रामगढ़: साइकिल से भारत भ्रमण पर निकली राष्ट्रीय एथलीट आशा मालवीय रविवार को रामगढ़ पहुंची. उनके आगमन पर रामगढ़ छावनी स्थित पंजाब रेजिमेंट सेंटर में उनका स्वागत किया गया और फुटबॉल ग्राउंड में पुलिस अधीक्षक ने उन्हें सम्मानित किया.
मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव की रहने वाली आशा मालवीय पूरे देश में साहस की मिसाल बन गई हैं. राष्ट्रीय स्तर की एंड्योरेंस साइकिलिस्ट, पर्वतारोही और पूर्व एथलीट आशा की साइकिल यात्रा न सिर्फ दूरियां तय कर रही है बल्कि लाखों युवाओं, विशेषकर महिलाओं को उनके सपनों में दृढ़ता का संदेश भी दे रही है.
राजगढ़ (मध्य प्रदेश) के एक साधारण परिवार से आने वाली आशा मालवीय का सफर असाधारण रहा है. कभी 100 और 200 मीटर की राष्ट्रीय एथलीट रहीं आशा ने पर्वतारोहण में भी अपनी प्रतिभा साबित की है. उन्होंने 20,500 फुट ऊंचे बी.सी. रॉय चोटी और लगभग 19,500 फुट ऊंची तेनजिंग खान चोटी पर तिरंगा फहराकर देश का नाम रोशन किया है.
साइकिलिंग में उनका रिकॉर्ड भी शानदार है. अब तक, उन्होंने 60,000 किलोमीटर से ज़्यादा की यात्रा पूरी की है, जिसमें पूरे भारत में 26,000 किलोमीटर की यात्रा और कन्याकुमारी से सियाचिन तक की मुश्किल यात्रा शामिल है.

आशा अभी 7,800 किलोमीटर के देशव्यापी अभियान पर हैं, जो 11 जनवरी को जयपुर से शुरू हुआ और अरुणाचल प्रदेश के किबिथु तक पहुंचेगा. इस यात्रा का मकसद महिला सशक्तिकरण, देशभक्ति और भारतीय सेना के प्रति सम्मान का संदेश फैलाना है.

अब तक, वह 5,200 किलोमीटर से ज्यादा की यात्रा कर चुकी हैं और रामगढ़ जिले में पहुंच चुकी हैं. जयपुर से शुरू हुई यह यात्रा रायबरेली, प्रयागराज, रामगढ़, रांची होते हुए अरुणाचल प्रदेश के किबिथु में खत्म होगी. किबिथु देश के पूर्वी हिस्से का आखिरी गांव है.
रामगढ़ में एसपी अजय कुमार ने आशा की हिम्मत और समर्पण की तारीफ की. आशा मालवीय की कोशिशें युवाओं, खासकर युवतियों के लिए प्रेरणा देने वाली हैं और यह सफर अनुशासन और देशभक्ति का एक बेहतरीन उदाहरण है.

आशा मालवीय का कहना है, “मेरी यात्रा का मकसद महिला सशक्तिकरण, देशभक्ति और अदम्य साहस है.” 11 जनवरी को जयपुर से शुरू हुई यह यात्रा पहले गुजरात के कोहर गांव, फिर मध्य प्रदेश के भोपाल, उत्तर प्रदेश के लखनऊ, प्रयागराज, वाराणसी, बिहार के गया, झारखंड के तिलैया, रामगढ़, रांची, जमशेदपुर, बंगाल के सिलीगुड़ी से होते हुए अरुणाचल प्रदेश के किबिथु में खत्म होगी. उनका मकसद महिलाओं के मन से डर खत्म करना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है.
वह युवाओं को संदेश देती हैं कि उन्हें जिंदगी में कभी हार नहीं माननी चाहिए और हिम्मत के साथ अपने सपनों का पीछा करना चाहिए. अब तक वह देश भर में 64,000 किलोमीटर की सोलो साइकिल यात्रा पूरी कर चुकी हैं, जिसमें कन्याकुमारी से सियाचिन तक का सफर भी शामिल है. वह कहती हैं, कि “मैं महिलाओं में डर खत्म करने के लिए निकली हूं, क्योंकि आज भी कई महिलाएं अकेले बाहर निकलने से डरती हैं. जिंदगी में कभी हार नहीं माननी चाहिए. मैं युवा पीढ़ी को यह मैसेज देने के लिए इस सफ़र पर निकली हूं.”


