमा के लिए AI कितना असरदार और खतरनाक….

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बॉलीवुड इन दिनों एक बड़े बदलाव और बहस के दौर से गुजर रहा है, जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) फिल्म इंडस्ट्री को तेजी से बदल रहा है. विजुअल इफेक्ट्स और एडिटिंग से लेकर पूरी फिल्में बनाने और यहां तक कि फिल्मों के अंत को बदलने तक, एआई का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसे यह चर्चा का विषय बन गया है.

जहां एक ओर कुछ लोग इसे लागत कम करने और क्रिएटिव्स को सशक्त बनाने वाला टूल मान रहे हैं, वहीं कई दिग्गज निर्देशक जैसे अनुराग कश्यप, विक्रमादित्य मोटवानी और अन्य इसे रचनात्मक स्वतंत्रता और कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए खतरा मानते हैं.

हाल ही में एआई के जरिए फिल्म ‘रांझणा’ की एंडिंग बदलने पर विवाद और भी गहरा गया. अगस्त में रिलीज हुए इस नए वर्जन के बाद फिल्म के लीड एक्टर धनुष ने सोशल मीडिया पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा, ‘इस नए अंत ने फिल्म की आत्मा ही छीन ली है. मेरी स्पष्ट आपत्ति के बावजूद संबंधित पक्षों ने यह बदलाव किया. यह कला और कलाकारों के लिए बेहद चिंताजनक है.

हाल ही में एंटरटेनमेंट फर्म कलेक्टिव आर्टिस्ट्स नेटवर्क द्वारा भारत की पहली पूरी तरह से एआई से बनाई गई फीचर फिल्म ‘चिरंजीवी हनुमान – दि एटरनल’ के एलान के बाद फिल्म इंडस्ट्री में हलचल मच गई है. यह फिल्म 2026 में रिलीज होने की उम्मीद है. इसका उद्देश्य प्राचीन पौराणिक कथाओं को अत्याधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर वैश्विक दर्शकों तक पहुंचाना है. फिल्म भगवान हनुमान की कथा पर आधारित है. हालांकि, इस पर अनुराग कश्यप, विक्रमादित्य मोटवानी जैसे निर्देशकों सहित कई फिल्मकारों ने नाराजगी जाहिर की.

मशहूर निर्देशक विक्रमादित्य मोटवाने ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, ‘और इसकी शुरुआत हो गई. अब जब फिल्में ‘एआई से बनी’ होंगी, तो लेखकों और निर्देशकों की क्या जरूरत?’ वहीं, निर्देशक अनुराग कश्यप ने इस परियोजना की कड़ी आलोचना की है. उन्होंने इसे मानवीय कलाकारों, लेखकों और निर्देशकों के साथ विश्वासघात करार दिया.

इतना ही नहीं, कश्यप ने कलेक्टिव आर्टिस्ट्स नेटवर्क के संस्थापक और समूह सीईओ विजय सुब्रमण्यम पर रचनाकारों की बजाय मुनाफे को प्राथमिकता देने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि यह फिल्म इंडस्ट्री के पतन की ओर इशारा करती है. उन्होंने कलाकारों से अपील की कि वे ऐसी एजेंसियों से दूरी बनाएं जो इस प्रकार की चीजों का समर्थन करती हैं.

निर्देशक आनंद एल राय
फिल्म निर्देशक आनंद एल राय ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय जाहिर की है. उन्होंने कहा, ‘एआई निश्चित तौर पर भविष्य है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह हमारे अतीत को बदल दे.’ रांझणा के निर्देशक कहते हैं कि उन्हें अपने फैंस के समर्थन से सुकून मिला, जिन्होंने ओरिजिनल रिलीज के 12 साल बाद भी बिना किसी बदलाव के इसे सपोर्ट दिया. राय ने कहा, ‘एआई पर उनकी प्रतिक्रिया मेरी प्रतिक्रिया से कहीं ज्यादा बड़ी है. यह मेरी फिल्म से ज्यादा उनकी फिल्म है.’

