Saturday, October 17, 2026

51 शक्तिपीठों में शामिल है ताराचंडी धाम, प्राकृतिक गुफा में बालिका स्वरूप में विराजती हैं मां तारा.

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रोहतास, बिहार: बिहार के सासाराम में कैमूर की पहाड़ियों के बीच स्थित मां ताराचंडी धाम धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र है। प्राकृतिक गुफा में विराजमान मां तारा के दर्शन के लिए सालभर श्रद्धालु पहुंचते हैं। नवरात्र के दौरान मंदिर में भक्तों की संख्या बढ़ जाती है। यहां बालिका स्वरूप में मां की पूजा, अखंड दीप प्रज्ज्वलित करने की परंपरा और प्राचीन शिलालेख इस स्थल को विशेष पहचान देते हैं।

ताराचंडी धाम सिर्फ पूजा-अर्चना का स्थान नहीं, बल्कि स्थानीय धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक इतिहास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण स्थल भी है। मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र में मौजूद प्राचीन प्रतिमाएं इसकी ऐतिहासिक महत्ता को और बढ़ाती हैं।

मां सती के नेत्र से जुड़ी है धार्मिक मान्यता

मंदिर के पुजारी कमलेश गिरि के अनुसार, ताराचंडी धाम को लेकर प्रचलित मान्यता मां सती की कथा से जुड़ी है। धार्मिक कथाओं के मुताबिक, मां सती के देह त्याग के बाद भगवान शिव उनके शरीर को लेकर विचरण करने लगे थे। इससे सृष्टि का संतुलन प्रभावित होने लगा। तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से मां सती के शरीर को विभाजित किया। मान्यता है कि जहां-जहां उनके अंग या आभूषण गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ कहलाए।

स्थानीय धार्मिक विश्वास के अनुसार, सासाराम स्थित ताराचंडी धाम में मां सती का दाहिना नेत्र गिरा था। इसी मान्यता के कारण इस मंदिर को श्रद्धालुओं के बीच विशेष धार्मिक प्रतिष्ठा प्राप्त है। हालांकि, शक्तिपीठों की संख्या और उनसे जुड़ी कथाओं के विवरण अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में भिन्न मिल सकते हैं।

प्राकृतिक गुफा में बालिका स्वरूप में होती है मां की पूजा

ताराचंडी धाम की सबसे खास विशेषताओं में से एक है मां तारा का प्राकृतिक गुफा में विराजमान होना। कैमूर की पहाड़ियों की चट्टानों के बीच स्थित इस स्थान पर श्रद्धालु मां के दर्शन और पूजा-अर्चना करते हैं।

मंदिर के पुजारी अखिलेश गिरि के मुताबिक, यहां मां ताराचंडी की बालिका स्वरूप में पूजा की जाती है। उनके अनुसार, मंदिर में मां तारा को सिंदूर अर्पित नहीं किया जाता। मां की प्रतिमा के नीचे आदि गणेश की प्रतिमा भी स्थित है।

सहस्रबाहु और ऋषि जमदग्नि की कथा से जुड़ा है नाम

मंदिर के पुजारी कमलेश गिरि ने ताराचंडी धाम से जुड़ी एक अन्य धार्मिक कथा का उल्लेख किया। इस कथा के अनुसार, मां तारा सहस्रबाहु की कुलदेवी थीं। सहस्रबाहु एक शक्तिशाली राजा माने जाते थे।

कहा जाता है कि एक बार सहस्रबाहु ऋषि जमदग्नि के आश्रम पहुंचे। ऋषि ने अपनी दिव्य कामधेनु गाय की सहायता से राजा और उनके सैनिकों के भोजन की व्यवस्था की। गाय की विशेषताओं से प्रभावित होकर राजा उसे अपने साथ ले गए। इस घटना के बाद भगवान परशुराम और सहस्रबाहु के बीच युद्ध हुआ।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, युद्ध के दौरान जब परशुराम सहस्रबाहु का वध करने वाले थे, तब उन्हें मां तारा की कृपा का आभास हुआ। इसके बाद उन्होंने मां की तपस्या की। कथा में बताया जाता है कि मां तारा ने उन्हें बालिका स्वरूप में दर्शन दिए और उनके आग्रह पर चंडी रूप में फरसे में समाहित हुईं। यह कथा मंदिर की स्थानीय धार्मिक परंपरा का हिस्सा है।

नवरात्र में अखंड दीप जलाने की विशेष परंपरा

नवरात्र के अवसर पर ताराचंडी धाम में अखंड दीप प्रज्ज्वलित करने की परंपरा विशेष आकर्षण का केंद्र रहती है। मंदिर समिति के सचिव महेंद्र प्रसाद साहू के अनुसार, अनेक श्रद्धालु नौ दिनों तक लगातार दीप जलाकर मां की आराधना करते हैं।

