Wednesday, March 18, 2026

लोकसभा ने गुरुवार को विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार और आजीविका मिशन (वीबी जी राम जी) बिल को पारित कर दिया.

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 हंगामों के बीच लोकसभा ने गुरुवार को विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार और आजीविका मिशन (वीबी जी राम जी) बिल को पारित कर दिया. विपक्ष के सवालों का जवाब देते हुए कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस बिल को गांधी के सपनों को साकार करने की ओर बढ़ाया गया कदम बताया. उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने बापू के आदर्शों को मार दिया, जबकि मोदी सरकार ने उन्हें जिंदा रखा है. कृषि मंत्री ने कहा कि हमारे लिए बापू आज भी इन योजनाओं में जिंदा हैं, महात्मा गांधी केवल पोस्टरों और तस्वीरों में नहीं, बल्कि अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने के हमारे कार्यों में जिंदा हैं.

हालांकि विपक्षी सांसद कृषि मंत्री के जवाब से संतुष्ट नहीं दिखे और वे लगातार इस बिल का विरोध करते रहे. उन्होंने कहा कि बिल से महात्मा गांधी के नाम को हटाया जाना कहीं से भी उचित नहीं है. आइए जानते हैं आखिर इस बिल में ऐसा क्या है, जिसको लेकर विपक्षी सदस्य लगातार सवाल उठा रहे हैं और नया बिल पुराने कानून से कितना अलग है ?

आज से करीब 20 साल पहले 2005 में यूपीए सरकार ने महात्मा गांधी नेशनल रूरल एम्प्लॉयमेंट गारंटी अधिनियम (म-नरेगा) लागू किया था. इसके तहत ग्रामीण क्षेत्रों के परिवारों को 100 दिनों के रोजगार की गारंटी दी गई थी. यह योजना उन मजदूरों के लिए महत्वपूर्ण थी, जिनके पास कोई कौशल या हुनर नहीं था और जिनके पास इतने पैसे नहीं होते थे कि वे दूसरे राज्यों में जाकर रोजगार की तलाश कर सकें. इस योजना के जरिए मुख्य रूप से ग्रामीण इलाकों में संपत्ति निर्माण पर जोर दिया जाता रहा है. जैसे- तालाब, सड़क, सिंचाई व्यवस्था वगैरह को मजबूत करना. पूरे देश में कुल 262 तरह के अलग-अलग काम कराए जाते रहे हैं.

मनरेगा को महाराष्ट्र की रोजगार गारंटी योजना से प्रेरित माना जाता रहा है. महाराष्ट्र ने इसे 1972-73 में सूखे से राहत के उपाय के तौर पर शुरू किया था. मनरेगा की एक और खासियत रही है कि अगर किसी ने अपना नाम निबंधित कराया है, तो उसे 15 दिनों के भीतर रोजगार उपलब्ध करवाया जाता है. काम उपलब्ध नहीं होने पर उस व्यक्ति को बोरोजगारी भत्ता दिया जाता है

मनरेगा के तहत मजदूरी की पूरी राशि केंद्र सरकार जारी करती रही है. प्रशासनिक जिम्मेदारी के अलावा जिन सामानों का इस्तेमाल होता है, उसका खर्च राज्य सरकार वहन करती है. इस समय मनरेगा के तहत करीब 12 करोड़ मजदूर रजिस्टर्ड हैं. मोदी सरकार ने ही साल 2020-21 के जो आंकड़े जारी किए थे, उनके अनुसार उस साल एक लाख 11 हजार करोड़ रुपये इस योजना के तहत जारी किए गए थे. इसकी वजह थी, कोविड के दौरान ग्रामीण लोगों की आमदनी में भारी गिरावट. उन्हें इस योजना से बड़ी राहत मिली थी.

नए बिल की जरूरत क्यों

कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लोकसभा में कहा कि मनरेगा को बदलने की जरूरत है, क्योंकि बहुत सारे अनप्रोडक्टिव काम हो रहे थे. उन्होंने कहा कि योजना को लेकर तरह-तरह की शिकायतें आ रही हैं. उनके अनुसार बहुत जगहों पर सिर्फ कागज पर काम हो रहे थे और उसके बदले पैसे उठाए जा रहे थे. उन्होंने कहा कि मनरेगा में 60 प्रतिशत पैसा मजदूरी के लिए और 40 प्रतिशत निर्माण सामग्री के लिए होता था, लेकिन विपक्षी दलों के शासन वाले राज्यों में मजदूरी का पूरा पैसा ले लिया जाता था, और सामग्री पर केवल 26 प्रतिशत, तो कई राज्यों में केवल 19-20 प्रतिशत खर्च किया जाता था.

