भारत की सड़कों के नीचे दबे दशकों पुराने तांबे के तार अब देश की नई डिजिटल क्रांति का आधार बनने जा रहे हैं. दूरसंचार विशेषज्ञ रमेश पेडपल्ली के अनुसार, जैसे-जैसे दुनिया हाई-स्पीड फाइबर-ऑप्टिक नेटवर्क की ओर बढ़ रही है, पुराने ‘कॉपर एसेट्स’ को रीसायकल करना भारत के लिए एक बड़ा आर्थिक और पर्यावरणीय अवसर बन गया है.
तांबे की वैश्विक कमी और भारत की स्थिति
आज पूरी दुनिया तांबे की भारी कमी का सामना कर रही है. इलेक्ट्रिक वाहन (EV), सौर ऊर्जा और 5G इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए तांबा अनिवार्य है. अनुमान है कि 2030 तक तांबे की आपूर्ति मांग के मुकाबले केवल 80% ही रह जाएगी. तांबे का नया खनन करना महंगा और समय लेने वाला काम है.
ऐसे में, टेलीकॉम कंपनियों के पास बिछा हुआ पुराना तांबा एक ‘शहरी खदान’ (Urban Mine) की तरह है. भारत में BSNL और MTNL जैसी सरकारी कंपनियों के पास 1985 से 2010 के बीच बिछाया गया करीब 4.5 करोड़ किलोमीटर लंबा तांबे का नेटवर्क है. यह नेटवर्क अब पुराना हो चुका है, लेकिन इसमें दबा तांबा अरबों रुपये का है.
‘कचरे से कंचन’: आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ
रमेश पेडपल्ली बताते हैं कि इस पुराने नेटवर्क को रीसायकल करने के कई बड़े फायदे हैं:
फाइबर रोलआउट के लिए फंड
पुराने तांबे को निकालकर और बेचकर कंपनियां करोड़ों रुपये जुटा सकती हैं. इस पैसे का इस्तेमाल ग्रामीण इलाकों में फाइबर इंटरनेट बिछाने के लिए किया जा सकता है. वैश्विक स्तर पर, बीटी ग्रुप (BT Group) जैसी कंपनियों ने इस प्रक्रिया से लगभग 1100 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई की है.
लागत में कमी
तांबे के पुराने तारों के रखरखाव में बहुत खर्च आता है. इन्हें हटाकर फाइबर लगाने से मेंटेनेंस का खर्च 35-60% तक कम हो जाता है.
पर्यावरण सुरक्षा
खदानों से तांबा निकालने की तुलना में रीसाइक्लिंग से होने वाला प्रदूषण 15% तक कम होता है. यह भारत के ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ के सपने को सच करने की दिशा में एक बड़ा कदम है.
भारतीय इंजीनियरिंग का वैश्विक डंका
इस पूरे बदलाव में भारतीय इंजीनियर एक अहम भूमिका निभा रहे हैं. हैदराबाद स्थित SYMNN Networks जैसी कंपनियां आज वैश्विक स्तर पर टेलीकॉम ऑपरेटरों को यह समझने में मदद कर रही हैं कि जमीन के नीचे दबे इस खजाने का सही इस्तेमाल कैसे किया जाए. रमेश पेडपल्ली, जिन्हें इस क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव है, कहते हैं कि भारतीय इंजीनियरिंग टीमें अपनी तकनीकी कुशलता के कारण दुनिया भर के फाइबर आधुनिकीकरण कार्यक्रमों की रीढ़ बनी हुई हैं.
भारत आज एक डिजिटल महाशक्ति बनने की राह पर है. जहाँ एक ओर फाइबर नेटवर्क हमें भविष्य की कनेक्टिविटी दे रहा है, वहीं दूसरी ओर हमारा पुराना तांबा नेटवर्क इस भविष्य को आर्थिक मजबूती देने की ताकत रखता है. यह न केवल दूरसंचार क्षेत्र को पुनर्जीवित करेगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक मील का पत्थर साबित होगा.


