Wednesday, March 25, 2026

झारखंड की अर्थव्यवस्था को खदान और बड़े स्टील प्लांट के इर्द-गिर्द बुना गया मिथक अब टूटने की कगार पर है.

Share

रांची: झारखंड की अर्थव्यवस्था को खदान और बड़े स्टील प्लांट के इर्द-गिर्द बुना गया मिथक अब टूटने की कगार पर है. राज्य के पास अब 12 लाख से अधिक पंजीकृत सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (Micro, Small and Medium Enterprises यानी एमएसएमई) हैं जो 45 लाख लोगों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार दे रहे हैं. आंकड़े बता रहे हैं कि कृषि के बाद सबसे बड़ा रोजगार सृजनकर्ता अब यही क्षेत्र है. फिर भी उद्यमी, चैंबर और विशेषज्ञ एक स्वर में कहते हैं– राज्य में एमएसएमई आज भी ‘हाशिए’ पर खड़ा है.

एमएसएमई झारखंड की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार बन सकता है, क्योंकि यह रोजगार के अवसर पैदा करता है और औद्योगिक विकास में योगदान देता है. मगर वर्तमान स्थिति में राज्य में एमएसएमई हाशिए पर हैं. स्थानीय समस्याओं के साथ-साथ सरकारी उपेक्षा इसके विकास में बड़ी बाधा बनकर सामने आ रही है. इन सभी परेशानियों के बीच राज्य में हाल के वर्षों में एमएसएमई की संख्या में काफी वृद्धि हुई है. इस साल मार्च तक इसकी संख्या 12 लाख थी. इन उद्योगों से करीब 45 लाख लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिला है.

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम भारतीय अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग हैं जो जीडीपी में 30% का योगदान करते हैं. आंकड़ों के मुताबिक कृषि के बाद यह रोजगार का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत है और निर्यात में 45% हिस्सेदारी रखता है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस समय भारत में कुल 7,03,70,592 एमएसएमई पंजीकृत हैं. इनमें सूक्ष्म उद्यमों की संख्या 4,15,73,094 है, लघु उद्यम 4,83,258 और मध्यम आकार के उद्यम 36,347 हैं.

महाराष्ट्र में सबसे अधिक एमएसएमई हैं, उसके बाद उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु का नाम आता है. बात अगर झारखंड की करें तो जिस तेजी से यहां छोटे एवं मध्यम उद्योग शुरू होते हैं, उस अनुपात में उनका सफलता अनुपात (सक्सेस रेशियो) नहीं है. बैंक ऋण में देरी, सरकारी उदासीनता और स्थानीय स्तर पर होने वाले विवाद इनके लिए बड़ी चुनौतियाँ खड़ी करते हैं. इसके अलावा लैंड बैंक न होना, सिंगल विंडो सिस्टम का प्रभावी न होना और बिजली आपूर्ति का अनियमित होना भी बड़ी वजहें बताई जा रही हैं. झारखंड इस सूची में 12 लाख के साथ 15वें-16वें स्थान के आसपास है. शुरू होने की रफ्तार तेज है, लेकिन जीवित रहने और फलने-फूलने की दर सबसे कम.

हेमंत सरकार ने राज्य में एमएसएमई के जरिए औद्योगिक विकास का द्वार खोलने की कोशिश की है. झारखंड सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (विशेष छूट) विधेयक-2025 राज्यपाल की मंजूरी मिलने के साथ ही 12 नवंबर 2025 से राज्य में प्रभावी हो गया है. इस विधेयक से राज्य में नया उद्योग स्थापित करने की प्रक्रिया अब पहले से कहीं अधिक सरल और सुगम होगी.

इस कानून का मुख्य उद्देश्य राज्य में निवेश बढ़ाना, छोटे-मंझोले उद्योगों को प्रोत्साहन देना और व्यापक स्तर पर रोजगार के अवसर सृजन करना है. इसके तहत कोई भी व्यक्ति या कंपनी जो झारखंड में एमएसएमई स्थापित करना चाहता है, उसे अगले तीन वर्षों के लिए उद्योग की स्थापना और संचालन के लिए आवश्यक अधिकांश अनुमतियों और निरीक्षणों से छूट प्रदान की गई है. यह छूट वाणिज्यिक उत्पादन शुरू होने की तारीख से तीन साल तक प्रभावी रहेगी. इस नियम से नए उद्योग को सरकारी विभागों के चक्कर लगाने और इंस्पेक्टर राज के भय से मुक्ति मिलने की संभावना जताई जा रही है.

राज्य में एमएसएमई के अंतर्गत ‘इज ऑफ डूइंग बिजनेस’ की चुनौतियों का आकलन करने में इन दिनों झारखंड महालेखाकार कार्यालय जुटा हुआ है. प्रधान महालेखाकार इंदु अग्रवाल के नेतृत्व में एजी ऑफिस की टीम व्यवसायियों की समस्याओं और एमएसएमई की जमीनी हकीकत से सरकार को अवगत कराने की तैयारी कर रही है.

