Friday, August 21, 2026

पलामू, गढ़वा समेत पांच जिलों में हथियार लाइसेंस का ब्योरा जुटा रहा PTR.

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पलामू। पलामू टाइगर रिजर्व (PTR) ने वन्यजीव संरक्षण और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से अपने आसपास के जिलों में जारी हथियार लाइसेंसों का विवरण मांगा है। रिजर्व प्रबंधन ने पलामू, गढ़वा, लातेहार, गुमला और लोहरदगा जिला प्रशासन से लाइसेंसी हथियारों तथा उनके धारकों से जुड़ी जानकारी साझा करने का अनुरोध किया है।

अब तक लातेहार जिला प्रशासन की ओर से जानकारी उपलब्ध कराई गई है। इसके अनुसार, पलामू टाइगर रिजर्व से जुड़े क्षेत्र में 10 लाइसेंसी हथियार दर्ज हैं। अन्य जिलों से संबंधित जानकारी अभी PTR को प्राप्त नहीं हुई है।

वन्यजीव सुरक्षा के लिए जुटाई जा रही जानकारी

PTR प्रबंधन का कहना है कि रिजर्व क्षेत्र और उसके आसपास मौजूद लाइसेंसी हथियारों की स्थिति की जानकारी रखना वन्यजीव संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इससे यह निगरानी करने में मदद मिल सकती है कि लाइसेंसी हथियारों का किसी तरह से अवैध शिकार जैसी गतिविधियों में इस्तेमाल तो नहीं हो रहा है।

इसी उद्देश्य से PTR की ओर से संबंधित जिलों के उपायुक्तों को पत्र भेजकर हथियार लाइसेंस से जुड़ा विवरण उपलब्ध कराने का आग्रह किया गया है।

10 किलोमीटर क्षेत्र में विशेष नियम

पलामू टाइगर रिजर्व से सटे 10 किलोमीटर के क्षेत्र में हथियार लाइसेंस से संबंधित मामलों में विशेष प्रावधान लागू हैं। PTR प्रबंधन के अनुसार, इस दायरे में नए हथियार लाइसेंस से जुड़े मामलों में रिजर्व के उपनिदेशक या निदेशक स्तर के अधिकारियों की सहमति आवश्यक होती है।

PTR के उपनिदेशक प्रजेशकांत जेना ने बताया कि पांच जिलों से हथियार लाइसेंस की जानकारी मांगी गई है। उन्होंने कहा कि रिजर्व प्रबंधन को अपने आसपास के इलाकों में मौजूद हथियारों की स्थिति की जानकारी रहना जरूरी है, ताकि वन्यजीवों की सुरक्षा के लिहाज से प्रभावी निगरानी की जा सके।

इको-सेंसिटिव जोन पर भी निगरानी

पलामू टाइगर रिजर्व इको-सेंसिटिव जोन से जुड़े मामलों पर भी नजर रख रहा है। रिजर्व प्रबंधन के मुताबिक, इको-सेंसिटिव जोन और उससे जुड़े निर्धारित क्षेत्र में लाइसेंसी हथियारों को लेकर विभिन्न नियम और दिशा-निर्देश लागू हैं।

हथियार लाइसेंस का जिलावार विवरण मिलने के बाद PTR को अपने आसपास के क्षेत्रों में मौजूद लाइसेंसी हथियारों की स्थिति का व्यापक आकलन करने में मदद मिलेगी। इससे वन्यजीव संरक्षण और सुरक्षा से जुड़े उपायों को बेहतर तरीके से लागू करने में भी सहायता मिल सकती है।

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