पटना: अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक मामले में पटना हाई कोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के दत्तक पुत्र होने का निर्धारण केवल पंजीकृत गोदनामा की तारीख देखकर नहीं किया जा सकता। मामले की परिस्थितियों और उपलब्ध दस्तावेजों को भी समग्र रूप से देखा जाना जरूरी है।
जस्टिस कुमार मनीष की अदालत ने विजय कुमार साह की याचिका पर सुनवाई करते हुए उनके अनुकंपा नियुक्ति के दावे को खारिज करने वाले पूर्व आदेशों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने विभाग को निर्देश दिया कि विजय को दिवंगत रेशमा देवी का कानूनी दत्तक पुत्र और आश्रित मानते हुए उनके मामले पर दोबारा निर्णय लिया जाए।
रेशमा देवी की सेवा के दौरान हुई थी मृत्यु
मामला बेगूसराय विद्युत आपूर्ति उपखंड में संदेशवाहक के पद पर कार्यरत रेशमा देवी से जुड़ा है। 25 नवंबर 2007 को सेवा के दौरान उनकी मृत्यु हो गई थी। विजय कुमार साह के अनुसार, वह बचपन से ही रेशमा देवी के साथ रह रहे थे।
दस्तावेजों के मुताबिक, रेशमा देवी ने 18 फरवरी 1999 को विजय को पुत्र के रूप में गोद लेने संबंधी शपथपत्र दिया था। इसके कुछ महीने बाद 22 जुलाई 1999 को विजय ने भी दत्तक संबंध को स्वीकार करते हुए शपथपत्र दिया। इसके बाद 12 जनवरी 2001 को दत्तक ग्रहण का पंजीकृत विलेख तैयार हुआ।
विभाग ने किन आधारों पर दावा किया था खारिज?
विभाग ने अनुकंपा नियुक्ति के दावे को कई आधारों पर स्वीकार नहीं किया था। इनमें पंजीकृत दत्तक विलेख के समय विजय की उम्र 15 वर्ष से अधिक होना, निर्धारित पांच साल की अवधि के बाद आवेदन किया जाना और उत्तराधिकार प्रमाणपत्र का मृत्यु के बाद मिलने वाले लाभों तक सीमित होना शामिल था।
विजय की ओर से इन आपत्तियों को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी।
आवेदन में देरी के लिए विभाग को जिम्मेदार माना
सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने यह तथ्य आया कि विजय जनवरी 2010 में ही विभाग के संपर्क में आ गए थे। इसके बाद विभाग ने उनसे उत्तराधिकार प्रमाणपत्र, पारिवारिक सदस्य प्रमाणपत्र और निर्धारित प्रारूप में आवेदन समेत अन्य दस्तावेज मांगे थे।
अदालत ने माना कि निर्धारित प्रारूप में आवेदन बाद में दाखिल होने के लिए याचिकाकर्ता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि प्रक्रिया में हुई देरी प्राधिकरण की ओर से दस्तावेज मांगने के कारण हुई थी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी दावे में देरी स्वयं संबंधित विभाग या प्राधिकरण की वजह से हुई है, तो उसका प्रतिकूल प्रभाव लाभ पाने वाले व्यक्ति पर नहीं डाला जा सकता।
तीन महीने में दोबारा फैसला लेने का निर्देश
हाई कोर्ट ने 22 दिसंबर 2017 और 27 मार्च 2018 को जारी किए गए संबंधित आदेशों को रद्द कर दिया। साथ ही विभाग को निर्देश दिया कि विजय कुमार साह को रेशमा देवी का कानूनी दत्तक पुत्र एवं आश्रित मानकर उनके अनुकंपा नियुक्ति के दावे पर नए सिरे से विचार किया जाए।
अदालत ने कहा कि निर्णय केवल तकनीकी आपत्तियों तक सीमित नहीं होना चाहिए। विभाग को तीन महीने के भीतर स्पष्ट और कारणयुक्त आदेश पारित करने का निर्देश दिया गया है।
