6 अप्रैल को माता अनुसूया का जन्मोत्सव मनाया जाएगा. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, त्रिदेवों ने माता के गर्भ से भगवान दत्तात्रेय के रूप में जन्म लिया था. माता को यह सौभाग्य कैसे प्राप्त हुआ, जानने के लिए पढ़ें यह खबर.
हिंदू पंचांग के अनुसार, सती अनुसूया जयंती वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है. माता अनुसूया को पतिव्रता धर्म, त्याग और तपस्या का प्रतीक माना जाता है. इस दिन महिलाएं अखंड सौभाग्य, संतान की सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं और माता अनुसूया की पूजा करती हैं. आइए पौराणिक कथा के माध्यम से जानते हैं वह रहस्य, जिसके कारण उन्हें त्रिदेवों ब्रह्मा, विष्णु और महेश की माता होने का गौरव प्राप्त हुआ.
पौराणिक कथा
माता अनुसूया की पतिव्रता शक्ति
पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता अनुसूया महर्षि अत्रि की पत्नी थीं. उनकी पतिव्रता शक्ति और तपस्या की चर्चा तीनों लोकों में फैली हुई थी. कहा जाता है कि एक बार नारद ऋषि पृथ्वी पर घूम रहे थे. तब उन्होंने माता अनुसूया की पति भक्ति और धर्म के बारे में सुना. उनकी तपस्या और शक्ति देखने के बाद नारद ऋषि बहुत प्रसन्न हुए. वह तीनों देवी मां लक्ष्मी, मां सरस्वती और मां पार्वती के पास गए और अनुसूया की खूब प्रशंसा की.
नारद ऋषि की बात सुनकर देवी लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती के मन में जिज्ञासा जागी. उन्होंने अपने स्वामियों (त्रिदेवों) से उनकी परीक्षा लेने का आग्रह किया. त्रिदेवों ने उनके आग्रह को स्वीकार किया और साधु का भेष धारण करके महर्षि अत्रि के आश्रम पहुंचे. उस समय महर्षि आश्रम में नहीं थे. त्रिदेवों ने माता से भिक्षा मांगी.
त्रिदेवों की शर्त
माता अनुसूया ने साधुओं को देखकर उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया. त्रिदेवों ने उनके आमंत्रण को स्वीकार किया और भोजन करने के लिए बैठे, लेकिन उन्होंने माता के सामने एक विचित्र शर्त रखी. उन्होंने कहा, “हम तभी भोजन ग्रहण करेंगे जब आप पूर्णतः निर्वस्त्र होकर हमें खाना परोसेंगी.”
माता ने त्रिदेवों को पालने में झुलाया
यह स्थिति एक पतिव्रता स्त्री के लिए बहुत बड़ा धर्मसंकट थी. लेकिन माता अनुसूया ने साधुओं के प्रति आदर दिखाते हुए उनकी शर्त स्वीकार कर ली. माता ने अपने हाथ में जल लेकर संकल्प किया और कहा, “यदि मेरा पतिव्रता धर्म सत्य है, तो ये तीनों साधु नन्हें बालक बन जाएं.” उनके इतना कहते ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश अबोध शिशु बन गए. इसके बाद माता ने उन्हें भोजन कराया और पालने में झुलाने लगीं.
जब बहुत समय बीत जाने के बाद भी त्रिदेव अपने वास्तविक रूप में वापस नहीं लौटे, तो तीनों देवियां व्याकुल हो गईं और नारद मुनि के साथ आश्रम पहुंचीं. वहां उन्होंने देखा कि माता अनुसूया तीन नन्हें बालकों को पालने में झुला रही हैं. तीनों देवियों को अपनी गलती का एहसास हुआ. उन्होंने माता अनुसूया से क्षमा मांगी और अपने स्वामियों को उनके वास्तविक रूप में लाने की प्रार्थना की.
त्रिदेवों ने दिया वरदान
माता अनुसूया ने फिर से जल का छिड़काव किया, जिससे त्रिदेव पुनः अपने वास्तविक रूप में लौट आए. माता की भक्ति से प्रसन्न होकर त्रिदेवों ने उन्हें वरदान दिया कि उनके गर्भ से पुत्र रूप में जन्म लेंगे. इस प्रकार माता अनुसूया और ऋषि अत्रि के पुत्र के रूप में त्रिदेव ‘भगवान दत्तात्रेय’ के रूप में जन्मे.


