राजभवन के नामकरण को लेकर विवाद गहरा गया है। हेमंत सरकार राजभवन का नाम बदलकर बिरसा-सिदो कान्हू भवन करना चाहती थी, लेकिन अब पलटवार करते हुए इसे ‘लोकभवन’ करने का प्रस्ताव है। इस मुद्दे पर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है और आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। नाम बदलने की इस कवायद पर सबकी निगाहें टिकी हैं। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने सदन में दिल्ली स्थित झारखंड भवन का मामला उठाया। कहा-जनता के पैसे से बने भवन में जनता के लिए ही जगह नहीं है।
रांची। झारखंड सरकार के प्रस्ताव को पलटते हुए राज्यपाल संतोष गंगवार बड़ा फ़ैसला लिया है। रांची स्थित राजभवन का नाम अब आधिकारिक तौर पर ‘लोकभवन’ कर दिया गया है। इसी तरह दुमका स्थित राजभवन का नाम भी अब ‘लोकभवन’ ही होगा।
मंगलवार को राजभवन की ओर से इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दी गई। दूसरी ओर हेमंत सरकार ने इसका विरोध किया है। रांची के राजभवन का नाम बिरसा भवन और दुमका के राजभवन का नाम सिदो कान्हू भवन रखना चाहती है सरकार। वित्त मंत्री ने सदन से इसकी अनुशंसा। कहा राजभवन राज्य सरकार की संपत्ति इसके नामकरण का भी है अधिकार।
सरकार चाहती थी आदिवासी नायकों के नाम
झारखंड विधानसभा के मौजूदा शीतकालीन सत्र में वित्त मंत्री डॉ. राधाकृष्ण किशोर ने सदन में निम्नप्रस्ताव रखा है-
- रांची राजभवन का नाम ‘बिरसा भवन’ और
- दुमका राजभवन का नाम ‘सिदो-कान्हू भवन’ रखा जाए।
मंत्री ने तर्क दिया था कि दोनों राजभवन राज्य सरकार की संपत्ति हैं और नामकरण का अधिकार भी राज्य सरकार को है। सरकार का कहना था कि भगवान बिरसा मुंडा तथा सिदो-कान्हू जैसे आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर राजभवन का नामकरण राज्य की अस्मिता और गौरव से जुड़ा कदम होगा।
राजभवन ने सीधे नाम बदलकर ‘लोकभवन’ किया
हालांकि राज्यपाल ने सरकार के इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया और दोनों राजभवनों का नाम एकसाथ ‘लोकभवन’ कर दिया। अधिसूचना में इसे “जनता का भवन” बताते हुए औपचारिक नामकरण किया गया है।
इस फ़ैसले से हेमंत सोरेन सरकार और राजभवन के बीच तनातनी एक बार फिर सामने आ गई है। विपक्षी दल भाजपा ने राज्यपाल के कदम का स्वागत किया है जबकि सत्ताधारी गठबंधन ने इसे राज्य सरकार के अधिकारों पर अतिक्रमण करार दिया है।
अब देखना यह है कि सरकार इस नामकरण को चुनौती देती है या इसे स्वीकार कर लेती है।
झारखंड भवन में क्षेत्र की जनता के रहने पर रोक की समीक्षा करेगी सरकार
नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने सदन में दिल्ली स्थित झारखंड भवन का मामला उठाया। उन्होंने सदन को बताया कि मंत्रिमंडल निगरानी एवं सचिवालय विभाग ने एक सरकुलर जारी किया है कि झारखंड भवन में विधायक के सगे-संबंधी ही रह सकते हैं।
विधायक जन प्रतिनिधि होता है। क्षेत्र की जनता भी किसी न किसी कार्य से दिल्ली जाती है, लेकिन उनके लिए झारखंड भवन में जगह नहीं है। जनता के पैसे से बने भवन में जनता के लिए ही जगह नहीं है। इसपर संसदीय कार्य मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने सदन को आश्वस्त किया कि ऐसा निगरानी विभाग ने कैसे किया, यह देखना पड़ेगा। वहां क्षेत्र की जनता के ठहरने पर रोक नहीं होना चाहिए।
सरकार इसकी समीक्षा करेगी। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने दिल्ली स्थित ऊर्जा विभाग के गेस्ट हाउस व दो-दो झारखंड भवन में आवासन का मामला सदन में उठाया। उन्होंने कहा कि ऊर्जा विभाग के गेस्ट हाउस के लिए पांच लाख रुपये प्रतिवर्ष खर्च होते हैं।
वहां पांच वर्ष में कौन-कौन ठहरा, यह देखने की बात है। दो-दो झारखंड भवन भी वहां हैं, जिसपर जनता की गाढ़ी कमाई खर्च हो रही है और उन्हें ही ठहरने से वंचित किया जा रहा है। इससे संबंधित प्रतिबंध अविलंब हटाने की
नामकरण पर संवैधानिक पेच और पूर्ववर्ती परंपराएं
राजभवन के नामकरण का अधिकार सीधे तौर पर संविधान में स्पष्ट नहीं है, जिससे यह विवाद पैदा हुआ है। राजभवन हालांकि राज्य सरकार की संपत्ति है, लेकिन राज्यपाल का पद और परिसर केंद्र के प्रतिनिधि के अधीन होता है।
कानूनी जानकारों का मानना है कि चूंकि राज्यपाल राज्य के संवैधानिक प्रमुख होते हैं और राजभवन परिसर उन्हीं के अधीन आता है, इसलिए वे परिसर के नामकरण पर अंतिम फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हो सकते हैं।
हालांकि, शिष्टाचार और लोकतांत्रिक परंपराएं कहती हैं कि राज्य सरकार के संवेदनशील प्रस्तावों, खासकर जो स्थानीय अस्मिता से जुड़े हों, उन्हें राज्यपाल को तवज्जो देनी चाहिए। नामकरण को ‘लोकभवन’ करने का फैसला एक तटस्थता दिखाने का प्रयास हो सकता है, लेकिन इसने हेमंत सोरेन सरकार को यह कहने का मौका दे दिया है कि उनके संवैधानिक अधिकारों का अतिक्रमण किया गया है।
झारखंड की अस्मिता से जुड़े नामकरण का इतिहास
यह पहली बार नहीं है जब झारखंड में स्थानीय अस्मिता से जुड़े नामकरण पर राजनीतिक खींचतान हुई है। भगवान बिरसा मुंडा और सिदो-कान्हू जैसे नायकों का नाम किसी भी संस्थान से जोड़ना राज्य के आदिवासी मूलवासी पहचान के लिए भावनात्मक और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होता है।
उदाहरण के लिए रांची का प्रमुख हवाई अड्डा बिरसा मुंडा हवाई अड्डा है और कई अन्य शैक्षणिक व सरकारी संस्थानों का नाम भी आदिवासी नायकों के नाम पर रखा गया है। सरकार का तर्क था कि चूंकि राजभवन एक प्रमुख पहचान चिन्ह है, इसलिए इसका नामकरण भी राज्य के गौरव से जोड़ा जाना चाहिए था।
राज्यपाल द्वारा नाम को बदलकर ‘लोकभवन’ करने से सत्ताधारी दल को यह आरोप लगाने का मौका मिला है कि राज्यपाल राज्य की पहचान और भावनाओं की अनदेखी कर रहे हैं, जिससे यह टकराव केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि भावनात्मक मुद्दा भी बन गया है।


