Tuesday, March 24, 2026

झारखंड में लागू पेसा एक्ट की नियमावली को लेकर बयानबाजी जारी है.

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रांचीः अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले जनजातियों को अधिकार संपन्न बनाने के उद्देश्य से राज्य सरकार ने हाल ही पेसा के तहत इसे कानूनी रूप दिया है. मगर जिस तरह से आदिवासी संगठन के साथ-साथ विपक्ष के द्वारा इसको लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, उससे यह विवाद शांत होने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है.

कानून जबरन थोपा जा रहा हैः भाजपा

विपक्षी दल भाजपा पेसा कानून के प्रावधान पर लगातार सवाल खड़े कर रही है. पार्टी का मानना है कि पेसा की आत्मा को ताक पर रखकर इसे जबरन थोपने का काम किया जा रहा है. भाजपा विधायक सीपी सिंह कहते हैं कि 1996 में केंद्र से पारित पेसा कानून के प्रावधान का ठीक ज्यों का त्यों पालन होना चाहिए था, न कि खानापूर्ति कर जनता के बीच जबरन लाया जाए.

पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने इस पर कड़ी टिप्पणी की है. उन्होंने कहा है कि झारखंड सरकार ने पेसा के नाम पर आदिवासी समाज को धोखा दिया है. उन्होंने कहा कि पिछले महीने सरकार ने पेसा अधिनियम लागू किया, लेकिन वे उसकी नियमावली को छुपाते रहे. जब नियमावली सामने आई, तब पता चला कि सरकार इसे छिपा क्यों रही थी. सरकार जो नियमावली लेकर आई है, वह पूरी तरह से आदिवासी विरोधी है. इस सरकार ने पेसा नियमावली के नाम पर आदिवासी समाज को धोखा दिया है. अगर आप पिछली नियमावली से तुलना करें तो इस सरकार ने इसके मूल स्वरूप को ही बदल दिया है.

पेसा के मूल भावना को नहीं किया गया दरकिनारः कांग्रेस

पेसा को लेकर चल रही सियासत के बीच कांग्रेस ने पलटवार करते हुए कहा है कि विपक्ष मुद्दाविहीन राजनीति कर रहा है, जिसमें कोई हकीकत नहीं है. पार्टी के प्रदेश महासचिव और मीडिया प्रभारी राकेश सिन्हा ने भाजपा पर पलटवार करते हुए कहा कि उनकी जमीन खिसक चुकी है, ऐसे में वह मुद्दा तलाश करते हैं जबकि हकीकत यह है कि उनके आरोप में कोई जमीनी हकीकत नहीं है.

राकेश सिन्हा ने पेसा की मूल भावना को दरकिनार किए जाने के आरोप को खारिज करते हुए कहा कि इसमें जनजातियों की मूल भावना और अधिकारों को संरक्षित करने का काम किया गया है.

यह कानून जनजाति विरोधी हैः आदिवासी नेता

सियासी बयानबाजी के बीच आदिवासी संगठन से जुड़े कुछ नेताओं के विरोध के स्वर तल्ख होते जा रहे हैं. पूर्व मंत्री गीताश्री उरांव, पूर्व मंत्री देव कुमार धान जैसे आदिवासी नेताओं ने पेसा नियमावली को जनजाति विरोधी बताया है.

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