Friday, August 14, 2026

भारत के कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 52% के पार, खाड़ी देशों पर निर्भरता घटी.

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नई दिल्ली, 14 अगस्त 2026: भारत के कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी जुलाई 2026 में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने का अनुमान है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के आकलन के मुताबिक, जुलाई में भारत के कुल क्रूड ऑयल आयात में रूस की हिस्सेदारी करीब 52 प्रतिशत रही। जून में यह हिस्सा 48.6 प्रतिशत था।

रूस से मिलने वाले अपेक्षाकृत सस्ते तेल और वैश्विक बाजार की परिस्थितियों के बीच भारत ने रूसी आपूर्ति पर अपनी निर्भरता बढ़ाई है। हालांकि, इससे भारत के सामने पश्चिमी देशों की संभावित पाबंदियों और व्यापारिक दबाव की चुनौती भी बनी हुई है।

जुलाई में कैसे बढ़ी रूस की हिस्सेदारी?

रिपोर्ट के अनुसार, जून में भारत ने करीब 14.8 अरब डॉलर का कच्चा तेल आयात किया था। इसमें रूस से लगभग 7.2 अरब डॉलर का तेल आया था।

जुलाई में रूस से भारत का कुल आयात करीब 8.9 अरब डॉलर रहा। उपलब्ध व्यापार आंकड़ों और रूस से होने वाले आयात में कच्चे तेल की हिस्सेदारी को आधार बनाकर रिपोर्ट ने जुलाई में रूसी क्रूड की कीमत करीब 7.3 अरब डॉलर आंकी है। वहीं, भारत का कुल क्रूड आयात लगभग 14 अरब डॉलर रहने का अनुमान है। इसी आधार पर रूस की हिस्सेदारी करीब 52 प्रतिशत बैठती है।

चार साल में तेजी से बदला तेल आयात का पैटर्न

भारत के तेल आयात में रूस का महत्व पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। 2022 में भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी करीब 15 प्रतिशत थी। 2025-26 में यह बढ़कर लगभग 30.3 प्रतिशत हो गई और जुलाई 2026 में इसके 52 प्रतिशत से अधिक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है।

इसके उलट, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात समेत खाड़ी क्षेत्र से होने वाले तेल आयात की हिस्सेदारी में कमी आई है। 2022 में इन देशों की संयुक्त हिस्सेदारी 55 प्रतिशत से अधिक थी, जो अब 30 प्रतिशत से नीचे आने का अनुमान है।

अमेरिका की आपत्तियों से बढ़ी चुनौती

रूस से भारत की बढ़ती तेल खरीद पर अमेरिका लगातार सवाल उठाता रहा है। रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क या अन्य आर्थिक प्रतिबंध लगाए जाने की संभावनाओं को लेकर भी चर्चा चल रही है।

अगर ऐसे कदम लागू होते हैं तो भारत के लिए रूसी तेल खरीद और पश्चिमी बाजारों के साथ व्यापार के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

सस्ते तेल का घरेलू अर्थव्यवस्था पर असर

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है। ऐसे में अपेक्षाकृत कम कीमत पर मिलने वाला रूसी तेल देश के आयात बिल को नियंत्रित रखने में मदद कर सकता है।

दूसरी ओर, यदि रूसी आपूर्ति में बड़ी कमी आती है और भारत को महंगे स्रोतों से तेल खरीदना पड़ता है, तो रिफाइनिंग लागत और ईंधन कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। इसका असर परिवहन लागत और महंगाई पर भी पड़ने की संभावना रहती है।

फिलहाल भारत के लिए चुनौती यह है कि ऊर्जा सुरक्षा, आयात लागत और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखते हुए तेल खरीद की रणनीति तय की जाए।

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