एआई पर निर्देशक शेखर कपूर की राय
कई कलाकार और फिल्म निर्माता जहां गहरी चिंताएं व्यक्त करते हैं, वहीं कुछ इस खतरे को नजरअंदाज कर कर रहे हैं. उन्हें लगता है कि एआई, अपने सर्वोत्तम रूप में, इंडस्ट्री को नए विचारों के लिए खोलेगा. निर्देशक शेखर कपूर जैसे समर्थक, एआई को एक ऐसे उपकरण के रूप में देखते हैं जो रचनाकारों को सशक्त बना सकता है

मासूम, मिस्टर इंडिया और 1998 की फिल्म एलिजाबेथ जैसी क्लासिक फिल्मों के निर्देशक शेखर कपूर, ‘ एक बड़े बजट की फिल्म बनाने की लागत की तुलना में एआई पर कुछ करने की लागत बहुत कम है और इसलिए एआई किसी व्यक्ति को कम संसाधनों में एक फीचर फिल्म बनाने की मदद कर सकता है. यही कारण है कि यह फिल्म निर्माण को लोकतांत्रिक बनाता है’

उन्होंने कहा, ‘एआई एक अत्यंत लोकतांत्रिक तकनीक है, जिन्हें अपनी कला दिखाने का मौका नहीं मिलता है, उन लोगों को अवसर देती है. भारत में कितने लोग फिल्म स्कूल जाने का खर्च उठा सकते हैं? एआई रचनाकारों को सशक्त बनाएगा, स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं के लिए समान अवसर उपलब्ध कराएगा और यहां तक कि पूरी तरह से नए, एआई-जनित फिल्म सितारों और पात्रों के निर्माण का मार्ग भी प्रशस्त करेगा’.

कपूर कहते हैं कि एआई अच्छी कहानी कहने की जगह नहीं ले सकता या स्क्रीन पर बेहतरीन अभिनय नहीं कर सकता. वह कहते हैं, ‘सबसे अच्छी कहानियां अप्रत्याशित होती हैं और एआई अप्रत्याशितता को संभाल नहीं सकता. इसके अलावा, एआई इस समय स्क्रीन पर बेहतरीन अभिनय नहीं कर सकता, क्योंकि अगर आप दुनिया के किसी भी बड़े सितारे को देखें, तो उनकी आंखें अभिनय करती हैं, उनका चेहरा नहीं’.

शिखर कपूर का मानना ​​है कि एआई का उदय शुरुआत में हाई बजट वाली फिल्मों जैसे सुपरहीरो फिल्मों पर असर डालेगा, जहां आप ‘एक्शन पर निर्भर’ होते हैं और ‘शायद पौराणिक फिल्मों पर भी जहां आप उन किरदारों को गढ़ सकते हैं.

शिखर कपूर कहते हैं, ‘लेकिन सबसे पहले यह उन बहुत महंगे बजट वाली फिल्मों को प्रभावित करेगा जिनमें बहुत ज्यादा वीएफएक्स का इस्तेमाल होता है, जैसे अवतार, धूम, स्टार वार्स… इन्हें एआई के जरिए बनाना आसान है, फिर कोई भी बड़ी मार्वल फिल्म जैसे बैटमैन, सुपरमैन, स्पाइडरमैन. जब आप इन्हें देखेंगे, तो पाएंगे कि इनमें कलाकार तो बदल जाते हैं, लेकिन ड्रेस नहीं बदलती. सुपरहीरो या सुपरवुमन को उसके ड्रेस से ही पहचाना जाता है. इन फिल्मों में सिर्फ 5 या 6 बुनियादी भावनाएं होती हैं. एक बार जब आपके पास बैटमैन होगा, तो आपको पता भी नहीं चलेगा कि अभिनेता कौन है. ज्यादातर सुपरहीरो फिल्में और शायद पौराणिक फिल्में एआई के जरिए बनाई जाएंगी और ऐसा करना आसान होगा क्योंकि आप असल में कलाकारों के अभिनय पर निर्भर नहीं होते, आप एक्शन पर निर्भर होते हैं.’

वह आगे कहते हैं, ‘हनुमान को एआई पर बनाना एक अच्छा विचार है. दुनिया में कहीं भी बैठे बच्चे (युवा महत्वाकांक्षी निर्देशक) न्यूयॉर्क या किसी भी जगह से गुजरते हुए स्पाइडरमैन बना सकते हैं. ये वो फिल्में हैं जो सबसे पहले बंद होने वाली हैं क्योंकि अब हमारे पास ऐसी फिल्में बनाने के लिए बड़े बजट नहीं हैं, युवा बच्चे ऐसा करो.’ कपूर आगे कहते हैं, ‘अब मैं मासूम: द नेक्स्ट जेनरेशन कर रहा हूं, लेकिन मैं मासूम को एआई पर नहीं बना सका क्योंकि यह भावनाओं और अभिनय पर बहुत निर्भर करता है’.

