Friday, October 23, 2026

बालगुदर टीले से मिली 11वीं-12वीं सदी की बुद्ध प्रतिमा, संरक्षण के लिए DM सख्त.

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लखीसराय | 23 अक्टूबर 2026 | BHARATSUPERFASTNEWS

Lakhisarai News: बिहार के लखीसराय जिले में स्थित बालगुदर टीले से भगवान बुद्ध की एक खंडित प्रतिमा मिली है। संग्रहालय के अधिकारियों के अनुसार, यह प्रतिमा 11वीं से 12वीं शताब्दी की है और भगवान बुद्ध की भूमि स्पर्श मुद्रा में है। प्रतिमा मिलने के बाद स्थानीय बच्चों ने इसे लखीसराय संग्रहालय को सौंप दिया। इस बीच, ऐतिहासिक स्थल पर मिट्टी कटाव और संरक्षण की कमी का मुद्दा भी सामने आया है। मामले को गंभीरता से लेते हुए जिलाधिकारी शैलेंद्र कुमार ने चहारदीवारी का निर्माण जल्द पूरा कराने और अवैध गतिविधियों पर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं।

बच्चों ने प्रतिमा संग्रहालय को सौंपी

बालगुदर टीले पर मिट्टी कटाई के दौरान स्थानीय बच्चों को भगवान बुद्ध की खंडित प्रतिमा मिली। बच्चों ने पुरातात्विक महत्व की इस कलाकृति को अपने पास रखने के बजाय लखीसराय संग्रहालय को सौंप दिया।

सहायक संग्रहालयाध्यक्ष डॉ. दिलीप कुमार ने बच्चों की इस पहल की सराहना की। पुरातात्विक स्थलों से मिलने वाले अवशेषों को सुरक्षित रखना और संबंधित विभाग तक पहुंचाना ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है।

प्रतिमा मिलने की घटना ने बालगुदर टीले के ऐतिहासिक महत्व के साथ-साथ उसकी सुरक्षा व्यवस्था पर भी ध्यान आकर्षित किया है।

11वीं-12वीं शताब्दी की बताई गई प्रतिमा

लखीसराय संग्रहालय के सहायक संग्रहालयाध्यक्ष डॉ. दिलीप कुमार और वरीय तकनीकी सहायक राजेश कुमार ने प्रतिमा का निरीक्षण किया। उनके अनुसार, यह प्रतिमा 11वीं से 12वीं शताब्दी की है।

प्रतिमा की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार बताई गई हैं:

  • मुद्रा: भूमि स्पर्श मुद्रा
  • लंबाई: 30.3 सेंटीमीटर
  • चौड़ाई: 10.2 सेंटीमीटर
  • मोटाई: 7.5 सेंटीमीटर

बौद्ध परंपरा में भूमि स्पर्श मुद्रा भगवान बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति से जुड़ी मानी जाती है। इस मुद्रा में बुद्ध का एक हाथ धरती की ओर होता है।

बिहार विरासत विकास समिति के कार्यपालक निदेशक प्रो. अनिल कुमार ने प्रतिमा को आठवां बोधिसत्व बताया है। उनके अनुसार, यह रत्नजटित कलाकृति है। प्रतिमा की ऐतिहासिक पहचान और कलात्मक विशेषताओं का विस्तृत अध्ययन इसके महत्व को बेहतर ढंग से समझने में सहायक हो सकता है।

संग्रहालय की टीम ने किया पुरास्थल का निरीक्षण

प्रतिमा मिलने की सूचना के बाद संग्रहालय की टीम बालगुदर टीले पर पहुंची और स्थल की स्थिति का जायजा लिया। निरीक्षण दल में सहायक संग्रहालयाध्यक्ष डॉ. दिलीप कुमार, वरीय तकनीकी सहायक राजेश कुमार, मोहम्मद सादिक आलम और चंचल कुमार शामिल थे। गृह रक्षा वाहिनी के जवान प्रमोद यादव और सुधीर कुमार भी टीम के साथ मौजूद थे।

