नई दिल्ली: भारत तेजी से सौर ऊर्जा की ओर बढ़ रहा है। देश में बड़े सोलर पार्क स्थापित हो रहे हैं, रूफटॉप सोलर सिस्टम का विस्तार हो रहा है और फोटोवोल्टिक मॉड्यूल का घरेलू उत्पादन भी बढ़ रहा है। इससे स्वच्छ ऊर्जा क्षमता मजबूत हो रही है और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाने में मदद मिल रही है।
लेकिन सोलर सेक्टर के इस तेज विस्तार के साथ भविष्य की एक नई चुनौती भी सामने आ रही है—पुराने और खराब हो चुके सोलर पैनलों से निकलने वाला कचरा। विशेषज्ञों और विभिन्न आकलनों के मुताबिक आने वाले वर्षों में सोलर वेस्ट की मात्रा तेजी से बढ़ सकती है। ऐसे में समय रहते संग्रह, दोबारा इस्तेमाल और रीसाइक्लिंग की व्यवस्था तैयार करना जरूरी होगा।
25 साल बाद बढ़ सकती है सोलर वेस्ट की मात्रा
आमतौर पर सोलर फोटोवोल्टिक मॉड्यूल को करीब 25 साल तक इस्तेमाल के लिए डिजाइन किया जाता है। हालांकि खराबी, टूट-फूट, निर्माण संबंधी कमी, मौसम की मार या नई तकनीक आने पर कुछ मॉड्यूल इससे पहले भी हटाए जा सकते हैं।
काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) के आकलन के अनुसार, वित्त वर्ष 2023 तक देश में स्थापित सोलर क्षमता से करीब 100 किलोटन सोलर वेस्ट होने का अनुमान था। मौजूदा क्षमता से ही यह मात्रा 2030 तक लगभग 340 किलोटन पहुंच सकती है।
वहीं, मौजूदा दशक में जुड़ने वाली नई सोलर क्षमता को भी शामिल करने पर 2030 तक कुल सोलर वेस्ट करीब 600 किलोटन तक पहुंचने का अनुमान है। राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों की इसमें बड़ी हिस्सेदारी हो सकती है। अकेले राजस्थान का योगदान करीब 24 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया गया है।
2040 और 2050 तक तस्वीर और बदल सकती है
सोलर वेस्ट का सबसे बड़ा दबाव आने वाले दशकों में देखने को मिल सकता है। उपलब्ध अनुमानों के मुताबिक अलग-अलग मान्यताओं के आधार पर देश में सोलर कचरा 2040 तक करीब 4.98 मिलियन टन और 2050 तक लगभग 19 मिलियन टन तक पहुंच सकता है।
हालांकि ये आंकड़े अनुमान हैं, निश्चित भविष्यवाणी नहीं। वास्तविक मात्रा इस बात पर निर्भर करेगी कि आने वाले समय में सोलर क्षमता कितनी बढ़ती है, मॉड्यूल कितने समय तक चलते हैं, कितनी जल्दी उन्हें बदला जाता है और कितने मॉड्यूल दोबारा इस्तेमाल किए जाते हैं।
फिर भी मौजूदा रुझान संकेत देते हैं कि सोलर वेस्ट भविष्य में एक महत्वपूर्ण औद्योगिक और पर्यावरणीय मुद्दा बन सकता है।
कचरे में मौजूद हैं कई उपयोगी संसाधन
पुराने सोलर पैनल केवल बेकार सामग्री नहीं हैं। इनमें बड़ी मात्रा में ग्लास और एल्युमीनियम के अलावा सिलिकॉन, कॉपर, सिल्वर और अन्य उपयोगी सामग्री मौजूद होती है।
अगर इन सामग्रियों को प्रभावी तरीके से रिकवर किया जाए तो नए कच्चे माल की जरूरत कम हो सकती है। इससे भारत में क्लीन एनर्जी से जुड़ी घरेलू सप्लाई चेन को भी मजबूती मिल सकती है।
