Saturday, June 27, 2026

होम लोन लेते समय केवल ब्याज दर न देखें; सही अवधि चुनकर, पात्रता जांचकर और पार्ट-पेमेंट करके आप लाखों का नुकसान बचा सकते हैं.

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अपना घर खरीदना हर इंसान का सपना होता है. इस सपने को पूरा करने के लिए अधिकांश लोग होम लोन का सहारा लेते हैं. चूंकि होम लोन 15 से 30 साल लंबी अवधि का वित्तीय समझौता है, इसलिए इसकी प्रक्रिया में की गई एक छोटी सी लापरवाही भविष्य में बहुत भारी पड़ती है. बैंकिंग विशेषज्ञों के अनुसार, लोन लेते समय बुनियादी शर्तों पर ध्यान न देने के कारण ग्राहकों को अनजाने में लाखों रुपये का अतिरिक्त ब्याज चुकाना पड़ता है.

होम लोन को सुरक्षित और किफायती बनाने के लिए इन 6 आम गलतियों से बचना बेहद जरूरी है

1. केवल शुरुआती ब्याज दर देखकर बैंक चुनना
ज्यादातर ग्राहक केवल विज्ञापन में दिखने वाली कम ब्याज दर के आधार पर बैंक चुन लेते हैं. यह एक वित्तीय जाल साबित हो सकता है. दो अलग-अलग बैंक 8.5% की समान ब्याज दर की पेशकश कर सकते हैं, लेकिन उनके कुल खर्च में बड़ा अंतर हो सकता है. एक बैंक जिसकी ब्याज दर 0.25% कम है, वह आपसे ₹25,000 से ₹40,000 तक अधिक प्रोसेसिंग फीस, लीगल चार्ज या अनचाहा इंश्योरेंस प्रीमियम वसूल सकता है. लोन लेते समय हमेशा ब्याज दर के साथ-साथ सभी छिपे हुए शुल्कों को मिलाकर कुल खर्च की तुलना करें.

2. EMI कम रखने के लिए सबसे लंबी अवधि चुनना
मासिक EMI का बोझ कम करने के लिए 25 या 30 साल की लंबी अवधि चुनना सबसे नुकसानदेह फैसला होता है. अवधि जितनी लंबी होगी, चक्रवर्धि ब्याज (Compounding Interest) उतना ही अधिक बढ़ेगा. उदाहरण के लिए, ₹45 लाख के होम लोन पर यदि अवधि 15 साल से बढ़ाकर 20 साल की जाती है, तो मासिक EMI में करीब ₹5,200 की राहत तो मिलती है, लेकिन कुल ब्याज में लगभग ₹14 लाख की भारी बढ़ोतरी हो जाती है. अपनी आय के अनुसार लोन की अवधि जितनी हो सके कम रखें.

3. लोन पात्रता जाने बिना प्रॉपर्टी तलाशना
अक्सर लोग पहले अपनी पसंद की प्रॉपर्टी तय कर लेते हैं और एडवांस (टोकन मनी) भी दे देते हैं. इसके बाद जब वे लोन के लिए आवेदन करते हैं, तो बैंक उनकी आय और मौजूदा देनदारियों के आधार पर कम लोन पास करता है. ऐसी स्थिति में सौदा रद्द होने, टोकन मनी डूबने या अचानक भारी रकम का इंतजाम करने का मानसिक तनाव झेलना पड़ता है. प्रॉपर्टी सर्च शुरू करने से पहले ‘होम लोन एलिजिबिलिटी कैलकुलेटर’ के जरिए अपनी वास्तविक लोन क्षमता का आकलन करें.

4. बैंक की लीगल रिपोर्ट पर आंखें मूंदकर भरोसा करना
खरीदार यह मान लेते हैं कि अगर बैंक ने प्रॉपर्टी पर लोन मंजूर कर दिया है, तो वह कानूनी रूप से पूरी तरह सुरक्षित है. यह सच नहीं है. बैंक केवल अपने वित्तीय जोखिम और कंस्ट्रक्शन क्वालिटी की जांच करता है. मालिकाना हक में विवाद, अवैध निर्माण या भविष्य में रीसेल की समस्याओं से बचने के लिए खरीदार को स्वयं एक स्वतंत्र वकील से प्रॉपर्टी के टाइटल डीड की जांच करानी चाहिए. इसके अलावा, निर्माणाधीन प्रोजेक्ट्स के लिए ‘रेरा’ (RERA) रजिस्ट्रेशन और पुरानी प्रॉपर्टी के लिए नो-ड्यूज सर्टिफिकेट जरूर देखें.

5. अतिरिक्त खर्चों का बजट न बनाना
होम लोन कभी भी प्रॉपर्टी की कुल कीमत का 100% कवर नहीं करता है. इसके अलावा कई ऐसे नगद खर्चे होते हैं जिनके बारे में खरीदार योजना नहीं बनाते. उदाहरण के लिए, ₹70 लाख की प्रॉपर्टी पर स्टांप ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन चार्ज ही लगभग ₹3.5 से ₹5.5 लाख तक आ जाता है. इसमें प्रोसेसिंग फीस, जीएसटी और इंटीरियर का खर्च जोड़ने पर ₹4 से ₹7 लाख की अतिरिक्त नगद राशि की जरूरत होती है. डाउन पेमेंट के साथ-साथ इन खर्चों का बैकअप पहले से तैयार रखें.

6. फिक्स्ड और फ्लोटिंग ब्याज दरों का मूल्यांकन न करना
बिना सोचे-समझे ब्याज दर का प्रकार चुनना बजट को बिगाड़ सकता है. फिक्स्ड रेट में EMI स्थिर रहती है, जबकि फ्लोटिंग रेट बाजार के उतार-चढ़ाव (जैसे आरबीआई रेपो रेट) के आधार पर बदलती रहती है. लोन एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करने से पहले प्री-पेमेंट के नियमों और रेट रिवीजन की शर्तों को ध्यान से पढ़ें.

विशेषज्ञों की सलाह: लोन चालू होने के बाद भी इसे ‘सेट एंड फॉरगेट’ मोड पर न छोड़ें. साल में कम से कम एक बार अपने लोन एग्रीमेंट की समीक्षा करें. यदि आपका क्रेडिट स्कोर सुधरा है, तो बैंक से ब्याज दर कम करने का अनुरोध करें. साथ ही, समय-समय पर मिलने वाले बोनस या अतिरिक्त बचत से लोन का पार्ट-पेमेंट करते रहें. शुरुआती सालों में किया गया छोटा सा पार्ट-पेमेंट भी आपके लोन की अवधि को कई साल कम कर सकता है.

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