इस वर्ष फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा पर मघा नक्षत्र और सुकर्मा योग में होलिका दहन सोमवार देर रात 12:50 से 2:02 बजे के बीच होगा। रंगों का पर्व होली 4 मार्च को मनाया जाएगा।
पटना। इस वर्ष फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा पर मघा नक्षत्र और सुकर्मा योग के शुभ संयोग में होलिका दहन किया जाएगा।
भद्रा के पुण्य काल में सोमवार देर रात 12:50 बजे से 2:02 बजे के बीच पूर्णिमा तिथि में होलिका दहन का उत्तम मुहूर्त है। पूर्णिमा तिथि दो दिन होने के कारण रंगों का पर्व होली 4 मार्च को उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाएगा।
ज्योतिषाचार्य राकेश झा के अनुसार, होलिका दहन से पहले विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाएगी। श्रद्धालु अपने भीतर के राग-द्वेष, क्लेश और दुखों को होलिका की अग्नि में समर्पित कर उनके नाश की प्रार्थना करेंगे।
गेहूं की बाली भूनकर प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा
पूजा में अक्षत, गंगाजल, रोली-चंदन, मौली, हल्दी, दीपक और मिष्ठान अर्पित किए जाएंगे। इसके बाद आटा, गुड़, कर्पूर, तिल, धूप, गुग्गुल, जौ, आम की लकड़ी और उपले अग्नि में डालकर सात बार परिक्रमा की परंपरा निभाई जाएगी।
मान्यता है कि विधिवत होलिका दहन से घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। होलिका दहन के बाद चना या गेहूं की बाली भूनकर प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा भी निभाई जाती है।
होलिका भस्म का विशेष महत्व
शास्त्रों में होलिका दहन की भस्म को पवित्र माना गया है। होली के दिन इस भस्म का टीका लगाने से सुख-समृद्धि बढ़ती है और नई फसल की उन्नति के साथ घर में माता अन्नपूर्णा की कृपा बनी रहती है।
अर्पित की जानेवाली सामग्री और उनका महत्व
- गोबर के उपले: नकारात्मक ऊर्जा का ह्रास
- लौंग: अनिष्ट ग्रहों के प्रभाव में कमी
- बताशा-चीनी: सुख-समृद्धि में वृद्धि
- गुड़-शक्कर: कर्ज से मुक्ति
- इलायची: कुशाग्र बुद्धि
- हल्दी: वैवाहिक सुख
- चंदन की लकड़ी: भौतिक सुख में बढ़ोतरी
- काला तिल: शत्रुओं से शांति
- कर्पूर: मानसिक शांति
- आम की लकड़ी: नकारात्मकता का नाश
धार्मिक और आध्यात्मिक संदेश
होलिका दहन असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक है। भक्त प्रह्लाद की आस्था और ईश्वर की कृपा की यह कथा अहंकार, अधर्म और अन्याय पर धर्म की विजय का संदेश देती है।
अग्नि को शुद्धि का प्रतीक मानते हुए होलिका की अग्नि में बुराइयों और नकारात्मकता का दहन किया जाता है। यह पर्व आत्मिक शुद्धि, अहंकार-त्याग और नवजीवन के शुभारंभ की प्रेरणा देता है।
परंपराओं में विविधता, उत्सव में एकता
राजधानी और आसपास के क्षेत्रों में लोग अपनी-अपनी परंपराओं के अनुसार अगजा जलाते हैं। मारवाड़ी समाज में महिलाएं राजस्थानी रीति से होलिका पूजन करती हैं, मराठी समाज घर-घर से लकड़ी और गोइठा लाकर होलिका सजाता है और नारियल व पोरन पोली का नैवेद्य अर्पित करता है।
जैन समाज तीर्थ स्थलों पर पूजा-अर्चना करता है। गांवों में सुबह कीचड़ से होली खेलने के बाद रंगों का उल्लास छा जाता है, जबकि शाम को लोग एक-दूसरे को गुलाल लगाकर सौहार्द का संदेश देते हैं।
कुल मिलाकर, शुभ संयोगों के साथ होलिका दहन और उसके अगले दिन रंगों की होली—खुशियों, भाईचारे और सकारात्मकता का उत्सव लेकर आ रही है।


