आज के दौर में बेटियां सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रह गई हैं बल्कि वो जीवन जीने का हुनर और आत्मनिर्भर बनने की दिशा में भी आगे निकल गई हैं. रामनवमी के अवसर पर हजारीबाग की बेटियां आत्मरक्षा के लिए लाठी-डंडा, तलवार और भाला चलाना सीख रही हैं. जिससे जरूरत पड़ने पर खुद को सुरक्षित रख सके और मौका मिले तो देश सेवा में भी अपनी अहम भूमिका निभा सके.
भारत आत्मनिर्भर बन रहा है यहां की बेटी सुरक्षा के लिए आत्मनिर्भर बनने के लिए तैयारी में लगी हुई हैं. हजारीबाग की रामनवमी के जरिए यहां की बेटियां तलवार, डंडा, भाला, लाठी समेत अन्य पारंपरिक हथियार चलाना सीख रही हैं.
नवाबगंज रोड स्थित गुरुकुल में इन दोनों वार्षिक कार्यक्रम चल रहा है. इस कार्यक्रम के बीच शहर की बेटियों और बेटे दोनों को परंपरागत हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है. जिसमें बेटियां बढ़कर हिस्सा ले रही हैं ताकि सुरक्षा की दृष्टिकोण से आत्मनिर्भर बन सके और जरूरत पड़े तो देश सेवा में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सके.
हजारीबाग की रामनवमी को इंटरनेशनल कहा जाता है. इसका एकमात्र कारण है कि समाज का हर एक तबका रामनवमी में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करता है. रामनवमी की परंपरा नई पीढ़ी तक जाए इसे देखते हुए आर्ष कन्या गुरुकुल में दिल्ली से आए प्रशिक्षक बेटियों को परंपरागत हथियार चलाने का प्रशिक्षण दे रहे हैं. बेटियां भी जमकर सीख रही हैं. इस दौरान बेटियां हाथ में लाठी लेकर कर्तव्य दिखा रहीं हैं.
यहां प्रशिक्षण प्राप्त कर रही छात्राएं कहती हैं कि वो पुरुष से कम नहीं हैं तभी तो हथियार चलाने का प्रशिक्षण ले रही हैं. बेटियां लाठी के साथ-साथ तलवार चलाने का भी प्रशिक्षण ले रही हैं. इस दौरान उनके चेहरे में गजब सा आत्मविश्वास देखने को मिल रहा है.
छात्राएं कहती हैं कि शिक्षा के साथ-साथ परंपरागत हथियार चलाना बेहद जरूरी होता है. यह आत्मरक्षा का पहला चरण है. ऐसा कहा जाए तो एक साथ दो काम हो रहा है. रामनवमी की तैयारी भी हो रही है और भविष्य में कैसे खुद को सुरक्षित रखें इसे लेकर भी आत्मबल बढ़ रहा है.
समाजसेवी जीवन गोप बताते हैं कि लाठी चलाने की परंपरा धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है. हजारीबाग की रामनवमी की भव्यता बरकरार रहे इसे देखते हुए नई पीढ़ी को रामनवमी को लेकर तैयार किया जा रहा है. जब बेटियां सड़कों पर तलवार और लाठी का करतब दिखाएंगे तो सबके होश उड़ जाएंगे. उन्होंने यह भी कहा कि बेटियां सिर्फ घर में खाना बनाने के लिए नहीं है. समय पर हथियार उठाने के लिए भी तैयार हो रही है.
गुरुकुल में सिर्फ बेटियां ही नहीं बल्कि छोटे-छोटे बालक भी परंपरागत हथियार चलाने का प्रशिक्षण ले रहे हैं. रामनवमी पर्व के साथ कई परंपरा जुड़ी हुई है. जिसमें हथियार और लाठी का कर्तव्य दिखाना भी शामिल है. बदलते जमाने में लाठी और हथियार से कर्तव्य दिखाने की परंपरा भी गुम हो रही थी उस परंपरा को फिर से जीवित करने का प्रयास है. रामनवमी की यही खूबसूरती भी है कि समाज का हर एक तब का पर्व मनाने के लिए सालों भर इंतजार करता है.