एक आकलन के मुताबिक भारत में 2047 तक करीब 11.22 मिलियन टन सोलर मॉड्यूल वेस्ट पैदा हो सकता है। इसे संभालने के लिए लगभग 299 रीसाइक्लिंग सुविधाओं की आवश्यकता पड़ सकती है। प्रत्येक सुविधा की अनुमानित प्रोसेसिंग क्षमता करीब 3,600 टन प्रतिवर्ष बताई गई है।
इस पूरे ढांचे को विकसित करने के लिए अनुमानित निवेश करीब ₹4,274 करोड़ हो सकता है। इससे संकेत मिलता है कि सोलर वेस्ट मैनेजमेंट आने वाले समय में अपने आप में एक बड़ा औद्योगिक क्षेत्र बन सकता है।
सोलर वेस्ट के लिए मजबूत कलेक्शन नेटवर्क जरूरी
सोलर प्रोजेक्ट अक्सर बड़े भौगोलिक क्षेत्रों में फैले होते हैं। वहीं पुराने मॉड्यूल भारी होते हैं, जिसके कारण उन्हें दूर स्थित रीसाइक्लिंग प्लांट तक पहुंचाने में परिवहन लागत बढ़ सकती है।
ऐसे में बड़े सोलर क्लस्टर और पार्कों के आसपास कलेक्शन एवं एग्रीगेशन सेंटर विकसित करना उपयोगी हो सकता है। राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में इसका विशेष महत्व हो सकता है, क्योंकि यहां सोलर प्रोजेक्ट्स की संख्या काफी अधिक है।
इसके साथ ही मॉड्यूल के पूरे जीवनचक्र की जानकारी दर्ज करने वाली ट्रेसेबिलिटी व्यवस्था विकसित करने पर भी जोर दिया जा सकता है।
डिजिटल रिकॉर्ड से पता चलेगा कब और कहां निकलेगा कचरा
भारत एक राष्ट्रीय डिजिटल सिस्टम विकसित कर सकता है, जिसमें प्रत्येक सोलर मॉड्यूल से जुड़ी जरूरी जानकारी दर्ज हो। इसमें निर्माता, तकनीक, इंस्टॉलेशन की तारीख, स्थान, क्षमता और मॉड्यूल के इस्तेमाल से बाहर होने की जानकारी शामिल की जा सकती है।
ऐसी व्यवस्था से सरकार और रीसाइक्लिंग कंपनियों को पहले से अनुमान लगाने में मदद मिलेगी कि आने वाले समय में किस क्षेत्र से कितना सोलर वेस्ट निकल सकता है। इससे रीसाइक्लिंग क्षमता की योजना पहले से तैयार की जा सकेगी।
ट्रेसेबिलिटी से उत्पादकों की जिम्मेदारी तय करने और पुराने मॉड्यूल के अनौपचारिक कचरा चैनलों में जाने की संभावना कम करने में भी मदद मिल सकती है।
सोलर पैनल के डिजाइन में रीसाइक्लिंग को जगह देने की जरूरत
भविष्य में मॉड्यूल डिजाइन करते समय उनके इस्तेमाल के बाद होने वाली रीसाइक्लिंग को भी ध्यान में रखना महत्वपूर्ण होगा। ऐसे मॉड्यूल जिनके अलग-अलग हिस्सों को आसानी से अलग किया जा सके, उनकी प्रोसेसिंग अपेक्षाकृत आसान हो सकती है।
ग्लास, एल्युमीनियम, पॉलिमर, सिलिकॉन और विभिन्न धातुओं को अलग करने की बेहतर तकनीक तथा मानकीकरण से रीसाइक्लिंग की लागत कम करने में मदद मिल सकती है।
मैन्युफैक्चरर्स और सोलर प्रोजेक्ट डेवलपर्स की जिम्मेदारियों को स्पष्ट करने के साथ आर्थिक प्रोत्साहन भी इस सेक्टर को व्यावसायिक रूप से टिकाऊ बनाने में भूमिका निभा सकते हैं।
हर पुराने पैनल को तुरंत रीसाइकिल करना जरूरी नहीं
