रांची: बेशक, झारखंड एक खनिज संपन्न राज्य है लेकिन इसकी पहचान जल, जंगल और जमीन से होती है. यहां के आदिवासियों से होती है, जो जंगलों के असली रक्षक हैं. तमाम अभावों के बावजूद हंसी खुशी जंगलों में रहते हैं और अपनी परंपरा और संस्कृति को संजोए हुए हैं. लेकिन जंगलों में रहने वाले जनजाति समाज के लोग नहीं जानते कि साल 2006 में बना वन अधिकार कानून जंगल पर उनकी दावेदारी को किस कदर मजबूती देता है. लिहाजा, जागरूकता के अभाव में यह समाज शोषित होता रहा है. अब इस बेड़ी को तोड़ा जा रहा है. इसकी नींव पड़ती है बाल अखरा में, जिसका संचालन इंस्टीट्यूट ऑफ कॉम्यूनिटी फॉरेस्ट गवर्नेंस नामक संस्था कर रही है.
क्या है बाल अखरा
बोलचाल की भाषा में कहें तो बाल अखरा एक तरह का स्कूल है, जहां जंगल क्षेत्र के आदिवासी और गैर आदिवासी समाज के युवाओं को उनके अधिकारों की जानकारी दी जाती है. उन्हें पेसा यानी पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 के प्रावधानों से अवगत कराया जाता है. बाल अखड़ा में जंगल अधिकार, जंगल जैव विविधता, पर्यावरण, आदिवासी संस्कृति की रक्षा के लिए कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं.

कैसे काम करती है संस्था ICFG
यह संस्था रांची समेत राज्य के 12 जिलों में बाल अखरा के जरिए 14 से 18 वर्ष के युवक-युवतियों को ट्रेनिंग देकर जागरूक कर रही है. इसमें ज्यादातर आदिवासी बच्चे शामिल किए जाते हैं. हर गांव से 2 बच्चों को चयनित कर 20 गांव से 40 बच्चों की टीम बनाई जाती है. फिर गर्मी, सर्दी और दशहरा जैसे त्यौहारों की छुट्टियों के दौरान हर बैच को तीन दिन की ट्रेनिंग देकर उनके अधिकारों से अवगत कराया जाता है. संस्था ने रांची के बुढ़मू ब्लॉक स्थित पोटारी गांव में आवासीय प्रशिक्षण की भी व्यवस्था की है. एक टीम के 40 बच्चों में से 10 कुशल बच्चों का चयन कर 40 बच्चों की एक और टीम बनाई जाती है. इन बच्चों को एडवांस ट्रेनिंग देकर प्रोत्साहन स्वरुप सर्टिफिकेट भी दिया जाता है. संस्था के मुताबिक अबतक एक हजार से ज्यादा युवक-युवतियों को आवासीय ट्रेनिंग दी जा चुकी है. कुल करीब 20 हजार से ज्यादा बच्चों को उनके जल, जंगल और जमीन से जुड़े अधिकार बताए जा चुके हैं.
संस्था के निदेशक और अन्य के विचार
इंस्टीट्यूट ऑफ कॉम्युनिटी फॉरेस्ट गवर्नेंस के निदेशक संजय बसु मलिक के मुताबिक सिंहभूम, उत्तरी छोटानागपुर, दक्षिणी छोटानागपुर, पलामू प्रमंडल के 12 जिलों में साल 2008 से कार्यक्रम चल रहा है. बच्चों से पौधारोपण कराया जाता है. जंगल को आग से बचाने के भी उपाए बताए जाते हैं. उनका मानना है कि अपने अधिकार की जानकारी हासिल करने वाले बच्चे ही सही मायने में जंगल के संरक्षक बनेंगे. उन्हें समझना होगा कि जंगल क्यों जरुरी है. अब गांवों में भी शहरी संस्कृति हावी हो गई है. पुराने दौर को फिर से वापस लाने के लिए बच्चों को समझाना जरुरी है.
संस्था के को-ऑर्डिनेटर सोहन लाल कुम्हार ने बताया कि जबतक बच्चों को जल, जंगल और जमीन से जुड़े कानून की जानकारी नहीं जाएगी, वे अपने अधिकारों को नहीं समझ पाएंगे. इसलिए आज की पीढ़ी के लिए बाल अखरा बेहद मायने रखती है. संस्था के सहायक निदेशक जेवियर कुजूर का कहना है कि जंगल के संरक्षण और प्रबंधन में युवा पीढ़ी की महत्वपूर्ण भागीदारी सुनिश्चित कराने के लिए बाल अखरा के जरिए उन्हें शिक्षित किया जा रहा है.

बता दें कि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की 9 नवंबर 2021की रिपोर्ट के मुताबिक झारखंड में जंगल का कुल क्षेत्रफल 23,611 वर्ग कि.मी.है, जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का 29.62 प्रतिशत है. फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की 30 जुलाई 2024 को जारी रिपोर्ट कहती है कि अब झारखंड का कुल जंगल क्षेत्रफल 23,711 वर्ग किमी हो चुका है जो कुल क्षेत्रफल का 29.76 प्रतिशत है. इसमें संरक्षित वन 19,185 वर्ग किमी और संरक्षित वन 4,387 वर्ग किमी है. मौजूदा समय में झारखंड में करीब 14,850 गांवों में जंगल मौजूद है.


