Monday, October 26, 2026

झारखंड ACB में 216 प्रारंभिक जांच लंबित, 43 मामलों की फाइलें सरकारी अनुमति के इंतजार में.

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रांची, 26 अक्टूबर 2026। झारखंड में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच करने वाले एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) में बड़ी संख्या में प्रारंभिक जांच लंबित होने का मामला सामने आया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ब्यूरो में कुल 216 प्रारंभिक जांच लंबित हैं। इनमें से 43 मामलों में जांच पूरी होने के बावजूद प्राथमिकी दर्ज करने की अनुमति या आगे की कार्रवाई के लिए फाइलें संबंधित सरकारी स्तर पर लंबित बताई जा रही हैं। वहीं, 173 मामलों में एसीबी स्तर पर ही प्रारंभिक जांच जारी है।

लंबित मामलों में कई चर्चित प्रकरण भी शामिल हैं। इससे जांच की गति, सरकारी अनुमति की प्रक्रिया और जवाबदेही को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इसी बीच झारखंड हाईकोर्ट ने लंबित प्रारंभिक जांचों को निर्धारित समय-सीमा में पूरा करने का निर्देश दिया है।

हाईकोर्ट ने छह महीने में जांच पूरी करने का दिया निर्देश

एसीबी में लंबित मामलों को लेकर झारखंड हाईकोर्ट ने हाल में सख्त रुख अपनाया। रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने लंबित प्रारंभिक जांचों का छह महीने के भीतर निष्पादन करने का निर्देश दिया है। साथ ही स्पष्ट किया है कि निर्धारित अवधि में जांच पूरी नहीं होने पर देरी के कारणों को रिकॉर्ड में दर्ज करना होगा।

अदालत के निर्देश के बाद एसीबी के साथ-साथ उन विभागों और सक्षम प्राधिकारियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है, जहां जांच पूरी होने के बाद फाइलें अनुमति या निर्णय के इंतजार में लंबित हैं।

पांच पूर्व मंत्रियों की संपत्ति की जांच का मामला

झारखंड के पांच पूर्व मंत्रियों—अमर कुमार बाउरी, रणधीर कुमार सिंह, डॉ. नीरा यादव, नीलकंठ सिंह मुंडा और लुईस मरांडी—की कथित आय से अधिक संपत्ति से जुड़ा मामला भी चर्चित है।

सामाजिक कार्यकर्ता पंकज कुमार यादव ने वर्ष 2014 और 2019 के चुनावी हलफनामों में संपत्ति में कथित वृद्धि को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। रिपोर्ट के अनुसार, 25 जुलाई 2023 को राज्य मंत्रिपरिषद ने पांचों के खिलाफ प्रारंभिक जांच की अनुमति दी थी।

अब इस मामले में जांच की प्रगति और निष्कर्ष को लेकर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, संपत्ति में वृद्धि से जुड़े आरोपों को जांच के निष्कर्ष या अपराध सिद्ध होने के बराबर नहीं माना जा सकता।

RINPAS भर्ती मामला भी जांच के दायरे में

रांची स्थित रिनपास (RINPAS) में कथित नियुक्ति अनियमितताओं को लेकर सितंबर 2016 में एसीबी ने प्राथमिकी दर्ज की थी। रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में दो पूर्व मंत्रियों, तत्कालीन स्वास्थ्य सचिव बी.के. त्रिपाठी, संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. अमूल रंजन समेत करीब 14 लोगों के नाम शामिल थे।

आरोप नियुक्तियों में योग्यता संबंधी नियमों की अनदेखी और वेतन वृद्धि में कथित अनियमितताओं से जुड़े थे। इस मामले की मौजूदा स्थिति जानने के लिए आधिकारिक रिकॉर्ड और जांच एजेंसी की जानकारी महत्वपूर्ण होगी।

महगामा जलापूर्ति योजना में अतिरिक्त भुगतान का आरोप

गोड्डा जिले की महगामा ग्रामीण जलापूर्ति योजना में भी कथित वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आया था। रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 1.64 करोड़ रुपये की योजना में लगभग 70 लाख रुपये के अतिरिक्त भुगतान का आरोप लगाया गया था।

इस प्रकरण में 12 इंजीनियरों और एक ठेकेदार के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज किए जाने की जानकारी दी गई थी। मामले में आरोपों की वास्तविक स्थिति और आगे की कार्रवाई का आकलन आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर किया जाना चाहिए।

IAS विनय कुमार चौबे के मामले में आरोपपत्र में देरी

भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी विनय कुमार चौबे के खिलाफ शराब घोटाले और कथित आय से अधिक संपत्ति से जुड़े आरोपों के संबंध में नवंबर 2025 में एसीबी द्वारा प्राथमिकी दर्ज किए जाने की रिपोर्ट आई थी।

