टीपीएस कॉलेज, पटना में एक माह का “आयस्टर मशरूम कल्टीवेशन एवं स्पान प्रोडक्शन” प्रशिक्षण संपन्न हुआ। प्रधानाचार्य प्रो. तपन कुमार शांडिल्य ने बताया कि प्राचीन काल में देवताओं का आहार माने जाने वाले मशरूम अब विज्ञान से आय और पोषण का सशक्त साधन बन गए हैं।
पटना। टीपीएस कॉलेज, वनस्पति विज्ञान विभाग में एक माह तक चले “आयस्टर मशरूम कल्टीवेशन एवं स्पान प्रोडक्शन” का समापन गुरुवार को हो गया। यह कार्यक्रम कॉलेज के आईक्यूएससी के सहयोग से आयोजित हुआ।
प्रधानाचार्य प्रो. तपन कुमार शांडिल्य ने अपने संबोधन में कहा कि मशरूम का इतिहास अत्यंत प्राचीन और रोचक रहा है। प्राचीन काल में इसे देवताओं का आहार माना जाता था और इसकी दुर्लभता के कारण इसे विशेष महत्व प्राप्त था।
उन्होंने कहा कि आज वही मशरूम विज्ञान और तकनीक के माध्यम से आम लोगों के लिए आय और पोषण का सशक्त साधन बन चुका है। विशेष रूप से आयस्टर मशरूम कम समय (21 दिन) में तैयार होकर युवाओं को त्वरित आय का अवसर प्रदान करता है।
प्रो. ने बताया कि हिमाचल प्रदेश का सोलन आज “मशरूम सिटी” के रूप में पूरे देश में प्रसिद्ध है, जहां वैज्ञानिक पद्धति से बड़े पैमाने पर उत्पादन हो रहा है। उसी प्रकार बिहार में नालंदा जिला भी मशरूम उत्पादन के एक उभरते केंद्र के रूप में तेजी से विकसित हो रहा है।
उन्होंने कहा कि यह संकेत है कि हमारे राज्य में भी इस क्षेत्र में अपार संभावनाएं हैं। यदि विद्यार्थी इस प्रशिक्षण को आत्मसात कर व्यावहारिक रूप में अपनाएं, तो वे न केवल आत्मनिर्भर बन सकते हैं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी सशक्त कर सकते हैं।
पीपीयू की वनस्पति विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. मनोरमा कुमारी, प्रो. रिमझिम शील, डॉ. राम दास प्रसाद ने विचार व्यक्त किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वनस्पति विज्ञान विभागाध्यक्ष एवं आयोजन प्रमुख डॉ. विनय भूषण कुमार ने किया।