समय-समय पर योजनाओं के बदलते रहे हैं नाम

कृषि मंत्री ने कहा कि देश में 1960-61 में ग्रामीण जनशक्ति कार्यक्रम बनने से लेकर मनरेगा तक समय-समय पर विभिन्न योजनाएं बनती रही हैं और समय के साथ उनमें बदलाव भी होते रहे हैं. उन्होंने कहा कि मनरेगा के नाम में पहले महात्मा गांधी का नाम नहीं था और इसका नाम नरेगा था, लेकिन 2009 के लोकसभा चुनाव से पहले वोटों के कारण कांग्रेस को बापू याद आ गए और उनका नाम जोड़ा गया. योजना को लेकर आंकड़े जारी करते हुए उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने इस योजना के जरिए 3210 करोड़ श्रम दिवस का सृजन किया, जबकि कांग्रेस ने 1660 करोड़ श्रमिक दिवस का ही सृजन किया था. इसी तरह से मोदी सरकार के अधीन महिलाओं की भागीदारी 56.73 फीसदी तक हो गई थी, जबकि यूपीए के दौरान यह 48 फीसदी तक थी.

बिल का विरोध क्यों ?

विरोध की पहली वजह – नाम बदलने और इसमें से गांधी के नाम को हटाए जाने को लेकर है. विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि मोदी सरकार महात्मा गांधी का नाम योजना से हटाकर उनके आदर्शों से भटक रही है.

विरोध की दूसरी वजह खर्च को लेकर है. नए बिल में खर्च के मद का बंटवारा कर दिया गया है. इसके तहत केंद्र सरकार 60 फीसदी हिस्सा वहन करेगी, जबकि राज्य सरकार 40 फीसदी हिस्से का वहन करेगी. पहाड़ी राज्यों, पूर्वोत्तर राज्यों, जम्मू कश्मीर और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 90 फीसदी खर्च केंद्र सरकार करेगी.

विपक्षी दलों का कहना है कि मनरेगा के तहत मजदूरी का पूरा खर्चा केंद्र सरकार उठाती थी. उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि सरकार लगातार बजट में कटौती कर रही है. इस पर कृषि मंत्री शिवराज सिंह ने कहा कि मोदी सरकार ने मनरेगा का बजट बढ़ाया है, न कि इसे कम किया है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार ने मनरेगा का बजट 40 हजार करोड़ रुपये से कम करके 35 हजार करोड़ रुपये कर दिया था. जबकि मोदी सरकार ने इस योजना में 1 लाख 11 हजार करोड़ रुपये तक खर्च किए और इस साल बजट में 1,51,282 करोड़ रुपये का प्रस्ताव है.

विरोध की तीसरी वजह – नए बिल के सेक्शन 5(1) को लेकर है. उनका कहना है कि किस राज्य में इस योजना को लागू किया जाएगा और कब लागू किया जाएगा, इसका निर्धारण केंद्र सरकार करेगी. साथ ही यदि किसी राज्य के पास बजट कम है, तो केंद्र सरकार उसी बजट के अनुरूप उसे काम सौंपेगी. जबकि पहले ऐसी कोई बाध्यता नहीं थी. इसे नॉर्मेटिव एलोकेशन कहा जा रहा है.

विपक्षी दलों का कहना है कि इससे सबसे अधिक गरीब राज्य प्रभावित होंगे, क्योंकि उनके पास बजट नहीं होगा. बजट नहीं होगा, तो वह लोगों के लिए काम नहीं ले सकेंगे. उनका ये भी आरोप है कि सरकार ने खेती के नाम पर हरेक साल 60 दिनों तक इस योजना को लागू नहीं करने का फैसला किया है. इसका मतलब है कि खेती के दिनों में जब मजदूरी की जरूरत होगी, तो उन्हें काम नहीं मिलेगा.

