रांची, 16 अक्टूबर 2026: झारखंड हाईकोर्ट ने हत्या और साक्ष्य छिपाने के करीब 17 साल पुराने मामले में आरोपी मो. खलील को बरी कर दिया है। अदालत ने हजारीबाग की निचली अदालत द्वारा सुनाई गई उम्रकैद और सात साल की सश्रम कारावास की सजा को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर साबित करने में विफल रहा।
मो. खलील ने निचली अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने जांच में सामने आई कमियों, गवाहों के बयानों और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का मूल्यांकन किया।
2009 में नाले के पास मिला था महिला का शव
यह मामला वर्ष 2009 का है। 21 मार्च 2009 को हजारीबाग जिले के बड़कागांव थाना क्षेत्र के पसेरिया गांव में एक पहाड़ी नाले के पास अज्ञात महिला का शव मिला था। महिला के शरीर पर चोट के निशान थे। शुरुआत में उसकी पहचान नहीं हो सकी थी, जिसके बाद पुलिस ने हत्या और साक्ष्य छिपाने के आरोप में अज्ञात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू की।
जांच के दौरान मृतका की पहचान ममता रानी डे उर्फ रीता डे के रूप में हुई। अभियोजन पक्ष के अनुसार, मृतका और मो. खलील के बीच पहले से संबंध थे और दोनों के बीच विवाद चल रहा था। अभियोजन ने इस विवाद को हत्या की संभावित वजह बताया था।
हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि संबंधों में विवाद या अन्य परिस्थितियां अपने आप में हत्या के आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
होटल संचालक ने आरोपी की पहचान नहीं की
अभियोजन पक्ष ने परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोपी की संलिप्तता साबित करने का प्रयास किया। मामले में बताया गया कि घटना से पहले 19 मार्च 2009 को आरोपी अपनी पत्नी के साथ रांची के स्टेशन रोड स्थित एक होटल में ठहरा था।
लेकिन सुनवाई के दौरान होटल संचालक ने अदालत में कटघरे में खड़े व्यक्ति की पहचान होटल में ठहरे व्यक्ति के रूप में करने से इनकार कर दिया। हाईकोर्ट ने माना कि इस गवाही से आरोपी को घटना से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी स्थापित नहीं हो सकी।
ड्यूटी रजिस्टर और समय को लेकर भी सवाल
घटना के समय आरोपी हटिया रेल थाना में तैनात था। बचाव पक्ष ने अदालत को बताया कि संबंधित तारीखों में उसकी ड्यूटी का विवरण गार्ड रजिस्टर में दर्ज था। दलील के अनुसार, 19 और 20 मार्च को वह मैगजीन गार्ड की ड्यूटी पर था, जबकि 21 मार्च को हटिया-जम्मूतवी एक्सप्रेस में ट्रेन एस्कॉर्ट पार्टी के साथ उसकी ड्यूटी थी।
निचली अदालत ने माना था कि ड्यूटी के बीच मिले समय में आरोपी हजारीबाग जाकर हत्या कर सकता था और फिर वापस लौट सकता था। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस निष्कर्ष को ठोस साक्ष्यों से समर्थित नहीं माना।
खंडपीठ के अनुसार, ऐसा कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं था जिससे यह साबित हो कि आरोपी ड्यूटी से अनुपस्थित रहा या निर्धारित समय में घटनास्थल तक जाकर अपराध कर सकता था। अदालत ने निचली अदालत के निष्कर्ष को अनुमान पर आधारित माना।
घटनास्थल पर संघर्ष के निशान नहीं मिले
हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी की गवाही पर भी विचार किया। जांच अधिकारी के अनुसार, जहां महिला का शव मिला था, वहां संघर्ष के स्पष्ट निशान नहीं पाए गए थे। यह भी स्थापित नहीं हो सका था कि हत्या वास्तव में किस स्थान पर हुई थी।
शव के पास महिला का बैग और अन्य सामान मिले थे। बैग में डायरी और कुछ कागजात थे, जिनमें मृतका और आरोपी के संबंधों से जुड़ी जानकारी का उल्लेख बताया गया था।
अदालत ने माना कि इन परिस्थितियों से आरोपी की संलिप्तता स्वतः साबित नहीं होती। अभियोजन पक्ष को प्रत्येक महत्वपूर्ण परिस्थिति को विश्वसनीय साक्ष्य से स्थापित करना जरूरी था।
धारा 313 के बयान से जुड़ी कमी भी अहम
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि निचली अदालत ने आरोपी और मृतका के बीच संबंधों तथा कथित विवाद को दोषसिद्धि के लिए महत्वपूर्ण माना था, लेकिन इन परिस्थितियों को लेकर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 313 के तहत दर्ज आरोपी के बयान में उचित सवाल नहीं पूछे गए थे।
अदालत के अनुसार, किसी आरोपी के खिलाफ दोषसिद्धि के लिए जिन परिस्थितियों पर भरोसा किया जा रहा हो, उन्हें उसका पक्ष रखने के लिए उसके सामने रखना आवश्यक है।
दोषसिद्धि और सजा का आदेश रद्द
सभी गवाहियों, दस्तावेजों और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष हत्या और साक्ष्य छिपाने के आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका।
इसके बाद खंडपीठ ने 16 सितंबर 2013 के दोषसिद्धि संबंधी फैसले और 17 सितंबर 2013 के सजा आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने मो. खलील की अपील स्वीकार करते हुए उन्हें दोनों आरोपों से बरी कर दिया।
रिपोर्ट के अनुसार, आरोपी पहले से जमानत पर था। हाईकोर्ट ने उसे जमानत बंधपत्र की देनदारी से भी मुक्त कर दिया।
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