नई दिल्ली: भारत और यूरोपीय संघ (EU) ने अपने द्विपक्षीय आर्थिक संबंधों को एक नई ऊंचाई पर ले जाते हुए प्रस्तावित मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के तहत एक-दूसरे को ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ (MFN) का दर्जा देने पर सहमति जताई है. यह निर्णय व्यापार समझौते के लागू होने के पहले पांच वर्षों के लिए प्रभावी होगा. इसका मुख्य उद्देश्य सेवाओं के क्षेत्र में व्यापार को सुगम बनाना और दोनों पक्षों के बीच समान अवसर सुनिश्चित करना है.
MFN प्रावधान का अर्थ और प्रभाव
मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा मिलने के बाद, भारत और यूरोपीय संघ के सेवा प्रदाता एक-दूसरे के बाजारों में उसी प्राथमिकता के हकदार होंगे, जो वे किसी तीसरे देश को प्रदान करते हैं. इसका सीधा मतलब यह है कि यदि भारत या EU भविष्य में किसी अन्य देश के साथ इससे भी बेहतर व्यापारिक शर्तें तय करते हैं, तो वे लाभ स्वतः ही एक-दूसरे को भी देने होंगे. इससे किसी भी पक्ष के साथ भेदभाव की संभावना समाप्त हो जाएगी.
हालांकि, यह नियम सभी क्षेत्रों पर लागू नहीं होगा. समाचार के अनुसार, कराधान संधियों, मानकों की आपसी मान्यता, और विवाद निपटान प्रक्रियाओं को इस प्रावधान से बाहर रखा गया है. इसके अलावा, सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थानीय सेवाओं को विशेष रियायत देने की अनुमति भी दी गई है.
छात्रों और पेशेवरों के लिए महत्वपूर्ण समीक्षा
इस समझौते का एक सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा इसकी समीक्षा प्रक्रिया है. समझौते के चौथे वर्ष में एक ‘संयुक्त समिति’ गठित की जाएगी. यह समिति इस बात का आकलन करेगी कि भारतीय छात्रों को यूरोपीय देशों में प्रवेश और वहां रहने में कितनी सुगमता हो रही है. साथ ही, छात्रों के काम करने के अधिकार और पेशेवर सेवा प्रदाताओं की अस्थायी आवाजाही से जुड़े नियमों की भी समीक्षा की जाएगी.
इस समीक्षा के परिणामों के आधार पर ही यह निर्णय लिया जाएगा कि 5 साल की प्रारंभिक अवधि के बाद MFN दर्जे को आगे बढ़ाया जाए या नहीं. यदि समिति इसे विस्तार न देने का फैसला करती है, तो नई बाध्यताएं समाप्त हो जाएंगी, लेकिन जो लाभ पहले ही दिए जा चुके हैं, वे सुरक्षित रहेंगे.
आर्थिक विकास को मिलेगी नई गति
भारत और यूरोपीय संघ ने लंबे समय से लंबित इस मुक्त व्यापार समझौते को पिछले महीने अंतिम रूप दिया था. इस डील का प्राथमिक लक्ष्य आयात-निर्यात पर लगने वाले टैरिफ (शुल्क) को कम करना और बाजार तक पहुंच को आसान बनाना है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस समझौते से आईटी (IT), इंजीनियरिंग, और स्वास्थ्य सेवाओं जैसे क्षेत्रों में भारतीय विशेषज्ञों के लिए यूरोप के दरवाजे खुलेंगे, वहीं यूरोपीय कंपनियों के लिए भारत में निवेश करना सरल होगा.


