क्या आपको पता है कि भक्तों के संकट और दुख हरने वाले भगवान हनुमान का जन्म कैसे हुआ था? भगवान शिव के साथ उनका क्या संबंध है? अगर नहीं, तो यह खबर आपके लिए है. आइए, एक पौराणिक कथा के माध्यम से इन सभी सवालों के जवाब जानते हैं.
हनुमान जयंती हर साल चैत्र माह की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है. मान्यता है कि इस दिन बजरंगबली माता अंजनी के रूप में जन्मे थे. इसलिए इस दिन देशभर में धूमधाम से हनुमान जन्मोत्सव मनाया जाता है. साल 2026 में यह पर्व 2 अप्रैल को मनाया जाएगा. मान्यता है कि इस दिन भगवान हनुमान की पूजा करने से जीवन के सभी कष्ट और दुख दूर होते हैं और जीवन में सफलता आती है.
तिथि और शुभ मुहूर्त
ज्योतिष गणना के अनुसार, चैत्र माह की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत 1 अप्रैल 2026 को सुबह 07:06 बजे से होगी और इसका समापन 2 अप्रैल को सुबह 07:41 बजे तक रहेगा. उदया तिथि की मान्यता के अनुसार, हनुमान जयंती का मुख्य उत्सव और व्रत 2 अप्रैल, गुरुवार को ही रखा जाएगा.
- ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:38 से 05:24 तक
- अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:00 से 12:50 तक
- पूजा का सर्वश्रेष्ठ समय: सूर्योदय से लेकर सुबह 07:41 तक (जब तक पूर्णिमा तिथि विद्यमान है)
हनुमान जी की जन्मकथा
ऋषियों का वरदान और राजा केसरी का साहस
पौराणिक काल में वानरराज केसरी एक महान योद्धा थे. एक बार वे प्रभास तीर्थ के पास घूम रहे थे. वहां उन्होंने देखा कि कुछ ऋषि-मुनि समुद्र के किनारे पूजा-पाठ कर रहे हैं. तभी अचानक वहां एक विशालकाय हाथी आ गया, जो ऋषियों की तपस्या में बाधा डालने लगा. ऋषियों को संकट में देख, पर्वत के शिखर पर खड़े राजा केसरी तुरंत नीचे आए. उन्होंने अपनी शक्ति से उस विशाल हाथी के दांत तोड़ कर ऋषियों की रक्षा की. इस प्रकार पूजा विधि-पूर्वक पूरी हुई. सभी ऋषियों ने आभार जताते हुए उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा “तुम्हें एक ऐसा पुत्र प्राप्त होगा, जो अपनी इच्छानुसार रूप बदल सकेगा, पवन के समान शक्तिशाली होगा और जिसके भीतर साक्षात भगवान शिव का अंश होगा.”
माता अंजनी और पवन देव की कथा
एक अन्य कथा के अनुसार, एक शाम माता अंजनी पर्वत के शिखर पर घूम रही थीं. डूबते सूरज की लालिमा बहुत सुंदर लग रही थी. अचानक तेज हवा चली. माता अंजनी को लगा कि शायद कोई अदृश्य राक्षस उन्हें परेशान कर रहा है. उन्होंने गुस्से में पूछा, “कौन है जो मेरा अपमान कर रहा है?”
तभी पवन देव प्रकट हुए. उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, “हे देवी! क्षमा करें. मैं कोई राक्षस नहीं हूं. ऋषियों ने आपके पति को मेरे जैसा शक्तिशाली पुत्र होने का वरदान दिया है. मैं तो बस भगवान शिव के अंश को आप तक पहुंचाने आया हूं.” पवन देव ने बताया कि भगवान शिव स्वयं उनके पुत्र के रूप में जन्म लेने वाले हैं.
अंजनीपुत्र का जन्म
पवन देव के प्रभाव और ऋषियों के आशीर्वाद से माता अंजनी ने एक दिव्य बालक को जन्म दिया. वह दिन चैत्र महीने की पूर्णिमा का था और दिन मंगलवार था. चूंकि पवन देव ने भगवान शिव के अंश को माता अंजनी तक पहुंचाया था, इसलिए हनुमान जी को ‘पवनपुत्र’ कहा जाता है. राजा केसरी के घर जन्म लेने के कारण उन्हें ‘केसरी नंदन’ और माता अंजनी के पुत्र होने के कारण ‘अंजनीपुत्र’ कहा जाता है.


