धनबाद/झरिया: धनबाद के झरिया बाजार में स्थित पंचदेव प्राचीन मंदिर अपनी धार्मिक मान्यताओं और पुरानी परंपराओं के कारण लोगों के बीच खास पहचान रखता है। मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां स्थापित जुड़वा शिवलिंग हैं। आमतौर पर शिव मंदिरों में एक शिवलिंग के दर्शन होते हैं, लेकिन इस मंदिर में दो शिवलिंग एक साथ स्थापित हैं और श्रद्धालु दोनों की पूजा करते हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार यह मंदिर करीब डेढ़ सौ वर्ष या उससे भी अधिक पुराना है। मंदिर केवल पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं, बल्कि झरिया की पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा भी माना जाता है।
मंदिर में कई देवी-देवताओं की प्रतिमाएं
पंचदेव मंदिर परिसर में जुड़वा शिवलिंग के अलावा दो अन्य शिवलिंग भी मौजूद हैं। यहां भगवान जगन्नाथ, श्रीराम परिवार, हनुमान जी और मां दुर्गा की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। अलग-अलग पर्व और धार्मिक अवसरों पर मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ जाती है।
जुड़वा शिवलिंग के प्रति विशेष आस्था
मंदिर में आने वाले भक्त दोनों शिवलिंगों पर जल चढ़ाते हैं और बेलपत्र अर्पित करते हैं। सावन, महाशिवरात्रि और अन्य धार्मिक अवसरों पर यहां विशेष पूजा होती है। स्थानीय श्रद्धालुओं के लिए दोनों शिवलिंगों का एक साथ दर्शन और पूजन विशेष धार्मिक महत्व रखता है।
मंदिर की स्थापना और जुड़वा शिवलिंगों के यहां स्थापित होने का प्रमाणिक इतिहास पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। हालांकि, स्थानीय लोगों के बीच इससे जुड़ी आस्था पीढ़ियों से चली आ रही है।
कई पीढ़ियों से पूजा की जिम्मेदारी
मंदिर के पुजारी मनोज पांडेय के अनुसार उनका परिवार लंबे समय से मंदिर की सेवा से जुड़ा हुआ है। उनके परिवार की कई पीढ़ियां यहां पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी संभालती रही हैं। वर्तमान में परिवार की तीसरी पीढ़ी मंदिर की धार्मिक गतिविधियों का संचालन कर रही है।
झरिया की बदलती तस्वीर के बीच मंदिर को लेकर चिंता
झरिया क्षेत्र में विस्थापन और पुनर्वास से जुड़े मुद्दों के बीच स्थानीय लोगों को इस प्राचीन मंदिर के भविष्य की भी चिंता है। लोगों का कहना है कि मंदिर उनकी धार्मिक आस्था के साथ-साथ क्षेत्र की पुरानी पहचान से जुड़ा हुआ है।
स्थानीय निवासियों की इच्छा है कि आने वाले समय में भी पंचदेव मंदिर अपने मौजूदा स्वरूप और स्थान पर सुरक्षित रहे, ताकि नई पीढ़ियां यहां मौजूद जुड़वा शिवलिंगों और इस धार्मिक विरासत से जुड़ सकें।
नोट: यह संस्करण मूल सामग्री की भाषा और संरचना की नकल किए बिना नए शब्दों, नए शीर्षक और स्वतंत्र प्रस्तुति में तैयार किया गया है। फिर भी प्रकाशन से पहले स्थानीय तथ्यों, मंदिर की उम्र और ऐतिहासिक दावों का स्वतंत्र सत्यापन करना बेहतर रहेगा।
