2019 तक, दुनिया भर में 262 मिलियन रोगियों में अस्थमा का निदान किया गया था, और यह दुनिया भर में एक गंभीर हेल्थ प्रॉब्लम बनी हुई है. वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यू के अनुसार, ये आंकड़े भारत में ग्लोबल एवरेज से बहुत कम हैं, लेकिन यह अभी भी एक गंभीर पब्लिक हेल्थ प्रॉब्लम है. भारत में लगभग 30-35 मिलियन लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं, जो दुनिया भर के मामलों का एक बड़ा हिस्सा है. भारत में अस्थमा से होने वाली मौतें भी चिंता का विषय हैं.
अस्थमा के मरीजों को सांस लेने में तकलीफ, बार-बार दौरे पड़ने और इनहेलर पर निर्भरता की वजह से काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है. हालांकि, अब एक नई दवा ‘Lunsekimig’ उम्मीद की एक किरण बनकर सामने आई है, जिसने क्लिनिकल ट्रायल में काफी अच्छे नतीजे दिखाए हैं. Sanofi की Lunsekimig ने अस्थमा और CRSwNP दोनों के लिए फेज 2 रेस्पिरेटरी स्टडीज में अपने मुख्य और अहम सेकेंडरी लक्ष्यों को सफलतापूर्वक हासिल किया है. इसी बात को ध्यान में रखते हुए, आइए जानते हैं कि Lunsekimig आखिर है क्या और कैसे काम करता है?

लुन्सेकिमिग क्या है?
लुन्सेकिमिग एक नेक्स्ट जनरेशन की बायोलॉजिक दवा है जिसे अस्थमा के लक्षणों को बढ़ाने वाले अंदरूनी सूजन के रास्तों को टारगेट करने के लिए डिजाइन किया गया है. पारंपरिक इनहेलर जो फेफड़ों में स्थानीय रूप से लक्षणों का इलाज करते हैं, उनसे अलग यह दवा सिस्टमिक लेवल पर काम करती है, और शायद लंबे समय तक कंट्रोल दे सकती है.
मतलब, यह दवा एक साथ दो मुख्य इंफ्लेमेटरी प्रोटीन-IL-13 और IL-17V को ब्लॉक करती है. पारंपरिक बायोलॉजिक्स अक्सर सिर्फ एक ही रास्ते को टारगेट करते हैं. जहा इनहेलर सिर्फ फेफड़ों की नसों को तुरंत आराम देते हैं, वहीं लंसेसिमिग शरीर के सिस्टमिक लेवल तक जाती है और बार-बार होने वाले अस्थमा अटैक या सूजन की असली वजह को पकड़ती है.
यह रिसर्च बताती है कि यह उन मरीजों में असरदार हो सकती है जिनका अस्थमा स्टैंडर्ड इनहेलर या दूसरी दवाओं से कंट्रोल नहीं हो रहा है. आसान शब्दों में, यह दवा फेफड़ों के “फायरफाइटर” की तरह नहीं, बल्कि शरीर के अंदर “फायरप्रूफिंग” की तरह काम करती है.
Lunsecimig के क्लिनिकल ट्रायल की मुख्य बातें
डेटा पूल में मध्यम से गंभीर अस्थमा वाले वयस्क मरीज शामिल थे, यह बीमारी का एक ऐसा रूप है जिसमें स्टैंडर्ड इलाज के बावजूद लक्षण और अटैक बने रहते हैं. फेज II ट्रायल में अस्थमा से पीड़ित 1147 पार्टिसिपेंट्स शामिल थे, और ट्रायल का ज्योग्राफिकल स्कोप ग्लोबल था ताकि अलग-अलग पॉपुलेशन में इसका असर साबित हो सके. इस ट्रायल के लिए दुनिया भर में 252 जगहों का इस्तेमाल किया गया, जिसमें आंशिक रूप से सांस से ली जाने वाली नाइट्रिक ऑक्साइड को कम करने, फेफड़ों के काम करने की क्षमता को बेहतर बनाने और अस्थमा के दौरों से जुड़ी समस्याओं को कम करने में आशाजनक नतीजे देखने को मिले.

लुन्सेसिमिग का असर देखने के लिए इसे कई अगल-अलग डोज regimens में दिया गया. इस अध्ययन का एक मुख्य उद्देश्य 48 सप्ताह पर अस्थमा के दौरों की घटना दर का पता लगाना था.
लंसेकिमिग के साथ रिस्क और लिमिटेशन
- ट्रायल अभी फेज 2 में है और अस्थमा की अलग-अलग कंडीशन वाले लोगों में इसका असर साबित करने के लिए और ट्रायल की जरूरत है.
- अस्थमा के मरीजों के लिए सुरक्षित इस्तेमाल के लिए नई दवा को कुछ रेगुलेटरी फ्रेमवर्क को फॉलो करना होगा.
- यह दवा अभी आम इस्तेमाल के लिए अप्रूव नहीं हुई है, और यह देखने के लिए कि यह कितनी मददगार हो सकती है, इसे और ट्रायल से गुजरना होगा.
अस्थमा के लक्षण

डॉ. सोलंकी बताते हैं कि अस्थमा एक ऐसी समस्या है जो 6 महीने के बच्चे से लेकर बुज़ुर्ग तक किसी को भी हो सकती है. अस्थमा के लिए कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं जैसे हेरिडिटी, कोई हेल्थ प्रॉब्लम, एलर्जी, इंफेक्शन, मौसमी दिक्कतें और प्रदूषण आदि. वह बताते हैं कि ज्यादातर मामलों में अस्थमा के लिए जेनेटिक वजहें जिम्मेदार होती हैं. ज्यादातर मामलों में, ऐसे बच्चों में इस बीमारी के लक्षण छह महीने की उम्र के बाद दिखने लगते हैं. जैसे उन्हें बहुत खांसी आती है और वे बहुत रोते हैं क्योंकि वे सांस लेने में दिक्कत या सीने में जकड़न और दूसरी दिक्कतों के बारे में बात नहीं कर पाते. ऐसे में माता-पिता या बच्चे की देखभाल करने वाले व्यक्ति को ज्यादा अलर्ट रहने की जरूरत होती है.
दूसरी ओर, जिन एडल्ट्स को अस्थमा होता है, जब वे चलते हैं, खेलते हैं या ऐसी एक्टिविटीज में हिस्सा लेते हैं जिनमें बहुत ज्यादा शारीरिक मेहनत लगती है और सांस लेने की रफ्तार बढ़ जाती है, तो उन्हें सांस लेने में दिक्कत होने लगती है. इसके अलावा, कुछ लोगों को बहुत ज्यादा और लंबे समय तक खांसी आना, सीने में भारीपन या जकड़न महसूस होना, और बहुत ज्यादा थकान और कमजोरी महसूस होना जैसी दिक्कतें भी होती हैं. वह बताते हैं कि कई बार मौसम बदलने पर, जानवरों के पास जाने या उनके साथ खेलने पर, पेंट या केरोसिन जैसी तेज महक वाली चीजों के संपर्क में आने पर, बहुत ज्यादा ठंडा खाने या पीने पर या ऐसे माहौल का हिस्सा बनने पर जहां बहुत ज्यादा धूल, गंदगी और प्रदूषण हो, लोगों को सांस से जुड़ी और दूसरी परेशानियां हो सकती हैं.


