साल 2026 की शुरुआत भारतीय शेयर बाज़ार और आईपीओ (IPO) मार्केट के लिए काफी उतार-चढ़ाव भरी रही है. पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में गहराते युद्ध के संकट ने न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला दिया है, बल्कि भारत के आईपीओ बाज़ार की रफ़्तार पर भी ‘ब्रेक’ लगा दिया है. कई बड़ी दिग्गज कंपनियों ने बाज़ार की अनिश्चितता को देखते हुए अपने आईपीओ फिलहाल टाल दिए हैं.
प्रमुख कंपनियों ने खींचे हाथ
इस संकट का सबसे बड़ा असर वॉलमार्ट के स्वामित्व वाली फिनटेक कंपनी PhonePe पर दिखा है. फोनपे ने मार्च 2026 में अपने लगभग 12,000 करोड़ रुपये ($1.3 बिलियन) के आईपीओ को आधिकारिक तौर पर रोक दिया है. कंपनी का कहना है कि वैश्विक बाज़ार में मची उथल-पुथल और युद्ध के कारण निवेशक डरे हुए हैं, ऐसे में लिस्टिंग करना जोखिम भरा हो सकता है.
इसी तरह, देश के सबसे बड़े आईपीओ के रूप में देखे जा रहे रिलायंस जियो की लिस्टिंग में भी देरी की संभावना है. 170 अरब डॉलर के संभावित मूल्यांकन वाली इस कंपनी के आईपीओ पर अब 2026 की पहली छमाही (H1) में आने की उम्मीद है. वहीं, OYO ने अपनी लिस्टिंग को तीसरी बार टालते हुए अब मार्च 2026 के अंत तक का लक्ष्य रखा है.
अन्य प्रमुख नाम जैसे boAt और Zepto ने भी मौजूदा माहौल को देखते हुए ‘इंतज़ार करो और देखो’ (Wait and Watch) की नीति अपनाई है. जेप्टो (Zepto) अब आईपीओ के बजाय प्राइवेट फंडिंग के विकल्पों पर विचार कर रहा है.
आईपीओ टलने के मुख्य कारण
बाज़ार विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनियां इस समय बाज़ार में उतरने से कतरा रही हैं क्योंकि:
बाज़ार में अस्थिरता और वैल्यूएशन: जब शेयर बाज़ार गिर रहा होता है, तो कंपनियों को वह कीमत (वैल्यूएशन) नहीं मिल पाती जिसकी वे उम्मीद करती हैं. हाल के आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल आए 65% आईपीओ अपने इश्यू प्राइस से नीचे ट्रेड कर रहे हैं.
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें: पश्चिम एशिया में तनाव से कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें बढ़ रही हैं. इससे भारत में महंगाई बढ़ने का डर रहता है, जो सीधे तौर पर शेयर बाज़ार की धारणा को प्रभावित करता है.
निवेशकों का डर: युद्ध की स्थिति में निवेशक सुरक्षित जगहों (जैसे सोना या सरकारी बॉन्ड) में पैसा लगाना पसंद करते हैं, जिससे नए आईपीओ के लिए फंड की कमी हो जाती है. सब्सक्रिप्शन की डिमांड जो पहले 28 गुना तक होती थी, वह अब घटकर मात्र 3 गुना रह गई है.
क्या यह मंदी लंबी चलेगी?
भले ही वर्तमान में आईपीओ बाज़ार सुस्त दिख रहा हो, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक अस्थायी दौर है. साल 2026 में अब तक लगभग $1.7 बिलियन के आईपीओ आ चुके हैं, जो पिछले साल के $2.3 बिलियन से कम हैं, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी स्थिति मजबूत है.
इतिहास गवाह है कि भू-राजनीतिक तनाव के कारण आने वाली गिरावट के बाद बाज़ार ने हमेशा जोरदार वापसी की है. आंकड़ों के अनुसार, ऐसी गिरावट के 6 महीने बाद औसतन 38% तक का रिटर्न देखने को मिला है.
इन्वेस्टमेंट बैंकर्स का कहना है कि कंपनियां “मैदान छोड़कर भागी नहीं हैं, बस सही समय का इंतज़ार कर रही हैं.” आने वाले 12 से 18 महीनों में जैसे ही युद्ध की स्थिति स्पष्ट होगी और बाज़ार स्थिर होगा, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) और एसबीआई फंड्स मैनेजमेंट जैसी बड़ी संस्थाएं फिर से बाज़ार का रुख करेंगी.
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