भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए व्यापार समझौते के बावजूद, ट्रंप प्रशासन ने भारतीय सौर ऊर्जा उद्योग को एक गहरा जख्म दिया है. अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने भारत से आयात होने वाले सोलर सेल और पैनलों पर 125.87% (लगभग 126%) का भारी-भरकम शुरुआती ‘काउंटरवेलिंग ड्यूटी’ (CVD) लगा दिया है. अमेरिका का आरोप है कि भारत सरकार अपनी कंपनियों को अनुचित सब्सिडी दे रही है, जिससे अमेरिकी घरेलू निर्माताओं को नुकसान हो रहा है.
घरेलू कंपनियों के लिए बाजार हुआ बंद
सिटी के विश्लेषकों के अनुसार, इस अत्यधिक शुल्क के कारण भारतीय सोलर कंपनियों के लिए अमेरिकी बाजार के दरवाजे लगभग बंद हो सकते हैं. 2024 में भारत ने अमेरिका को करीब $792.6 मिलियन के सोलर उत्पादों का निर्यात किया था, जो 2022 की तुलना में 9 गुना अधिक था. अब इतनी ऊंची ड्यूटी के बाद भारतीय पैनलों की कीमतें अमेरिकी बाजार में दोगुनी से ज्यादा हो जाएंगी, जिससे वे होड़ से बाहर हो सकते हैं.
सिर्फ भारत ही नहीं, अन्य देश भी निशाने पर
ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के तहत सिर्फ भारत को ही निशाना नहीं बनाया गया है. अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने इंडोनेशिया पर 86% से 143% और लाओस पर 81% तक का टैक्स लगाया है. अमेरिका का तर्क है कि ये देश अपनी सरकारी सहायता के दम पर अमेरिकी कंपनियों के मुकाबले बहुत सस्ते दामों पर सोलर मॉड्यूल बेच रहे हैं.
व्यापार समझौते पर सवाल
यह फैसला इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि इसी महीने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भारत के बीच एक व्यापार समझौता हुआ था, जिसका उद्देश्य आपसी तनाव कम करना था. हालांकि, यह नया टैक्स ट्रंप के उन ‘ग्लोबल टैरिफ’ से अलग है जिसे हाल ही में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया था. यह कदम सीधे तौर पर ‘एलायंस फॉर अमेरिकन सोलर मैन्युफैक्चरिंग एंड ट्रेड’ की शिकायत पर लिया गया है, जिसमें फर्स्ट सोलर जैसी दिग्गज अमेरिकी कंपनियां शामिल हैं.
भारतीय उद्योग पर असर
भारत की दिग्गज सोलर कंपनियों, जैसे वारी एनर्जीज (Waaree Energies), अडानी ग्रीन और टाटा पावर के लिए यह एक बड़ी चुनौती है. चूंकि इन कंपनियों के भविष्य के विस्तार की योजनाएं काफी हद तक अमेरिकी निर्यात पर टिकी थीं, इसलिए शेयर बाजार में भी इस क्षेत्र को लेकर चिंता देखी जा रही है.