“मोदी सरकार ने मनरेगा जैसी ऐतिहासिक योजना को दफन करने का मन बना लिया है. 100 की जगह 125 दिन लिख देने का झांसा है—जबकि हकीकत यह है कि रोजगार की गारंटी को ही समाप्त किया जा रहा है. विकसित भारत–रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन अब हर हाथ को काम के अधिकार की बजाय, चुनिंदा लाभार्थियों को दिहाड़ी के दान की योजना बनाता है.”

“बात सिर्फ मनरेगा के नाम बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह काम के अधिकार को छीने जाने की बात है. सरकार उस अधिकार को छीन रही है, जो हमने दिया था. इस नए कानून में सरकार का जब मन होगा, तब वह काम देगी. बाद में यह बोलकर काम देने से मना कर देगी कि अभी मांग नहीं है.” कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे.

“100 दिन से 125 दिन की मजदूरी वाली बात सिर्फ एक चालाकी है. जैसे ही बजट का बोझ राज्य सरकारों पर पड़ेगा, वैसे ही धीरे-धीरे मनरेगा बंद हो जाएगा क्योंकि राज्यों के पास पैसे नहीं हैं.” कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी.

टीएमसी सांसद ने लोकसभा में कहा, “मार्च 2022 से केंद्र ने बंगाल को मनरेगा की निधि जारी नहीं की, जिससे बंगाल में 59 लाख पंजीकृत मनरेगा श्रमिक तीन साल से पारिश्रमिक भुगतान से वंचित रह गए.”

सीपीएम के अमरा राम ने कहा कि मनरेगा के जरिये गांवों के गरीबों को जो हक मिला था उसे छीना जा रहा है.

नए बिल के समर्थन को लेकर क्या कहा सरकार ने

मोदी सरकार का कहना है कि वह मनरेगा की जगह पर नया कानून ला रही है. इसमें रोजगार के दिनों का दायरा बढ़ाया जा रहा है. इसमें जल संसाधन, रोड, डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर और रूरल हाउसिंग को शामिल किया गया है. इन सारे कामों को पहले शामिल नहीं किया गया था. सरकार ने कहा कि इसके जरिए जिस भी ढांचा का निर्माण होगा, वह देश की संपत्ति के निर्माण में योगदान करेगा. सरकार ने कहा कि पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए रियल टाइम मॉनिटरिंग की जाएगी. इसके लिए एआई, जीपीएस और मोबाइल का उपयोग किया जाएगा. एक एआईएस डैशबोर्ड बनाया जाएगा, जिसकी मदद से लगातार निगरानी की जाएगी. प्रत्येक सप्ताह कितना काम हुआ और कितना खर्च हुआ, उसका ब्योरा प्रकाशित किया जाएगा. सरकार के अनुसार जहां पर काम होगा, उस पंचायत में सोशल ऑडिटिंग की जाएगी.

  • मनरेगा का फुल फॉर्म – महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम
  • कितने दिनों के रोजगार की गारंटी – 100 दिनों की
  • किन्हें काम मिलता था – ग्रामीण परिवारों के अकुशल व्यस्क मजदूरों को
  • उद्देश्य – रोजगार सृजन और ग्रामीण परिवारों की आमदनी सुरक्षित करना
  • वीबी राम जी का फुल फॉर्म – विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार और आजीविका मिशन
  • कितने दिनों का मिलेगा काम – 125 दिनों का
  • किन्हें काम मिलेगा – ग्रामीण परिवारों के अकुशल व्यस्क मजदूरों को
  • उद्देश्य – मनरेगा से हटकर इनमें आजीविका से जुड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर, ग्रामीण इन्फ्रास्ट्रक्चर, जल और जलवायु को शामिल किया गया है, ताकि ग्रामीण विकास ढांचा विकसित हो सके.

मनरेगा और वीबी जी राम जी में मुख्य अंतर

  • 100 दिनों के रोजगार की गारंटी – 125 दिनों का रोजगार
  • मजदूरी का पैसा केंद्र सरकार की जिम्मेदारी – केंद्र 60 फीसदी और राज्य सरकार 40 फीसदी खर्च उठाएगी
  • इसके तहत सार्वजनिक कार्यों के जरिए एम्पावरमेंट, ग्रोथ, कन्वर्जेंस और सैचुरेशन पर जोर देना है, ताकि विकसित भारत नेशनल रूरल इंफ्रास्ट्रक्चर स्टैक बन सके.

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