रांची: प्राकृतिक संसाधन, जंगल में पाए जाने वाली जड़ी बूटियों से परिपूर्ण झारखंड में देसी चिकित्सा व्यवस्था, डॉक्टरों की घोर कमी की वजह से बंद होने के कगार पर पहुंच गई है. स्थिति यह है कि राज्य में आयुष यानी आयुर्वेदिक, यूनानी और होम्योपैथी चिकित्सा के कुल सृजित 662 पदों में से सिर्फ 48 डॉक्टर (7.25%) ही सेवा कार्य में बचे हैं, इसमें से भी साल 2026 में 7 और साल 2027 में 15 के करीब चिकित्सक सेवानिवृत्त हो जायेंगे.
झारखंड राज्य आयुष चिकित्सक सेवा संघ के सदस्य और रांची के जिला आयुष पदाधिकारी डॉ. साकेत कुमार बताते हैं कि लगातार आयुष चिकित्सक रिटायर्ड होते जा रहे हैं और स्थायी नियुक्ति नहीं हो रही है इसलिए आयुष चिकित्सकों की संख्या लगातार घटती जा रही है
उन्होंने कहा कि झारखंड उच्च न्यायालय के अगस्त 2025 में ही अपने फैसले में एलोपैथिक चिकित्सकों की तरह आयुष यानी आयुर्वेदिक, यूनानी, होम्योपैथी चिकित्सक की सेवानिवृति की उम्र सीमा 65 साल से बढ़ाकर 67 साल करने के आदेश की अनुपालन हो जाता तो अभी जो 48 चिकित्सक सेवा में हैं, उतनी संख्या अगले दो सालों तक बने रहने की संभावना है.
डॉक्टर की कमी से जूझ रहे आयुष विभाग की स्थिति का आकलन इसी से किया जा सकता है कि पूरे राज्य में अब यूनानी चिकित्सा के मात्र 3 डॉक्टर ही बचे हैं, उसमें से भी एक आयुष निदेशालय में प्रशासनिक जिम्मेदारी संभाले हुए हैं. कमोबेश यही हाल आयुर्वेद और होम्योपैथ पद्धति के डॉक्टरों का भी है.
झारखंड में राज्य सरकार के आयुष निदेशालय के अंतर्गत स्थायी डॉक्टरों के सृजित 662 पदों में से 614 पद खाली हैं, इसे भरने की जगह स्वास्थ्य विभाग ने अनुबंध पर सामुदायिक स्वास्थ्य अफसर बहाल कर स्वास्थ्य व्यवस्था को चलाने की कोशिश की है लेकिन उसमें भी ज्यादातर सीएचओ होमियोपैथी के हैं. आयुर्वेद और यूनानी के बेहद कम ही सीएचओ हैं.
जो भी डॉक्टर्स करीब 40 हजार की फिक्स सैलरी पर बहाल किये गए हैं, वह भी अच्छी जॉब अपॉर्चुनिटी मिलते ही अनुबंध की नौकरी छोड़ देते हैं: डॉ. साकेत कुमार, जिला आयुष पदाधिकारी
पेशे से आयुर्वेदिक चिकित्सक और आयुष विभाग में जिला आयुष चिकित्सा पदाधिकारी की जिम्मेदारी निभाने वाले डॉ. साकेत आगे कहते हैं कि सरकार को जल्द खाली पदों को भरना चाहिए और उच्च न्यायालय के आदेश के आलोक में आयुष चिकित्सकों की सेवानिवृति की उम्र सीमा बढ़ाकर 67 वर्ष कर देनी चाहिए क्योंकि योग्य और अनुभवी डॉक्टरों की कमी का खामियाजा आखिर में राज्य की बीमार और जरूरतमंद जनता को ही उठाना पड़ रहा है.