‘इज ऑफ डूइंग बिजनेस’ में झारखंड अन्य राज्यों की तुलना में काफी नीचे है, यद्यपि हाल ही में बिजनेस रिफॉर्म एक्शन प्लान सर्वे में झारखंड को ‘टॉप अचीवर’ का अवार्ड मिला है, लेकिन ओवरऑल रैंकिंग में केरल के आगे झारखंड सहित देश का कोई अन्य राज्य नहीं टिक पा रहा.

“हम कुछ कार्य इस क्षेत्र में करने वाले हैं, इसलिए हम एक चर्चा करने आए थे ताकि हमें भी थोड़ा आइडिया हो कि झारखंड में एमएसएमई क्षेत्र में काम कैसे हो रहा है. आज हमने बातचीत करके काफी कुछ सीखा और चैंबर ऑफ कॉमर्स का बहुत धन्यवाद है कि उन्होंने हमें इस बारे में विस्तृत जानकारी दी. यह एक सामान्य चर्चा थी, कोई बहुत विशिष्ट बात नहीं हुई. आगे हम इसे ऑडिट में देखेंगे.”- इंदु अग्रवाल, प्रधान महालेखाकार

इंदु अग्रवाल कहती हैं, “हम लोग जब तक स्वयं अपनी आंखों से नहीं देख लेते और कागजात की जांच नहीं कर लेते, तब तक कुछ विशेष नहीं बोल पाते. जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे और जानकारी एकत्र करेंगे, तदनुसार निष्कर्ष आएंगे और हम अपना काम करेंगे. अभी हम इस मामले में छात्र हैं – अभी तो पढ़ाई-लिखाई शुरू ही कर रहे हैं.”

वहीं, झारखंड चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष आदित्य मल्होत्रा कहते हैं, “कोई भी एमएसएमई को जीवित रहने और फलने-फूलने के लिए उचित वातावरण चाहिए. इसमें बहुत-सी चीजें शामिल होती हैं. झारखंड में देखें तो हमारी राज्य सरकार में आज व्यवसाय और उद्योग को प्राथमिकता नहीं दी जा रही है. केंद्र सरकार या राज्य सरकार की जो भी नीतियां आती हैं, उनका कार्यान्वयन भी यहां नहीं हो पाता.”

“सबसे महत्वपूर्ण चीजें जिन पर ध्यान नहीं दिया जाता, वे हैं – इन्फ्रास्ट्रक्चर, कनेक्टिविटी, अबाध बिजली आपूर्ति, कानून-व्यवस्था, और कुशल मानव संसाधन. राज्य सरकार जो स्किलिंग करा रही है और एमएसएमई को जिस तरह के कुशल कामगारों की जरूरत है, उनमें बहुत बड़ा अंतर है. नतीजा यह है कि यहाँ के कामगार दूसरे राज्यों में चले जाते हैं. दूसरी बात, झारखंड में न्यूनतम मजदूरी विकसित राज्यों की तुलना में अधिक है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ जाती है.”- आदित्य मलहोत्रा,अध्यक्ष झा.चैम्बर ऑफ कॉमर्स

इस मामले में में Jharkhand Small Industries Association (JEIA) के सचिव शिवम सिंह झारखंड में एमएसएमई की हालत से खुश नहीं हैं. वे कहते हैं, “किसी भी एमएसएमई को जीवित रहने के लिए एक पूरा इकोसिस्टम चाहिए. बेसिक समस्याएं अगर लगातार बनी रहेंगी तो उद्यमी कितने दिन तक उद्योग चला पाएगा? ज्यादातर एमएसएमई सिंगल-मैन आर्मी होती हैं–एक व्यक्ति ही सब कुछ करता है और उसके पास सीमित संसाधन होते हैं. ऐसी स्थिति में यदि एक भी विभाग के पीछे उसे बार-बार भागना पड़े तो बाकी काम छूट जाता है. इसलिए सरकार को ऐसा इकोसिस्टम तैयार करना चाहिए.

“2025 की नई नीति में 3 साल तक लाइसेंस की जरूरत नहीं – यह बहुत अच्छी पहल है. कम-से-कम विभागों के चक्कर और इंस्पेक्टर राज से तो निजात मिलेगी. दो-तीन साल उद्योग चलाने के बाद उद्यमी को यह भी पता चल जाता है कि क्या-क्या अनापत्ति प्रमाण-पत्र और लाइसेंस चाहिए.”- शिवम सिंह, सचिव, झारखंड लघु उद्योग (JEIA)

वहीं, महिला महिला उद्यमी आस्था किरण कहती हैं, “एमएसएमई में बहुत बड़ी व्यावसायिक संरचना आती है, माइक्रो से मध्यम स्केल तक सभी तरह के बिजनेस शामिल हैं. लेकिन झारखंड का परिदृश्य देखें तो हमें खुद को बहुत पीछे महसूस होता है.”

