Monday, February 23, 2026

भारत के नए IT Rules 2026 के बाद X ‘Made with AI’ लेबल फीचर टेस्ट कर रहा है, जो डीपफेक और सिंथेटिक कंटेंट ट्रांसपेरेंसी बढ़ाएगा.

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सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पुराना नाम ट्विटर) एक नए फीचर पर काम कर रहा है, जिसके जरिए यूज़र्स खुद अपनी एआई पोस्ट पर “Made with AI” लेबल जोड़ सकेंगे. लीक हुई जानकारी के मुताबिक, यूज़र्स को यह नया फीचर एक टॉगल के रूप में मिलेगा, जिससे यूज़र यह डिस्क्लोज़ कर पाएगा कि उसकी फोटो, वीडियो या ऑडियो कंटेंट पूरी तरह एआई से बनाई गई है या उसे एआई टूल की मदद से एडिट किया गया है.

यह ख़बर एक इंडिपेंडेंट रिसर्चर @nima_owji ने अपने एक पोस्ट के जरिए शेयर की है. गौर करने वाली बात यह है कि एक्स के इस अपकमिंग फीचर की लीक जानकारी ऐसे वक्त में आई है, जब भारत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए एआई-जनरेटेड और डीपफेक कंटेंट को लेकर सख्त नियम लागू करने की समयसीमा तय कर दी है. ऐसा माना जा रहा है कि एक्स का यह नया फीचर भारत के रेगुलेटरी प्रेशर और ग्लोबल लेवल पर बढ़ती पारदर्शिता की मांग का परिणाम हो सकता है.

भारत के नए नियम क्या क्या कहते हैं?

भारत सरकार ने 10 फरवरी 2026 को सूचना प्रौद्योगिकी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस एंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) अमेंडमेंट रूल्स, 2026 नोटिफाई किए. इन नियमों को 20 फरवरी 2026 से लागू भी कर दिया गया है.

मंत्रालय ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (MeitY) की आधिकारिक अधिसूचना G.S.R. 120(E) और उसके साथ जारी FAQ के मुताबिक, सरकार का मकसद – एक ओपन, सेफ, ट्रस्टेड और अकाउंटेबल इंटरनेट बनाना है.

भारत में एक अरब से भी ज्यादा इंटरनेट यूज़र्स हैं, जिनमें ज्यादातर संख्या युवाओं की है. ऐसे में एआई से बनी फेक इमेज, वीडियो और ऑडियो (जिन्हें नियम में “Synthetically Generated Information” या SGI कहा गया है) से फैलने वाली मिसइनफॉर्मेशन यानी गलत जानकारी, डीपफेक, प्राइवेसी का उल्लंघन और नेशनल सिक्योरिटी थ्रेट को रोकना जरूरी हो गया है.

मुख्य प्रावधान क्या हैं?

  • प्लेटफॉर्म्स को “उचित और उपयुक्त तकनीकी उपाय” लागू करने होंगे ताकि अवैध एआई-जनरेटेड ऑडियो-वीडियो कंटेंट यानी डीपफेक (जैसे नॉन-कंसेंसुअल इंटीमेट इमेज, चाइल्ड एक्सप्लॉइटेशन, फेक डॉक्यूमेंट्स या भ्रामक डीपफेक) को रोका जा सके.
  • अगर कोई SGI यानी एआई कंटेंट कानूनी है और उसे ब्लॉक नहीं किया जाता है तो उसमें बिल्कुल साफ दिखने वाला लेबल और स्थायी मेटाडेटा या किसी अन्य विश्वसनीय प्रॉवेनेन्स सिस्टम के जरिए उसकी पहचान सुनिश्चित करनी होगी. इस लेबल को हटाया या बदला नहीं जा सकेगा.
  • एक्स, मेटा आदि जैसे बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को यूजर्स को कंटेंट अपलोड करते समय डिस्क्लोजर का ऑप्शन देना होगा कि ये कंटेंट एआई से बना है या नहीं. उसके बाद प्लेटफॉर्म को टेक्निकल टूल्स से वेरिफाई करना होगा और लेबल लगाना होगा.
  • एआई कंटेंट को इस तरह लेबल करना होगा कि आम यूजर तुरंत समझ सके कि वह सिंथेटिक है.
  • गैरकानूनी कंटेंट को सरकार या कोर्ट के ऑर्डर पर सिर्फ 3 घंटे में हटाना होगा. पुराने नियमों के मुताबिक, इसके लिए 36 घंटे का समय निर्धारित था.