कुछ भक्त अपनी मनोकामना पूरी होने के बाद दीप जलाते हैं, जबकि कई लोग किसी विशेष कामना के साथ यह परंपरा निभाते हैं। मंदिर परिसर में दीप जलाने के लिए अलग-अलग स्थान बनाए गए हैं। यहां शुद्ध देसी घी से दीप प्रज्ज्वलित किए जाते हैं और उनके रखरखाव के लिए पुजारियों तथा अन्य लोगों की टीम लगी रहती है।

वैदिक मंत्रोच्चार और पूजा-विधि के बीच जलते दीप मंदिर परिसर में भक्तिमय वातावरण बनाते हैं। श्रद्धालुओं के लिए यह परंपरा आस्था, समर्पण और प्रार्थना का प्रतीक है।

नवरात्र में उमड़ते हैं हजारों श्रद्धालु

मंदिर समिति के सचिव महेंद्र प्रसाद साहू के मुताबिक, नवरात्र के दौरान प्रतिदिन लगभग 20 से 30 हजार श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। सप्तमी, अष्टमी और नवमी के दिन भीड़ और अधिक बढ़ जाती है।

नवरात्र में दूर-दराज के क्षेत्रों से आने वाले भक्त मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं। श्रद्धालुओं का मानना है कि मां ताराचंडी अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं। यही विश्वास इस धाम को स्थानीय लोगों के साथ-साथ दूसरे क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालुओं के बीच भी लोकप्रिय बनाता है।

12वीं सदी के शिलालेख से जुड़ा है ऐतिहासिक महत्व

ताराचंडी धाम की पहचान धार्मिक आस्था के साथ-साथ ऐतिहासिक विरासत से भी है। मंदिर के निकट मौजूद एक प्राचीन शिलालेख का संबंध खरवार वंश के शासक महानायक प्रतापधवल देव से बताया जाता है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, उनके पुत्र शत्रुध्न ने यह शिलालेख अंकित कराया था।

इस शिलालेख को विक्रम संवत 1225 यानी लगभग 1169 ईस्वी का माना जाता है। यह मध्यकालीन क्षेत्रीय इतिहास को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। शिलालेख के पाठ, तिथि और ऐतिहासिक संदर्भ की पुष्टि संबंधित पुरातात्विक अभिलेखों से करना जरूरी है।

प्राचीन प्रतिमाएं भी बढ़ाती हैं धाम की महत्ता

ताराचंडी धाम के आसपास मां तारा और सूर्य की प्रतिमाओं सहित कुछ अन्य खंडित मूर्तियों का भी उल्लेख मिलता है। जिला प्रशासन के विवरण के अनुसार, इनमें से कुछ पुरावशेषों को गुप्तकाल के अंतिम चरण या परवर्ती गुप्तकाल से संबंधित बताया गया है।

ये प्रतिमाएं इस क्षेत्र की प्राचीन मूर्तिकला और सांस्कृतिक परंपराओं की जानकारी देती हैं। इनके संरक्षण और ऐतिहासिक विवरण को व्यवस्थित रूप से प्रदर्शित करने से श्रद्धालुओं के साथ-साथ इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वाले पर्यटकों को भी लाभ मिल सकता है।

धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की जरूरत

सासाराम अपनी ऐतिहासिक पहचान के लिए प्रसिद्ध है। यहां स्थित शेरशाह सूरी का मकबरा और कैमूर की पहाड़ियां पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। इसी क्षेत्र में मौजूद ताराचंडी धाम धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए साफ-सफाई, सुगम आवागमन, भीड़ प्रबंधन और आवश्यक सुविधाओं पर ध्यान देना जरूरी है। मंदिर परिसर में मौजूद प्राचीन शिलालेखों और प्रतिमाओं के बारे में प्रमाणिक जानकारी वाले सूचना-पट्ट लगाए जाने से इसकी ऐतिहासिक पहचान को समझना आसान हो सकता है।

विरासत संरक्षण में प्रशासन और समाज की भूमिका अहम

ताराचंडी धाम की प्राकृतिक और ऐतिहासिक विरासत को सुरक्षित रखना सामूहिक जिम्मेदारी है। प्राचीन शिलालेखों और प्रतिमाओं के संरक्षण के लिए विशेषज्ञों की सलाह, प्रशासनिक निगरानी और मंदिर प्रबंधन के बीच समन्वय आवश्यक है।

स्थानीय समुदाय की भागीदारी से इस स्थल की धार्मिक परंपराओं और ऐतिहासिक महत्व को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जा सकता है। मां ताराचंडी धाम आज भी हजारों श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है, वहीं इसकी ऐतिहासिक विरासत इसे बिहार के महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों में स्थान देती है।

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