रांची:12 नवंबर 2025 को हेमंत कैबिनेट ने “देसी मांगुर” को झारखंड की ‘राजकीय मछली’ का दर्जा देने वाले प्रस्ताव पर अपनी सहमति दे दी है. कैबिनेट द्वारा “देसी मांगुर” को स्टेट फिश का दर्जा देने की मंजूरी के बाद से यह मछली लोगों के बीच चर्चा में है. राज्य के मत्स्य निदेशक डॉ. एचएन द्विवेदी -N देसी मांगुर को ‘राजकीय मछली’ का दर्जा दिए जाने की पूरी कहानी बताई और यह भी बताया कि अब इस मछली के उत्पादन को बढ़ावा देना है.
मत्स्य निदेशालय झारखंड के निदेशक डॉ. एचएन द्विवेदी ने बताया कि भारत सरकार से मिले निर्देश के अनुसार लखनऊ के नेशनल ब्यूरो ऑफ फिश जेनेटिक रिसोर्सेज (NBFGR) की ओर से सभी राज्यों से अपने-अपने राज्यों में पायी जानेवाली किसी एक मछली का नाम “स्टेट फिश” के रूप में देने के निर्देश सभी राज्यों को दिए गए थे. इस क्रम में कृषि, पशुपालन और मत्स्य विभाग ने एक कमेटी बनाई थी. जिसने आपस में चर्चा कर यह सहमति बनाई कि ‘देसी मांगुर’ का नाम झारखंड की राजकीय मछली के रूप में अनुशंसित की जाए. कमेटी की उसी रिपोर्ट के आधार पर कैबिनेट ने कल यह फैसला लिया है कि झारखंड की राजकीय मछली देसी मांगुर होगी.
राज्य के मत्स्य निदेशक डॉ. एचएन द्विवेदी ने बताया कि बिहार में भी देसी मांगुर को राजकीय मछली का दर्जा दिया है, जबकि मछली की यह प्रजाति बिहार की तुलना में झारखंड में अधिक पायी जाती है.मत्स्य निदेशक ने बताया कि देसी मांगुर की नेचुरल ब्रीडिंग अब तक अधिक होती रही है, लेकिन इसकी संख्या अब जरूर कुछ कम हुई है.
उन्होंने यह भी बताया कि अन्य मछलियों की तुलना में देसी मांगुर में प्रोटीन और अन्य पोषक तत्वों की मात्रा अधिक होती है, इसलिए कई बीमारियों में चिकित्सक ‘देसी मांगुर’ खाने की भी सलाह देते हैं.

डॉ. एचएन द्विवेदी ने बताया कि देसी मांगुर प्रजाति की मछली मुख्यतः अपने नेचुरल ब्रीडिंग के लिए ही जानी जाती है, लेकिन अब जब इसे स्टेट फिश का दर्जा मिल गया है तो ऐसे में अब इसकी नेचुरल ब्रीडिंग के साथ-साथ हैचरी से इसके उत्पादन, राज्य के कई हिस्सों में इसके पालन के लिए प्रत्यरक्षण और निजी मत्स्य पालकों को भी इसके पालन के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा. देसी मांगुर को बचाना और उसका आगे बढ़ाना अब विभाग का लक्ष्य है.
डॉ. एचएन द्विवेदी ने बताया कि भारत सरकार द्वारा थाई मांगुर के पालन पर रोक लगी हुई है. उन्होंने बताया कि थाई मांगुर बहुत अधिक मांसाहारी होती है और उसके पालन से मछलियों के लोकल यानी स्थानीय प्रजातियों के खत्म हो जाने का खतरा है. इसलिए थाई मांगुर पर रोक लगाई गई है. उन्होंने राज्य के मत्स्य पालकों से अपील की है कि वह थाई मांगुर का पालन न करें, यह गैरकानूनी है. उसकी जगह देसी मांगुर का पालन करें यह स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद है, बाजार में इसकी बहुत मांग है और यह 800 से 1000 रुपये किलो तक बाजार में बिकती है.

राज्य में देसी मांगुर के उत्पादन का आंकड़ा नहीं
राज्य गठन के बाद से झारखंड में मछली पालन काफी बढ़ा है. कई प्रजाति की मछलियां राज्य में पाली जाती हैं, लेकिन “देसी मांगुर” को लेकर निदेशालय के पास अभी तक कोई आंकड़ा नहीं है कि राज्य में इसकी स्थिति क्या है और इसका कितना उत्पादन होता है? ऐसा इसलिए क्योंकि देसी मांगुर नेचुरल ब्रीडिंग करती है और अब तक इसके हैचरी ब्रीडिंग को लेकर कोई खास प्रयास नहीं हुआ है. ऐसे में अब जब हेमंत कैबिनेट में देसी मांगुर को स्टेट फिश का दर्जा देने का प्रस्ताव पारित हो गया है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि अब इस प्रजाति की मछलियों के पालन और विकास की गति रफ्तार पकड़ेगी.


