धनबाद: डिजिटल युग में स्मार्टफोन बच्चों की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है. ऑनलाइन क्लास, गेम्स, सोशल मीडिया और वीडियो प्लेटफॉर्म की वजह से बच्चे घंटों मोबाइल स्क्रीन से चिपके रहते हैं. इसका असर उनकी पढ़ाई, व्यवहार और स्वास्थ्य पर साफ दिखाई देने लगा है. किताबों के प्रति रुचि कम होती जा रही है और लाइब्रेरी या स्टोरी बुक की जगह अब मोबाइल स्क्रीन ने ले ली है. विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम से बच्चों में चिड़चिड़ापन, एकाग्रता की कमी, आंखों की समस्या और नींद में बाधा जैसी दिक्कतें बढ़ रही हैं.
पहले जहां बच्चे खाली समय में कहानियां पढ़ते, आउटडोर गेम्स खेलते या रचनात्मक गतिविधियों में हिस्सा लेते थे, वहीं अब वे मोबाइल गेम्स और शॉर्ट वीडियो में अधिक समय बिता रहे हैं. इस समस्या के लिए कहीं न कहीं अभिभावक भी जिम्मेदार हैं. व्यस्त दिनचर्या के कारण कई माता-पिता बच्चों को शांत रखने या व्यस्त रखने के लिए मोबाइल थमा देते हैं. धीरे-धीरे यह आदत लत में बदल जाती है. घर में यदि बड़े भी लगातार फोन पर व्यस्त रहें तो बच्चे उसी व्यवहार को अपनाते हैं.
बच्चों में बढ़ती मोबाइल की लत चिंता का विषय
बच्चों में बढ़ती मोबाइल की लत को लेकर विशेषज्ञ लगातार चिंता जता रहे हैं. SNMMCH के साइकेट्रिस्ट डॉ. शिल्पी से ईटीवी भारत ने खास बातचीत की. डॉ शिल्पी का कहना है कि बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने आसपास देखते हैं. यदि बचपन से ही वे अपने माता-पिता के हाथों में लगातार मोबाइल देखते हैं, तो उनके लिए भी मोबाइल सामान्य और जरूरी चीज बन जाता है. ऐसे में बच्चों के जीवन में किताबों की जगह धीरे-धीरे मोबाइल ले लेता है.
डॉ. शिल्पी के अनुसार यह समस्या सिर्फ घर तक सीमित नहीं है, बल्कि स्कूलों में भी देखने को मिल रही है. आजकल कई शिक्षक भी पढ़ाई, होमवर्क या अन्य गतिविधियों के लिए मोबाइल का ही अधिक उपयोग करते हैं. इससे बच्चों के जीवन में स्मार्टफोन एक अहम हिस्सा बन चुका है, लेकिन समस्या यह है कि बच्चों को यह नहीं पता होता कि मोबाइल का इस्तेमाल कितना और कैसे करना चाहिए. इसकी जिम्मेदारी माता-पिता और शिक्षकों की होती है कि वे बच्चों को सही दिशा दें.
डॉ शिल्पी का कहना है कि आज स्मार्टफोन बहुत आसानी से उपलब्ध हो गया है. कंपनियां अपना मुनाफा देखती हैं और बाजार में लगातार नए-नए फोन ला रही हैं. आर्थिक रूप से सक्षम माता-पिता भी छोटे-छोटे बच्चों के हाथ में स्मार्टफोन दे देते हैं, यह सोचकर कि बच्चा मोबाइल पर अच्छी चीजें ही देख रहा होगा. लेकिन जरूरत से ज्यादा स्मार्टफोन बच्चों के मानसिक और व्यवहारिक विकास के लिए हानिकारक साबित हो सकता है.
मोबाइल से बच्चे में हो सकता है चिड़चिड़ापन
विशेषज्ञों के मुताबिक अत्यधिक मोबाइल इस्तेमाल से बच्चों में चिड़चिड़ापन और आक्रामकता बढ़ रही है. उनकी एकाग्रता और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम होती जा रही है. किसी समस्या को हल करने की क्षमता भी कमजोर पड़ रही है. कई बच्चे किसी समस्या को एक बार हल करने की कोशिश करते हैं और असफल होने पर तुरंत छोड़ देते हैं. इससे मानसिक तनाव, परिवार से दूरी और गंभीर मामलों में आत्मघाती प्रवृत्तियां तक देखने को मिल रही हैं.
मोबाइल गेम्स भी एक बड़ी समस्या बनते जा रहे हैं. कई बच्चे गेम खेलने के लिए पैसे मांगते हैं और पैसे नहीं मिलने पर आक्रामक हो जाते हैं. कई मामलों में वे गलत या घातक कदम भी उठा लेते हैं.
धीरे-धीरे बच्चों का स्क्रीन टाइम करें कम
हालांकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि बच्चों के हाथ से अचानक मोबाइल छीन लेना भी सही समाधान नहीं है. इसके बजाय माता-पिता और शिक्षकों को धीरे-धीरे बच्चों के स्क्रीन टाइम को कम करना चाहिए और उन्हें खेलकूद, किताब पढ़ने और रचनात्मक गतिविधियों की ओर प्रेरित करना चाहिए. बच्चों को मोबाइल से मिलने वाली जानकारी के साथ-साथ वास्तविक जीवन के अनुभव और प्रैक्टिकल सीख देना भी बेहद जरूरी है.