बता दें, शिखर कपूर अपने काम में एआई को सक्रिय रूप से शामिल कर रहे हैं (एक विज्ञान-कथा श्रृंखला, वारलॉर्ड के साथ), और मुंबई की धारावी बस्ती में एक एआई-केंद्रित फिल्म स्कूल स्थापित करने की भी योजना बना रहे हैं. बता दें, शेखर कपूर को सात अकादमी पुरस्कारों के लिए नामांकित किया गया था.=

वारलॉर्ड, मुंबई स्थित स्टूडियो ब्लो के सहयोग से एआई जनरेटेड साइंस फिक्शन सीरीज है. कपूर का यह भी मानना ​​है कि एआई केवल उन फिल्म निर्माताओं के लिए विनाशकारी होगा जो पूर्वानुमानित, फॉर्मूला फिल्में बनाते हैं. कपूर कहते हैं, ‘अगर आपकी फिल्में पूर्वानुमान योग्य हैं तो निश्चित रूप से, एआई आपको बरबाद कर देगा. हो सकता है कि कहीं कोई बच्चा वह कर सके जो आप कर रहे हैं.’

दीपांकर मुखर्जी
द नेक्स्ट कंटेंट स्टूडियो, स्टूडियो ब्लो के सह-संस्थापक और सीईओ, दीपांकर मुखर्जी, शिखर कपूर की बात से सहमत हैं. दीपांकर मुर्खजी कहते है, ‘एआई पारंपरिक लागत के एक अंश पर 100 गुना बढ़ाने का वादा करता है. यह फिल्म निर्माताओं को नई कहानियों, नए चेहरों, नई दुनिया को आजमाने में शामिल जोखिमों से बचने में सक्षम बनाता है. फिलहाल, हम एक ऐसी फीचर फिल्म पर काम कर रहे हैं जिसे इंडस्ट्री जगत पिछले 10 सालों से बेहद महंगा मानकर खारिज करता आ रहा है. एआई ने आखिरकार दुनिया और उसमें मौजूद किरदारों के साथ न्याय करना संभव बना दिया है. यहां तक कि मिस्टर कपूर की ‘वारलॉर्ड’, जिस पर हमें उनके साथ मिलकर काम करने पर गर्व है, एआई की मदद के बिना बनाना असंभव होता. एआई न केवल इस इंडस्ट्री को लाभ पहुंचाएगा, बल्कि इसे बचाएगा भी. भारतीय सिनेमा का आर्थिक मॉडल चरमरा गया है. और एआई इस समस्या का समाधान है.’

मुखर्जी इसकी पुष्टि करते हुए कहते हैं, ‘स्टूडियो ब्लो में, हमारा मानना ​​है कि एआई कैमरे की जगह लेता है, उसके पीछे के लोगों की नहीं. लेखक, निर्देशक, प्रोडक्शन डिजाइनर का दृष्टिकोण एआई के साथ और महत्वपूर्ण है. 2026 में विज्ञापन और सिनेमा में फिल्मों के निर्माण के तरीके में एक बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा. एआई प्री-प्रोडक्शन, प्रोडक्शन और वीएफएक्स वर्कफ़्लो का एक अभिन्न अंग बन जाएगा. यह कलाकारों को खत्म नहीं करेगा, बल्कि उनके काम करने के तरीके को फिर से परिभाषित करेगा. जिन फिल्म निर्माताओं से मैं मिलता हूं, उनमें से ज्यादातर या तो एआई का मजाक उड़ाते हैं या उससे डरते हैं. जब कलाकार एआई के साथ सहयोग करते हैं, तो एआई की संभावनाओं को देखकर उनका नजरिया बदल जाता है’.

निर्देशक शकुन बत्रा
‘एक मैं और एक तू’, ‘कपूर एंड संस’ और ‘गहराइयां’ जैसी बॉलीवुड फिल्मों के लिए मशहूर निर्देशक शकुन बत्रा कहते हैं, ‘एआई का सबसे पहले इस्तेमाल वीएफएक्स वाली फिल्मों के बजट को कम करने के लिए होगा, जिसके लिए आप करोड़ों-करोड़ों खर्च करते हैं और महीनों की तैयारी करते हैं, और वह बजट काफी कम हो जाएगा. एआई के कारण जिस चीज को सबसे कम खतरा है, वह है अभिनय, लेखन या कोई भी ऐसी चीज, जिससे व्यक्तिगत भावनात्मक गतिशीलता जुड़ी हो, और वह शायद अभी दूर की बात है. यह ऐसी चीज नहीं है, जिसके बारे में हमें चिंतित होना चाहिए. एआई आपको केवल सामान्य कहानियां ही दे सकता है. और ये भावनात्मक फिल्में वैसे भी कम बजट में बनती हैं, इसमें केवल बड़े सितारों की फीस ही हो सकती है और एक समय ऐसा भी आएगा जब आप किसी अभिनेता से केवल 40 या 50 दिनों में ही एक बड़ी फिल्म बना पाएंगे. क्योंकि बाकी, उनकी अनुमति और सहमति से आप एआई की मदद से निर्माण कर सकते हैं.’