यूजर्स को हर तीन महीने में चेतावनी देनी होगी और SGI बनाने वाले टूल्स पर एक्स्ट्रा वार्निंग भी देनी होगी. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हाल ही में AI Impact Summit के संदर्भ में कहा था कि डिजिटल कंटेंट को न्यूट्रिशन लेबल की तरह ऑथेंटिसिटी लेबल देना चाहिए.

C2PA क्या है और क्यों महत्वपूर्ण?

भारत अपने नए नियमों में जिन “प्रॉवेनेन्स सिस्टम्स” की बात कर रहा है, उनमें सबसे ज्यादा चर्चा C2PA की है. C2PA यानी Coalition for Content Provenance and Authenticity एक ओपन टेक्निकल स्टैंडर्ड है. इसे Adobe, Microsoft, Google, OpenAI, Intel जैसी बड़ी कंपनियां सपोर्ट करती हैं.

यह Content Credentials यानी कंटेंट की विश्वसनीयता की तरह काम करता है. यह ठीक वैसे जैसे खाने के पैकेट पर न्यूट्रिशन लेबल होता है. इसमें मेटाडेटा एम्बेड होता है. ये मुख्य तौर पर तीन चीजें बताता है:

  1. कंटेंट कहां से आया (यानी कंटेंट का ओरिजिन क्या है)
  2. कंटेंट कितनी बार एडिट हुआ है
  3. एआई का इस्तेमाल हुआ या नहीं

द वर्ज की रिपोर्ट के मुताबिक, ये प्रोवेनेंस टेक्नोलॉजी ब्रेकिंग न्यूज़ या चुनाव के समय फेक कंटेंट की शक को दूर करने में मदद करती है. भारत अपने नए नियमों में जिन प्रॉवेनेन्स सिस्टम्स की बात कर रहा है, वो C2PA जैसा ही सिस्टम है. एक्स (ट्विटर) ने पहले इस स्टैंडर्ड को अपनाया था, लेकिन एलन मस्क ने इसे छोड़ दिया था. अब भारत के द्वारा नए नियमों के लागू करने के बाद एक्स खुद का ‘Made with AI’ टॉगल बना रहा है.

एक्स पर क्या असर पड़ेगा?

एक्स जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए भारत एक बहुत बड़ा मार्केट है. नए नियमों का पालन न करने पर Safe harbour (सेक्शन 79) की सुरक्षा खत्म हो सकती है, यानी लीगल केस में प्लेटफॉर्म खुद जिम्मेदार साबित हो सकता है.

अब एक्स में आने वाला नया मेड विद एआई फीचर यूज़र को खुद एआई इंफोर्मेशन डिस्क्लोज करने की सुविधा देगा, लेकिन वेरिफिकेशन और लेबलिंग प्लेटफॉर्म को खुद ही सुनश्चित करनी होगी. अगर यूजर लेबल नहीं लगाता तो पोस्ट AI स्पैम या मिसलीडिंग मानी जा सकती है.

विशेषज्ञ का कहना है कि यद कदम सिर्फ भारत के लिए नहीं, बल्कि ग्लोबल लेवल पर एआई कंटेंट ट्रांसपेरेंसी की दिशा में बड़ा सिग्नल है. ऐसा हो सकता है कि आने वाले वक्त यूट्यूब, इंस्टाग्राम जैसे अन्य प्लेटफॉर्म भी एआई कंटेंट्स के लिए इसी सिस्टम को लागू कर सकते हैं.

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