मामले में संपत्ति, बैंक लेन-देन और निवेश की जांच की गई। रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2026 में निर्धारित समय के भीतर आरोपपत्र दाखिल नहीं होने के कारण उन्हें डिफॉल्ट बेल मिली थी। इस प्रकरण में जमानत मिलने को आरोपों से बरी होने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए; मामले की कानूनी स्थिति अदालत के आदेशों से स्पष्ट होगी।

नामकुम जमीन मामले में कथित अवैध म्यूटेशन की जांच

रांची के नामकुम अंचल के डुंडू क्षेत्र में जमीन के दाखिल-खारिज और सरकारी दस्तावेजों से संबंधित मामले में हाईकोर्ट के निर्देश पर एसीबी ने जांच शुरू की थी।

शिकायत के अनुसार, एक परिवार की जमीन के हिस्से पर प्रकाश कमर्शियल प्राइवेट लिमिटेड के नाम जमाबंदी खोले जाने का आरोप लगा। रिपोर्ट में बताया गया है कि अगस्त 2026 में तत्कालीन अंचलाधिकारी डॉ. श्वेता वर्मा, राजस्व निरीक्षक मनोज कुमार और कार्यालय लिपिक दीपक कुमार के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

मामला कथित अवैध म्यूटेशन और राजस्व रिकॉर्ड में हेरफेर से जुड़ा है। आरोपों की पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी।

RIMS जमीन मामले में भी कार्रवाई

रांची स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (RIMS) की अधिग्रहित जमीन पर कथित कब्जे और दस्तावेजों के जरिए खरीद-बिक्री के मामले में एसीबी ने जनवरी 2026 में प्राथमिकी दर्ज की थी।

रिपोर्ट के अनुसार, जांच में मोरहाबादी और कोकर की जमीन से जुड़े प्रकरण सामने आए। अप्रैल 2026 में चार आरोपितों की गिरफ्तारी और जून में बिल्डर शुभम साबू की गिरफ्तारी की जानकारी दी गई। जुलाई 2026 में चार आरोपितों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किए जाने की भी खबर थी।

जांच में सरकारी जमीन के रिकॉर्ड, रजिस्ट्री, म्यूटेशन और निर्माण की अनुमति से जुड़ी कथित अनियमितताओं की पड़ताल की जा रही है।

एसीबी की कार्यशैली पर पहले भी उठ चुके हैं सवाल

झारखंड के पूर्व मंत्री और कांग्रेस विधायक रामेश्वर उरांव ने पूर्व में विधानसभा में एसीबी की कार्यशैली पर सवाल उठाए थे। रिपोर्ट में उनके हवाले से एजेंसी के कामकाज में चुनिंदा मामलों को लेकर अलग-अलग रवैया अपनाए जाने की आलोचना का उल्लेख किया गया है।

ऐसी टिप्पणियां एजेंसी की कार्यप्रणाली पर राजनीतिक और सार्वजनिक बहस को दर्शाती हैं। हालांकि, किसी विशेष मामले में लापरवाही या पक्षपात का निष्कर्ष निकालने के लिए संबंधित रिकॉर्ड और तथ्यों की जांच आवश्यक है।

प्रारंभिक जांच के लिए 90 दिनों की समय-सीमा का प्रावधान

रिपोर्ट में झारखंड कैबिनेट निगरानी अधिसूचना, 2015 के क्लॉज 21(4)(viii) का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि प्रारंभिक जांच सामान्य तौर पर 90 दिनों के भीतर पूरी की जानी चाहिए। जांच की अवधि बढ़ाने पर निर्धारित प्रक्रिया के तहत कारण दर्ज करने का प्रावधान बताया गया है।

ऐसे में 216 प्रारंभिक जांचों का लंबित होना जांच प्रक्रिया की समय-सीमा, समीक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल खड़े करता है। हालांकि, प्रत्येक मामले की अवधि, जांच की जटिलता और विस्तार की अनुमति की स्थिति अलग-अलग हो सकती है।

43 फाइलों पर निर्णय और 173 जांचों का निष्पादन अहम

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 43 मामलों में जांच पूरी होने के बावजूद आगे की कार्रवाई के लिए अनुमति या निर्णय लंबित है, जबकि 173 मामलों में प्रारंभिक जांच अभी जारी है। इन दोनों श्रेणियों के मामलों में अलग-अलग स्तर पर कार्रवाई की जरूरत है।

जांच पूरी होने के बाद लंबित फाइलों पर सक्षम प्राधिकारी का समयबद्ध निर्णय जरूरी है। वहीं, जारी जांचों को निष्पक्ष तरीके से पूरा कर स्पष्ट निष्कर्ष तक पहुंचाना एसीबी की जिम्मेदारी है।

हाईकोर्ट के निर्देश के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि लंबित मामलों में कितनी प्रगति होती है और निर्धारित समय-सीमा के भीतर कितनी जांचों का निष्पादन किया जाता है।

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