मधुबनी, बिहार। बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में स्थित मां उच्चैठ भगवती मंदिर श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है। मधुबनी जिले के बेनीपट्टी अनुमंडल में स्थित इस मंदिर में सालभर भक्त दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं। शारदीय नवरात्र के दौरान यहां श्रद्धालुओं की भीड़ विशेष रूप से बढ़ जाती है। मंदिर की धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ इसका संबंध महाकवि कालिदास की प्रसिद्ध लोककथा से भी जोड़ा जाता है।
मां सती के हृदय से जुड़ी है शक्तिपीठ की मान्यता
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता सती के शरीर के अंग जहां-जहां गिरे, वहां शक्तिपीठ स्थापित हुए। ऐसी ही एक मान्यता उच्चैठ भगवती मंदिर को लेकर प्रचलित है। कहा जाता है कि इस स्थान पर माता सती का हृदय गिरा था। इसी वजह से इसे विशेष धार्मिक महत्व वाला स्थल माना जाता है।
बिहार के अलावा दूसरे राज्यों और पड़ोसी देश नेपाल से भी श्रद्धालु यहां पूजा-अर्चना के लिए आते हैं। हालांकि, सती के हृदय के यहां गिरने की बात धार्मिक परंपरा और आस्था से जुड़ी मान्यता है।
काले पत्थर की प्रतिमा में मां दुर्गा का स्वरूप
मंदिर के गर्भगृह में मां दुर्गा की करीब ढाई फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित है। काले ग्रेनाइट पत्थर से बनी इस प्रतिमा में मां सिंह पर विराजमान हैं। उनके हाथों में गदा, चक्र और कमल जैसे प्रतीक दिखाई देते हैं।
प्रतिमा का निर्माण किसने और कब कराया, इसका स्पष्ट लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं बताया जाता है। हालांकि, इसकी कलात्मक शैली और नक्काशी को देखकर कुछ इतिहासकार इसे पालकालीन मूर्तिकला की परंपरा से जोड़ते हैं। पाल राजवंश का काल सामान्यतः आठवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच माना जाता है।
कालिदास और उच्चैठ भगवती की कथा
उच्चैठ भगवती मंदिर से जुड़ी सबसे चर्चित लोककथाओं में महाकवि कालिदास की कहानी शामिल है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, कालिदास आरंभ में विद्वान नहीं थे। उनका विवाह विदुषी राजकुमारी विद्योत्तमा से हुआ था। जब विद्योत्तमा को उनकी अज्ञानता का पता चला, तो उन्होंने उनका अपमान किया। इस घटना के बाद कालिदास ज्ञान प्राप्त करने की तलाश में निकल पड़े।
कहानी के अनुसार, इसी यात्रा के दौरान वे उच्चैठ भगवती के मंदिर पहुंचे। मंदिर के आसपास एक संस्कृत पाठशाला थी, जहां वे रसोई का काम करने लगे। मान्यता है कि इसी दौरान हुई एक घटना ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।
उफनती नदी पार कर मंदिर पहुंचे कालिदास
लोककथा के मुताबिक, एक दिन इलाके में भारी बारिश हुई और पाठशाला तथा मंदिर के बीच बहने वाली नदी में बाढ़ आ गई। शाम के समय मंदिर में दीप जलाने और भोग लगाने का वक्त हो गया था। लेकिन नदी का तेज बहाव देखकर कोई भी छात्र मंदिर जाने के लिए तैयार नहीं हुआ।
तब कालिदास को मंदिर में दीप जलाने के लिए भेजा गया। कहा जाता है कि वे बिना पीछे हटे उफनती नदी में उतर गए और कठिनाई से उसे पार कर मंदिर पहुंच गए। वहां दीप जलाने के बाद उन्होंने प्रमाण के तौर पर निशान लगाने की कोशिश की।
मां भगवती के प्रकट होने और वरदान देने की मान्यता
प्रचलित कथा के अनुसार, मंदिर में निशान लगाने के लिए कोई उपयुक्त जगह न मिलने पर कालिदास ने मां की प्रतिमा के मुख पर निशान लगाने का विचार किया। जैसे ही उन्होंने ऐसा करने के लिए हाथ बढ़ाया, मां भगवती प्रकट हुईं और उनका हाथ पकड़ लिया।
कहानी के अनुसार, मां उनकी भक्ति और साहस से प्रसन्न हुईं और उनसे वरदान मांगने को कहा। कालिदास ने ज्ञान और विद्या प्राप्त करने की इच्छा जताई। मान्यता है कि मां भगवती ने उन्हें ऐसा वरदान दिया कि रातभर में जिन पुस्तकों को वे स्पर्श करेंगे, उनका ज्ञान उन्हें प्राप्त हो जाएगा।
कहा जाता है कि इसके बाद कालिदास ने अनेक ग्रंथों का ज्ञान हासिल किया और आगे चलकर संस्कृत साहित्य के महान कवियों में गिने जाने लगे। कुमारसंभव, रघुवंश और मेघदूत जैसी रचनाएं उनकी साहित्यिक प्रतिभा की पहचान बनीं। हालांकि, कालिदास के जीवन से जुड़ी इस कथा का ऐतिहासिक प्रमाण स्पष्ट नहीं है और इसे मुख्य रूप से धार्मिक लोकपरंपरा के रूप में देखा जाता है।
आज भी शिक्षा की शुरुआत से जुड़ी है मंदिर की परंपरा
स्थानीय मान्यता के अनुसार, बच्चों की पढ़ाई शुरू कराने के अवसर पर उच्चैठ भगवती मंदिर की मिट्टी लगाई जाती है। श्रद्धालु मां से बच्चों के उज्ज्वल भविष्य, ज्ञान और सफलता की कामना करते हैं। कालिदास की कथा के कारण भी इस मंदिर को विद्या और बुद्धि की कामना से जोड़कर देखा जाता है।
मंदिर के पास स्थित ‘कालिदास चौपड़ी’ नामक स्थल को भी स्थानीय लोग महाकवि कालिदास से जुड़ी परंपरा की स्मृति मानते हैं।
तांत्रिक और वैदिक विधि से होती है पूजा
मंदिर में तांत्रिक और वैदिक, दोनों पद्धतियों से मां भगवती की पूजा-अर्चना किए जाने की परंपरा बताई जाती है। पुजारी काशीनाथ झा के अनुसार, यहां दिन में तीन बार आरती होती है और नवरात्र के दौरान विशेष धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं।
स्थानीय परंपरा के मुताबिक, नवमी के दिन बलि देने की प्रथा भी रही है। कुछ विवरणों में 108 बकरों की बलि का उल्लेख मिलता है। इस संबंध में वर्तमान व्यवस्था और संख्या की पुष्टि मंदिर प्रबंधन या जिला प्रशासन से की जानी चाहिए।
नवरात्र के अवसर पर श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए जिला प्रशासन की ओर से सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन की व्यवस्था की जाती है।
आस्था, लोककथा और इतिहास का संगम
उच्चैठ भगवती मंदिर मिथिलांचल की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। एक ओर इसे माता सती से जुड़ी मान्यता के कारण श्रद्धा से देखा जाता है, तो दूसरी ओर कालिदास की कथा इसे ज्ञान, साधना और साहित्यिक प्रतिभा की प्रतीकात्मक कहानी से जोड़ती है। यही वजह है कि यह मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल ही नहीं, बल्कि स्थानीय लोकविश्वास और सांस्कृतिक विरासत का भी अहम केंद्र माना जाता है।