निरीक्षण के दौरान पुरास्थल पर मिट्टी कटाव और संरक्षण से जुड़ी चुनौतियों का मुद्दा सामने आया। उपलब्ध तस्वीरों में कुछ हिस्सों में मिट्टी कटने और ग्रामीणों द्वारा गोबर के उपले रखे जाने की स्थिति भी दिखाई गई है।

ऐसी परिस्थितियों में पुरास्थल की सीमा सुरक्षित रखना, अनधिकृत गतिविधियों पर रोक लगाना और जमीन के भीतर मौजूद संभावित पुरावशेषों को नुकसान से बचाना महत्वपूर्ण है।

अधूरी चहारदीवारी से पुरातात्विक धरोहर की सुरक्षा पर सवाल

बालगुदर टीला बिहार का राज्य संरक्षित पुरातात्विक स्थल है। यहां ऐतिहासिक अवशेषों को सुरक्षित रखने और अनधिकृत हस्तक्षेप रोकने के लिए चहारदीवारी का निर्माण कराया जा रहा है। हालांकि, निर्माण कार्य पूरा नहीं होने को लेकर चिंता जताई गई है।

बिहार विरासत विकास समिति के कार्यपालक निदेशक प्रो. अनिल कुमार ने इस संबंध में लखीसराय के जिलाधिकारी को पत्र भेजा था। रिपोर्ट के अनुसार, पत्रांक 312 दिनांक 22 अक्टूबर 2026 के जरिए अधूरे निर्माण और पुरास्थल के मूल स्वरूप से कथित छेड़छाड़ का मुद्दा उठाया गया था।

पुरातात्विक स्थल पर मिट्टी की कटाई या अनधिकृत गतिविधियों से न केवल सामने आए अवशेषों, बल्कि जमीन के भीतर मौजूद अन्य ऐतिहासिक साक्ष्यों को भी नुकसान पहुंच सकता है। इसलिए स्थल की सुरक्षा के लिए स्थायी व्यवस्था जरूरी मानी जा रही है।

डीएम शैलेंद्र कुमार ने दिए सख्त निर्देश

बालगुदर पुरास्थल की सुरक्षा को लेकर जिलाधिकारी शैलेंद्र कुमार ने 22 अक्टूबर 2026 को अनुमंडलाधिकारी और अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी को पत्र जारी किया। उन्होंने अधूरी चहारदीवारी को गंभीर विषय बताते हुए संबंधित विभाग और कार्य एजेंसी के साथ समन्वय कर निर्माण कार्य जल्द पूरा कराने का निर्देश दिया।

डीएम ने पुरास्थल पर अवैध गतिविधियों को रोकने के लिए कानून के तहत आवश्यक निरोधात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करने को भी कहा है।

रिपोर्ट के अनुसार, बालगुदर टीले को बिहार प्राचीन स्मारक एवं पुरातत्व स्थल, अवशेष एवं कला धरोहर अधिनियम, 1976 के तहत राज्य संरक्षित पुरास्थल घोषित किया गया है।

बालगुदर टीले का संरक्षण क्यों जरूरी?

बालगुदर टीले से बुद्ध प्रतिमा का मिलना क्षेत्र के प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास के अध्ययन के लिहाज से महत्वपूर्ण है। ऐसी कलाकृतियां उस समय की कला, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक गतिविधियों को समझने में मदद कर सकती हैं।

लेकिन किसी पुरावशेष को संग्रहालय तक पहुंचाना ही संरक्षण का पूरा काम नहीं है। जिस स्थान से प्रतिमा मिली है, वहां की मिट्टी, संरचनाओं और अन्य संभावित पुरावशेषों को भी सुरक्षित रखना आवश्यक है।

अब प्रशासन के सामने चहारदीवारी का निर्माण पूरा कराने और स्थल पर अनधिकृत गतिविधियों को रोकने की चुनौती है। नई प्रतिमा मिलने के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संरक्षण संबंधी निर्देशों पर कितनी तेजी से अमल किया जाता है।

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