Saturday, March 28, 2026

कतर से हीलियम की सप्लाई बाधित होने के कारण भारत में एमआरआई मशीनों का संचालन मुश्किल हो रहा है.

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नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का सीधा असर अब हमारी सेहत पर पड़ सकता है. हीलियम गैस की कमी, भारत की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है. हीलियम एक ऐसी गैस है जो एमआरआई (MRI) मशीनों में इस्तेमाल होने वाले शक्तिशाली सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट को ठंडा रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.

भारत, एमआरआई मशीनों को चलाने के लिए हीलियम के आयात पर पूरी तरह निर्भर है. यह मुख्य रूप से कतर से आता है. वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (supply chain) में बढ़ती अस्थिरता के कारण अस्पतालों और इमेजिंग केंद्रों को अब हीलियम की भारी किल्लत का डर सता रहा है.

फिक्की (FICCI) स्वास्थ्य सेवा समिति के अध्यक्ष और महाजन इमेजिंग एंड लैब्स के संस्थापक डॉ. हर्ष महाजन ने कहा कि वर्तमान संघर्ष का स्वास्थ्य क्षेत्र पर बुरा असर पड़ सकता है, क्योंकि हीलियम जैसे कई महत्वपूर्ण घटकों की कमी हो सकती है.

डॉ. महाजन ने बताया, “लिक्विड हीलियम की कमी से नए एमआरआई स्कैनर लगाने के काम पर असर पड़ेगा, क्योंकि शुरुआत में एमआरआई मैग्नेट को भरने के लिए लगभग 1500 लीटर लिक्विड हीलियम की ज़रूरत होती है. युद्ध या संघर्ष की वजह से पैदा हुई इस कमी के कारण नई मशीनों को लगाने में देरी हो सकती है और हीलियम की कीमतें बढ़ने से लागत भी काफी बढ़ सकती है.”

आंकड़ों के अनुसार, भारत की वार्षिक हीलियम खपत लगभग 0.15 बिलियन क्यूबिक फीट है, जो कुल वैश्विक खपत का लगभग 2.3 प्रतिशत है. मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक हीलियम बाजार को भारी व्यवधान का सामना करना पड़ रहा है, जिससे कतर से होने वाली आपूर्ति सीमित हो गई है. कतर दुनिया की कुल हीलियम आपूर्ति का लगभग 30% से 33% हिस्सा प्रदान करता है, और अब इस कमी के कारण अमेरिका और अन्य आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता बढ़ानी पड़ रही है.

एक प्रमुख तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) सुविधा, रास लफान इंडस्ट्रियल सिटी (Ras Laffan Industrial City) पर ड्रोन हमलों के बाद, कतर का हीलियम उत्पादन गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है.

भारत के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के जाने-माने विशेषज्ञ और एशियन सोसाइटी फॉर इमरजेंसी मेडिसिन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. तमोरिश कोले ने ETV Bharat को बताया, “कतर और आसपास के पश्चिम एशियाई क्षेत्र में जारी संघर्ष से भारत में हीलियम के आयात में बाधा आने की पूरी संभावना है, क्योंकि वैश्विक हीलियम आपूर्ति में कतर की एक बड़ी हिस्सेदारी है.”

उन्होंने आगे कहा, “चूंकि हीलियम प्राकृतिक गैस प्रसंस्करण का एक सह-उत्पाद है, इसलिए एलएनजी उत्पादन में कोई भी रुकावट, प्लांट का बंद होना या शिपिंग (समुद्री मार्ग) की पाबंदियां इसकी उपलब्धता को काफी कम कर सकती हैं. भारत, जो पूरी तरह से आयात पर निर्भर है और जिसके पास अपना कोई घरेलू भंडार नहीं है, इस स्थिति में विशेष रूप से संवेदनशील है.”

डॉ. कोले के अनुसार, “इसका तत्काल प्रभाव हीलियम की कीमतों में बढ़ोतरी और आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव के रूप में दिखेगा. यह सीधे तौर पर उन एमआरआई मशीनों के संचालन और रखरखाव को प्रभावित करेगा, जो मैग्नेट की सुपरकंडक्टिविटी बनाए रखने के लिए लिक्विड हीलियम पर निर्भर हैं.”

मरीजों पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में डॉ. कोले ने कहा कि यह असर धीरे-धीरे होगा और फिलहाल तुरंत घबराने की कोई बात नहीं है. उन्होंने बताया, “हालांकि, संचालन लागत बढ़ने से एमआरआई स्कैन के शुल्क बढ़ सकते हैं. कुछ केंद्रों- विशेष रूप से छोटे या स्टैंडअलोन क्लीनिकों, को आपूर्ति की कमी का सामना करना पड़ सकता है, जिससे जांच की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है या प्रतीक्षा समय बढ़ सकता है.”

डॉ. कोले ने चेतावनी दी, “स्ट्रोक, ट्रॉमा (गंभीर चोट) या कैंसर जैसी गंभीर स्थितियों में, एमआरआई इमेजिंग में किसी भी देरी से महत्वपूर्ण निदान और उपचार के फैसलों में देरी हो सकती है, जिसका असर मरीज की सेहत पर पड़ सकता है. हालांकि मेडिकल क्षेत्र के लिए हीलियम को प्राथमिकता दी जाती है, लेकिन लंबे समय तक आपूर्ति बाधित रहने से जांच तक पहुंच कम हो सकती है, डायग्नोस्टिक्स धीमा हो सकता है और पहले से ही बोझ तले दबी स्वास्थ्य प्रणालियों पर तनाव बढ़ सकता है.”

आंकड़ों के अनुसार, भारत में हीलियम बाजार का राजस्व 2030 तक 203.6 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है. जब ‘हीलियम-मुक्त एमआरआई सिस्टम’ जैसे अन्य विकल्पों के बारे में पूछा गया, तो डॉ. कोले ने कहा, “हां, कुछ कंपनियों द्वारा विकसित ‘हीलियम-लाइट’ और ‘हीलियम-फ्री’ एमआरआई सिस्टम के रूप में व्यवहार्य विकल्प उभर रहे हैं. इनमें ऐसी एमआरआई तकनीक शामिल है जो सील किए गए मैग्नेट का उपयोग करती है, जिसमें बहुत कम या बिल्कुल भी हीलियम की आवश्यकता नहीं होती और बार-बार गैस भरने की ज़रूरत खत्म हो जाती है.”

हालांकि, डॉ. कोले के अनुसार, इनमें से अधिकांश सिस्टम वर्तमान में कम क्षमता वाले स्कैनर हैं और जटिल इमेजिंग जरूरतों के लिए हाई-एंड पारंपरिक एमआरआई की पूरी तरह से जगह नहीं ले सकते. मौजूदा मशीनों की संख्या और लागत की सीमाओं को देखते हुए, ये नए सिस्टम पारंपरिक प्रणालियों को पूरी तरह बदलने के बजाय उनके पूरक के रूप में काम करेंगे, और आने वाले वर्षों में धीरे-धीरे इनका उपयोग बढ़ेगा.

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