Saturday, August 1, 2026

बांस के भाले से कॉमनवेल्थ पदक तक: संघर्ष, अनुशासन और परिवार के सहयोग ने यशवीर सिंह को दिलाई नई पहचान.

Share

जयपुर/ग्लासगो: कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के लिए एथलेटिक्स से एक और खुशखबरी आई। जेवलिन थ्रो स्पर्धा में राजस्थान के युवा एथलीट यशवीर सिंह ने शानदार प्रदर्शन करते हुए कांस्य पदक अपने नाम किया। इस उपलब्धि के साथ उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत और राजस्थान दोनों का गौरव बढ़ाया।

पदक जीतने के बाद यशवीर ने अपनी खेल यात्रा, शुरुआती संघर्ष और परिवार से मिले सहयोग को याद करते हुए बताया कि यह सफलता वर्षों की कड़ी मेहनत, अनुशासन और लगातार किए गए प्रयासों का परिणाम है।

पिता बने पहले गुरु

यशवीर ने बताया कि उनके खेल जीवन की शुरुआत घर से हुई। उनके पिता राय सिंह, जो स्वयं खिलाड़ी रह चुके हैं और रेलवे में खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देते हैं, उनके पहले कोच भी रहे। बचपन से अभ्यास का माहौल देखने और पिता के मार्गदर्शन ने उन्हें जेवलिन थ्रो की ओर आकर्षित किया।

उनके अनुसार, पिता ने हमेशा मेहनत, अनुशासन और धैर्य का महत्व समझाया और आसान रास्ता चुनने के बजाय निरंतर अभ्यास पर जोर दिया। यही सीख आगे चलकर उनके करियर की मजबूत नींव बनी।

राजस्थान से अंतरराष्ट्रीय मंच तक का सफर

यशवीर ने अपनी शुरुआती ट्रेनिंग राजस्थान में की और जयपुर स्थित सवाई मानसिंह स्टेडियम में नियमित अभ्यास किया। राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में अच्छे प्रदर्शन के बाद उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई और बाद में देश के हाई-परफॉर्मेंस प्रशिक्षण केंद्रों में अभ्यास का अवसर मिला।

आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाओं, वैज्ञानिक तकनीकों और अनुभवी कोचों के मार्गदर्शन ने उनके प्रदर्शन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।

सीमित संसाधनों के बीच की शुरुआत

यशवीर ने बताया कि करियर के शुरुआती दौर में उनके पास पेशेवर जेवलिन उपलब्ध नहीं था। महंगे उपकरण खरीदना संभव नहीं होने के कारण उन्होंने लंबे समय तक बांस से बने अस्थायी भाले से अभ्यास किया।

उन्होंने स्वीकार किया कि उस दौरान कई बार चोटें भी लगीं, लेकिन उन्होंने अभ्यास नहीं छोड़ा। उनका मानना है कि खेल में सफलता का कोई आसान रास्ता नहीं होता और लगातार मेहनत, फिटनेस तथा मानसिक मजबूती ही खिलाड़ी को बड़े मंच तक पहुंचाती है।

चुनौतियों ने बनाया मजबूत

युवा एथलीट के अनुसार, एक खिलाड़ी का सफर केवल प्रतियोगिताओं तक सीमित नहीं होता। इसके पीछे वर्षों की तैयारी, चोटों से वापसी, मानसिक दबाव और लगातार बेहतर प्रदर्शन की चुनौती होती है।

उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों में परिवार और कोच का विश्वास उनके लिए सबसे बड़ी ताकत बना। हर असफलता से सीख लेकर उन्होंने अपने प्रदर्शन में सुधार किया और यही अनुभव उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतने तक लेकर आया।

युवाओं के लिए प्रेरणा

कॉमनवेल्थ गेम्स में कांस्य पदक जीतने के बाद यशवीर सिंह की कहानी इस बात का उदाहरण बनकर सामने आई है कि सीमित संसाधनों के बावजूद दृढ़ संकल्प, नियमित अभ्यास और सही मार्गदर्शन से बड़े लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं। उनकी उपलब्धि देशभर के उभरते खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत मानी जा रही है।

Read more

Local News