वह आगे कहते हैं, ‘उम्मीद है, अगर आप कोई बड़ी एक्शन फिल्म कर रहे हैं तो आप अपनी भारी लागत कम कर सकते हैं, आपके अभिनेताओं की फीस भी कम हो सकती है. किसी न किसी स्तर पर, जो उद्योग अभी मुश्किल में है, इसके अलावा, हमें ऐसे बजट में फिल्में बनाने का भी एक तरीका मिल जाएगा, जहां लाभ मार्जिन की बेहतर उम्मीद होगी.’

शकुन बत्रा ने हाल ही में एआई का उपयोग करके 5 भागों वाली एक शॉर्ट फिल्म सीरीज बनाई है. उनका मानना ​​है कि तकनीक को मानवीय रचनात्मकता का पूरक होना चाहिए, न कि उस पर हावी होना चाहिए. वे कहते हैं, ‘सबसे अच्छा भविष्य तब होगा जब दो स्किल एक साथ मिलेंगे.’

बत्रा कहते हैं, ‘मैं अभिव्यक्ति के मानवीय प्रयास के विकल्प के रूप में एआई को प्रोत्साहित नहीं करता. इसलिए, मुझे लगता है कि हम फिल्म निर्माताओं का डर जायज़ है. जो काम पहले 100 लोगों की टीम करती थी, अब वह बहुत कम लोगों से किया जा सकता है. लेकिन इससे नए पद भी आएंगे. नए युवा फिल्म निर्माता उभरेंगे और एक तरह से समानांतर उद्योग का निर्माण होगा. लेकिन अभिनेताओं, लेखकों और तकनीशियनों के लिए यह जरूरी है कि हम पश्चिम की तरह अभिनेताओं और लेखकों के लिए कुछ उपाय लागू करें.’

वह कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि वे पहले ही शुरू हो चुके हैं. देखिए, एआई यहां स्थायी रूप से मौजूद है, फिल्म इंडस्ट्री काफी हद तक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के विचार पर चलता है. एआई लागत में भारी कमी लाएगा, जो इस इंडस्ट्री के लिए एक बड़ा लाभ होगा जो वर्तमान में लाभ मार्जिन से जूझ रहा है. इससे और भी कई अवसर खुलेंगे और स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं को फंडिंग के लिए 5 साल तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा. यह एक दोधारी तलवार है. इसमें एक आशाजनक विचार है और ज़ाहिर है कि यह मौजूदा नौकरियों को भी चुनौती देता है, जो किसी भी इंडस्ट्री में किसी भी तकनीकी व्यवधान के साथ होता है.’

बत्रा आगे कहते हैं, ‘मुझे सचमुच उम्मीद है कि हर स्टूडियो और बड़ी कंपनियां इस बात पर सहमत हो जाएं कि किसी भी समय एआई को 30 प्रतिशत से ज्यादा बजट एलोकेट न करें और 70 प्रतिशत मानव संसाधन, लोगों को दें, ताकि पारंपरिक नौकरियों में चिंता की कोई बात न रहे और सभी को सीखने और बदलाव का समय मिले. मुझे नहीं लगता था कि एआई डायलॉग्स और लिप सिंक कर पाएगा, लेकिन यह बहुत तेजी से आगे बढ़ गया. चीजें आपकी कल्पना से भी तेज होती हैं. अब एआई फिल्म इंडस्ट्री से कहीं बड़ा इंडस्ट्री है. सही काम यह है कि हम प्रशिक्षित करें, सक्षम बनाएं और ऐसे सिस्टम बनाएं, जिनसे हम नौकरियों की रक्षा कर सकें और साथ ही अपने क्रू को एआई समझने के लिए नियुक्त करने और ट्रेनिंग देने में थोड़ा पैसा लगा सकें.’

रांझणा के मुद्दे पर बत्रा कहते हैं, ‘रांझणा कोई एआई मुद्दा नहीं है, यह सहमति का मुद्दा है और कानूनी एजेंसियों के साथ बातचीत की जरूरत है ताकि आज अगर मैं अपनी अगली फिल्म के लिए कोई कॉन्ट्रैक्ट करूं तो मैं कह सकूं, ‘अगर एआई में कोई बदलाव किया जाना है तो मेरी सहमति जरूरी है’.’

शिखर कपूर, शकुन बत्रा, रांझणा के निर्देशक आनंद एल राय और ज्यादा फिल्म निर्माताओं का मानना ​​है कि रांझणा के मुद्दे, जहां फिल्म के अंत में बदलाव किया गया था, को इंडस्ट्री में एआई के आने से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए.

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