पटना: बिहार की ग्रामीण महिलाओं के लिए जीविका कार्यक्रम रोजगार और उद्यमिता का बड़ा माध्यम बनता जा रहा है। जीविका से जुड़ी महिलाओं ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आवासीय विद्यालयों और आंगनबाड़ी केंद्रों के बच्चों के लिए अब तक 90 लाख से अधिक ड्रेस तैयार की हैं। इस सिलाई कार्य से वित्त वर्ष 2026-27 में 126 करोड़ रुपये का टर्नओवर दर्ज किया गया है।
19 लाख रुपये से शुरू हुआ था कारोबार
इस पहल के लिए ग्रामीण विकास विभाग के सहयोग से जीविका-बिहार रूरल लाइवलीहुड्स प्रमोशन सोसाइटी (BRLPS) के तहत जानकी जीविका महिला स्टिचिंग प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड का गठन किया गया।
कंपनी के मार्गदर्शन में करीब 50 हजार जीविका दीदियों को बच्चों के लिए स्कूल और आंगनबाड़ी ड्रेस तैयार करने का काम मिला। वर्ष 2023-24 में इस गतिविधि से महज 19 लाख रुपये के टर्नओवर से शुरुआत हुई थी। इसके बाद कारोबार लगातार बढ़ता गया और अब यह आंकड़ा 126 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।
स्थानीय महिलाओं तक पहुंच रहा सरकारी काम
इस मॉडल के जरिए ड्रेस सिलाई का काम ग्रामीण परिवारों तक पहुंच रहा है। इससे सरकारी खरीद से जुड़ी आय स्थानीय स्तर पर ही बनी रहने में मदद मिल रही है। सिलाई के व्यवस्थित काम ने महिलाओं को उत्पादन के साथ-साथ कारोबार संचालन, वित्तीय प्रबंधन और नेतृत्व जैसे क्षेत्रों में भी अनुभव दिया है।
महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को मिला बढ़ावा
जीविका से जुड़ी महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। नियमित काम और आय के अवसर मिलने से महिलाओं में आत्मनिर्भरता के साथ व्यावसायिक कौशल विकसित होने की बात कही गई है।
ग्रामीण विकास विभाग के मंत्री श्रवण कुमार ने कहा कि जीविका से जुड़ी महिलाएं केवल अपने परिवार की आर्थिक मदद नहीं कर रहीं, बल्कि राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में भी योगदान दे रही हैं। उनके मुताबिक, हजारों महिलाओं द्वारा लाखों बच्चों के लिए ड्रेस तैयार करना उनकी मेहनत और आर्थिक सशक्तिकरण का उदाहरण है।
90 लाख से ज्यादा ड्रेस तैयार
आंकड़ों के अनुसार, जीविका दीदियों ने अब तक अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आवासीय विद्यालयों तथा आंगनबाड़ी केंद्रों से जुड़े बच्चों के लिए 90 लाख से अधिक ड्रेस तैयार की हैं। इस काम के बढ़ने से ग्रामीण क्षेत्र में महिला समूहों के लिए बड़े पैमाने पर काम और आय का अवसर बना है।
इस पहल से महिलाओं को सिलाई के पारंपरिक काम से आगे बढ़कर संगठित तरीके से उत्पादन और कारोबार का अनुभव मिल रहा है। इससे ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक भूमिका और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसरों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