सोलर मॉड्यूल के जीवनचक्र में रीसाइक्लिंग से पहले रीयूज और रिपेयर का विकल्प भी देखा जा सकता है। कुछ ऐसे मॉड्यूल जो बड़े सोलर प्रोजेक्ट के लिए पर्याप्त प्रभावी नहीं रह गए हों, वे उचित टेस्टिंग और प्रमाणन के बाद कम मांग वाले उपयोगों में काम आ सकते हैं।
इससे मॉड्यूल की उपयोगी उम्र बढ़ाई जा सकती है। जब कोई मॉड्यूल तकनीकी रूप से आगे इस्तेमाल के योग्य न रह जाए, तब उसमें मौजूद मूल्यवान सामग्रियों को रिकवर किया जा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय अनुभव से भारत को मिल सकती है सीख
दुनिया के कई देशों ने सोलर पैनल के बढ़ते कचरे को ध्यान में रखते हुए रीसाइक्लिंग व्यवस्था विकसित करने पर काम शुरू किया है। यूरोपीय संघ ने फोटोवोल्टिक पैनलों को अपने वेस्ट मैनेजमेंट फ्रेमवर्क में शामिल किया है। वहीं चीन और अमेरिका में भी सोलर क्षमता बढ़ने के साथ रीसाइक्लिंग और मटीरियल रिकवरी सिस्टम विकसित किए जा रहे हैं।
इन अनुभवों से यह संकेत मिलता है कि प्रभावी सोलर वेस्ट मैनेजमेंट के लिए केवल रीसाइक्लिंग तकनीक पर्याप्त नहीं होगी। इसके साथ नियम-कायदे, उत्पादक की जिम्मेदारी, कलेक्शन सिस्टम, प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और रिकवर किए गए मटीरियल के लिए बाजार भी जरूरी होंगे।
राजस्थान में बन सकता है नया औद्योगिक अवसर
सोलर वेस्ट की चुनौती राजस्थान के लिए एक संभावित आर्थिक अवसर भी बन सकती है। राज्य में बड़े सोलर पार्क और व्यापक सौर ऊर्जा क्षमता मौजूद है। ऐसे में मॉड्यूल की टेस्टिंग, मरम्मत, संग्रह और रीसाइक्लिंग से जुड़ी सुविधाएं विकसित की जा सकती हैं।
इससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा होने के साथ-साथ ग्लास, एल्युमीनियम, सिलिकॉन, कॉपर और सिल्वर जैसे संसाधनों की रिकवरी को बढ़ावा मिल सकता है। साथ ही पुराने मॉड्यूल को लंबी दूरी तक ले जाने की जरूरत भी घट सकती है।
अभी से तैयारी करने का समय
भारत के पास सोलर वेस्ट की सबसे बड़ी लहर आने से पहले व्यवस्था तैयार करने का अवसर है। यदि कचरे की मात्रा बहुत अधिक बढ़ने के बाद रीसाइक्लिंग इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया गया, तो लागत और प्रबंधन दोनों अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं।
इसलिए कलेक्शन नेटवर्क, डिजिटल ट्रेसेबिलिटी, रीसाइक्लिंग तकनीक और रिकवर किए गए मटीरियल के बाजार को सोलर सेक्टर के विस्तार के साथ-साथ विकसित करना महत्वपूर्ण होगा।
भारत की सौर ऊर्जा यात्रा केवल अधिक से अधिक बिजली पैदा करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। सोलर पैनल के निर्माण से लेकर उनके इस्तेमाल और अंत में दोबारा संसाधनों की रिकवरी तक पूरे जीवनचक्र को टिकाऊ बनाना जरूरी होगा। समय रहते कदम उठाए जाएं तो भविष्य का सोलर कचरा पर्यावरणीय बोझ बनने के बजाय सर्कुलर इकोनॉमी और नए उद्योग के लिए संसाधन बन सकता है।
BharatSuperFastNews | बिजनेस एवं पर्यावरण डेस्क