क्या है जमीनी हकीकत

सरकार भले कानून बना दें और उद्यमियों को झारखंड में पूरी मदद करने की बात करे लेकिन जमीनी हकीकत अगल है. राज्य के के उद्यमियों और विशेषज्ञों से जब बात की गई तो एक ही चित्र उभरा कि सरकार की नीति तो अच्छी है, लेकिन इकोसिस्टम नहीं है.

चार्टर्ड एकाउंटेंट महेंद्र कुमार जैन कहते हैं, “राज्य में एमएसएमई के सामने कई चुनौतियां हैं. सबसे बड़ी बात यहां जमीन की उपलब्धता नहीं है, इन्फ्रास्ट्रक्चर कम है, देश के बाकी हिस्सों से कनेक्टिविटी कमजोर है– ट्रेनें कम हैं, फ्लाइट सुविधा अपर्याप्त है. माल बाहर भेजने की सुविधा नहीं है.

“सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि यहां हैवी इंडस्ट्री नहीं हैं. हैवी इंडस्ट्री ‘मदर इंडस्ट्री’ होती हैं, उससे एंसिलरी यूनिट्स बढ़ती हैं और व्यापार-व्यवसाय की चेन बनती है. टाटा के अलावा कोई बड़ी हैवी इंडस्ट्री नहीं है, एचईसी रुग्ण पड़ा हुआ है. इसलिए राज्य में बड़े कारखाने लगाने की जरूरत है.”- महेंद्र कुमार जैन, चार्टर्ड एकाउंटेंट

कई उद्योगपति ये भी कहते हैं कि दूसरे राज्यों जैसे महाराष्ट्र, गुजरात और तमिलनाडु जैसे राज्यों में उद्योग लगाना काफी आसान होता है. लेकिन झारखंड अभी उनसे सीख नहीं पाया है. अभी भी कई बाधाएं हैं जिससे परेशानी का सामना करना पड़ता है और बिजनेसमैन अपने उद्योग झारखंड में लगाने से कतराते हैं.

उद्योगपति शशांक भारद्वाज कहते हैं, “सबसे बड़ी बाधा यह है कि नया उद्योग लगाना बहुत कठिन है. यह परेशानी सिर्फ झारखंड में नहीं, पूरे देश में है, लेकिन महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु जैसे कुछ राज्य यह सीख चुके हैं कि उद्योग कैसे सरलता से लगाए जा सकते हैं. हम अभी तक नहीं सीख पाए हैं. झारखंड सरकार ने पहल की है और चैंबर ने लगातार मांग उठाई थी कि ‘दो-लाइसेंस युग’ शुरू करें, यानी बिना पूर्व अनुमति के उद्योग लगने दें और 2-3 साल में सभी अहर्ताएं पूरी करने का समय दें.”

शशांक कहते हैं कि दो लाइसेंस युग से नए उद्योगपति सामने आएंगे, काम शुरू करेंगे और धीरे-धीरे नियमों का पालन कर लेंगे. अभी अनुमति में इतना समय और बाधाएं हैं कि उद्योगपति सोचता है कि दूसरे राज्य में आसानी से हो रहा है तो यहां झंझट क्यों झेलें? जब तक सरकार इस नीति पर आगे नहीं बढ़ेगी, झारखंड जैसे राज्य में बाहरी उद्योगपतियों का आना कठिन रहेगा.

“यहां औद्योगिक संस्कृति भी अभी उतनी सशक्त नहीं है. हमें यह देखना होगा कि दूसरे राज्य क्या कर रहे हैं और हम उनसे बेहतर क्या कर सकते हैं. उद्योग सिर्फ लगने से नहीं चलते, उन्हें चलाने के लिए सर्वश्रेष्ठ सुविधाएं देनी ही पड़ेंगी.” शशांक भारद्वाज, उद्योगपति

हालांकि बिजनेस रिफॉर्म एक्शन प्लान (BRAP) में झारखंड को इस साल ‘टॉप अचीवर’ का अवार्ड मिला है, लेकिन ओवरऑल ईज ऑफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग में राज्य अभी भी सबसे नीचे के पायदानों पर है.

क्या है आगे की राह

नया कानून बेशक तीन साल की सांस देगा, लेकिन विशेषज्ञों का एक स्वर है कि अगर बुनियादी मुद्दे नहीं सुलझे तो 2028 के बाद फिर वही कहानी शुरू हो जाएगी, 12 लाख एमएसएमई और 45 लाख रोजगार अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है, लेकिन यह आंकड़ा झारखंड की असली क्षमता का सिर्फ 30-35% है. अगर राज्य सरकार नए कानून को सिर्फ एक शुरुआत माने और अगले दो साल में उपरोक्त बुनियादी ढांचा तैयार कर लें तो अगले दशक में झारखंड का हो सकता है. अन्यथा तीन साल बाद फिर वही पुरानी कहानी हो जाएगी कि ‘उद्योग शुरू तो बहुत हुए, लेकिन चल नहीं पाए.’

Read more

Local News