Monday, March 16, 2026

गीता गोपीनाथ के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल से 2026 में वैश्विक महंगाई 60 बीपीएस बढ़ सकती है.

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नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई हालिया और जबरदस्त तेजी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी बजा दी है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री गीता गोपीनाथ ने चेतावनी दी है कि यदि तेल की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहीं, तो साल 2026 में वैश्विक विकास दर में बड़ी गिरावट आ सकती है और मुद्रास्फीति में भारी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है.

विकास दर और महंगाई पर सीधा असर
गीता गोपीनाथ के अनुसार, यदि 2026 में कच्चे तेल की औसत कीमत 85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहती है, तो यह वैश्विक जीडीपी विकास दर को 0.3 से 0.4 प्रतिशत (pp) तक कम कर सकती है. इसके साथ ही, वैश्विक मुद्रास्फीति में 60 आधार अंकों (bps) की वृद्धि होने की आशंका है. गौरतलब है कि संघर्ष शुरू होने से पहले, 2026 के लिए वैश्विक विकास दर का अनुमान 3.3 प्रतिशत लगाया गया था, जो कि 65 डॉलर प्रति बैरल की तेल कीमत के आधार पर था.

15 दिनों में 41% की भारी वृद्धि
पिछले केवल 15 दिनों के भीतर कच्चे तेल की कीमतों में 40 प्रतिशत से अधिक का उछाल देखा गया है. 27 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल लगभग 73 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था, जो शनिवार तक बढ़कर 103 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया. यह महज दो सप्ताह में 30 डॉलर प्रति बैरल की सीधी बढ़ोतरी है.

तनाव और युद्ध मुख्य कारण
तेल की कीमतों में इस अचानक आई तेजी का मुख्य कारण अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच छिड़ा भीषण सैन्य संघर्ष है. 28 फरवरी को अमेरिकी और इजराइली सेनाओं द्वारा ईरानी सैन्य ठिकानों और नेतृत्व पर किए गए सीधे हमलों के बाद स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई है. खबरों के मुताबिक, इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की भी मृत्यु हो गई है, जिससे मध्य पूर्व (Middle East) में अस्थिरता और अधिक बढ़ गई है.

हॉर्मुज जलडमरूमध्य का संकट
वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय हॉर्मुज जलडमरूमध्य में पैदा हुई बाधा है. यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल परिवहन के लिए जीवन रेखा माना जाता है. युद्ध के कारण इस मार्ग से होने वाली आपूर्ति बाधित हुई है, जिसका सबसे ज्यादा असर एशियाई देशों की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ रहा है.

अर्थशास्त्रियों की चिंता
दुनिया भर के नीति निर्माताओं और अर्थशास्त्रियों के बीच इस बात को लेकर गहरी चिंता है कि अगर यह संघर्ष लंबे समय तक खिंचता है, तो इसके परिणाम भयावह हो सकते हैं. ऊर्जा की बढ़ती कीमतें न केवल परिवहन और विनिर्माण की लागत बढ़ाएंगी, बल्कि आम जनता की जेब पर भी भारी बोझ डालेंगी. भारत जैसे देशों के लिए, जो अपनी तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करते हैं, यह स्थिति व्यापार घाटे और घरेलू महंगाई को अनियंत्रित कर सकती है.

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